आलेख : घर मुझे ऐसा भाए -पंकज त्रिवेदी
इंसान की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता । दूर जाने की बात नहीं, इंसान की अपनी अनिवार्य ज़रूरत कोई है तो वह रोटी, कपड़ा और मकान की । रोटी-कपड़ा मिलाने के बाद मकान की ज़रूरत को प्राथमिकता दे सकते हैं । मकान बनाने के बाद उसे "घर" बनाने की ज़िम्मेदारी इंसान की ख़ुद की ही होती है । मकान के लिए दोस्तों-रिश्तेदारों की मदद या बैंक लोन की सुविधा मिल सकती है । जितनी सरलता मकान बनाने में है, उससे कईं ज़्यादा मुश्किल ज़िम्मेदारी घर बनाने के कार्य में है । हम किसी के घर जाते हैं तब बिलकुल सहजता से उसके मकान की भौतिकता के साथ अपने मकान की तुलना करने लगते हैं । यह तुलना ज़्यादातर दुखद साबित होती है । कोई बड़े आदमी को मिलने जाए तो ख़ासतौर से उसके मकान के बारे में हमारी छिपी हुई कल्पना परेशान करती रहती है । हमारी उस कल्पना से वास्तविकता कुछ और हो जाये, तो खिसियाने की भावना अन्दर से दुखाने लगती है । क्योंकि हद से बाहर सोचने की इंसानी आदत पुरानी है ।
भौतिकता से मानव के मूल्य-संस्कारों को नाप नहीं सकते । संभव है की वहाँ मकान-बंगला हो मगर घर न हो । दिल्ली के नोएडा क्षेत्र के निठारी में बाल-हत्याओं के बाद जो नरकंकाल उससे पूरे देश की जनता स्तब्ध हो गयी थी । हत्या का मुख्य आरोपी मोनिन्दर व्यापारी था, भौतिकरूप से वह सुखी था । मगर वह उसका मकान था । घर नहीं था । उसके मन के मकान में शैतान था, पत्नी और बच्चों के बग़ैर वह मकान वस्तुतः घर नहीं था । सच मानें तो मन ही एक घर है। इस घर में जितने उत्तम विचार होंगे उतना ही वह घर सुवासित होगा, ज़्यादा सुशोभित होगा और सुरक्षित भी होगा ।
हमारे गुजरात के जूनागढ़ शहर के गुजराती कविश्री श्याम साधु औलिया-फ़कीर थे । जाति से शुद्र और मकान के नाम पर झोपड़ी! मगर उनका मन रूपी घर अद्भुत था । पवित्र था । वे अपने आने वाले मेहमानों का अपनी भावनाओं की लाल कार्पेट बिछाकर स्वागत करने को आतुर रहते । उनके इस पवित्र घर में से जिन विचारों का उद्भव हुआ, वे कविता के माध्यम से हमारी गुजराती जनता और साहित्यजगत को समृद्ध करने के लिए पर्याप्त थे । 2001 के भूकंप के बाद उनका मकान गिर गया था । एक आधी-सी दीवार ही बच पायी थी ।
उस वक़्त गुजराती साहित्य परिषद् के द्वारा क्षतिग्रस्त साहित्यकारों की सहायता करने हेतु कुछेक साहित्यकार ख़ुद जाँच-पड़ताल के लिए निकले थे, जिसमें श्री रघुवीर चौधरी, श्री भोलाभाई पटेल, श्री हरिकृष्ण पाठक, श्री हर्षद त्रिवेदी आदि थे । उस समय टूटे हुए घर के स्तम्भ के सहारे बैठकर पूर्ण निर्मलता से आध्यात्मिक कविता रचते श्याम साधु ने मेहमानों का जिस सद्भाव से स्वागत किया था, वह दृश्य आज भी भूला नहीं पाए वे लोग ।
उस कवि ने जब अंतिम साँसें ली तब भी उसके बिस्तर के नीचे से कविताओं के पुरस्कार के चेक ऐसे पड़े थे, जिससे यह लग रहा था की उसके मन में वे रद्दी से ज़्यादा कुछ नहीं थे । उसकी ज़रूरतों के सामने हिमालय जैसा अड़िग उसका संतोष था । वे समाज-संसार के बीच भी पूर्ण आध्यात्मिक फ़कीरी में जीते थे । मकान और घर के बीच का फ़र्क समझने जैसा है ।
सुख सिर्फ़ भौतिकता से नहीं मिलता । एक मित्र के ज़रिये एक भाई मुझे मिलने आए । मेरे मकान के बारे में उनकी कल्पना पलभर में टूट गई । उनकी बातों में प्रकट हुई धारणा का नाश मेरे लिए कोई आघात नहीं था मगर आनंद का विषय था । मैं मकान के बदले संवेदनशील-सुखी घर का गौरव ले सकूँ यह बात भी क्या कम है? बायरन का भावपूर्ण एक विचार है - 'संवेदना के बग़ैर घर नहीं बनाता ।' कोई एक विचार हमारे मन की आतंरिक-त्वचा को संवेदनशील बना दे तब संवेदना का दर्द भी मीठा लगता है । पहली नज़र की भावुकता की अनुभूति से ख़ुश हो जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है । मगर इस प्रकार भावुक हो जाने की रीत कभी-कभी जोखिमकारक साबित होती है । भावुकता का बुद्धि के साथ ज़्यादा मेल नहीं होता । भाव का उफान भीतर से बाहर तब प्रकट होता है, जब हम किसी को बहुत प्यार करते हैं, ऐसा लगता है । यही भावुकता बिना सोचे प्रकट हो तो वह बेसलीक़ा साबित हो जाती है । इस घटना के दौरान किसी की वाणी या व्यवहार से ठेस पहुँचे तब प्रेम देने के बदले छीनने की पराकाष्ठा तक भी इंसान पहुँच सकता है । इंसान की यही मर्यादा आज सबसे ख़तरनाक साबित हो रही है । यही बात इंसान के सुंदर व्यक्तित्व को टुकड़ो में बिखेर देती है । कई बार संवेदना की धार अच्छे-बुरे का भेद भुला देती है । बुद्धि के सम्मिश्रण के साथ बहती संवेदना व्यक्ति और समाज के लिए उपचारक बनाती है, अन्यथा दुखकारी ही सिद्ध होती है ।
'घर' तो इंसान के तन-मन का विरामस्थली है । मकान में रेत-पत्थर की दीवारें होती है । मगर उन दीवारों के बीच के पोलेपन में चातुर्यता और संवेदना से भरे इंसान हों, तो वहाँ शून्यावकाश के बदले ठोस 'घर' मिलता है । वहाँ एक-दूसरे के प्रति स्नेह-प्यार की उष्मा रहती है ।
मेरी दृष्टि से 'घर तो नेवली-बेल है । जैसे साँप और नेवले की लड़ाई में जीतने की होड़ लगी हो तब नेवला, एवाली-बेल को सूँघकर साँप का ज़हर उतारकर प्रचंड प्रहार करने को तैयार होता है । बिलकुल उसी तरह जीवन के कई संघर्षों के सामने लड़ने के लिए इंसान के लिए घर ही नेवली-बेल साबित होता है । इंसान को भी कई आपत्तियों और विपरीत परिस्थितियों के सामने हमेशा लड़ना पड़ता है । ऐसा इंसान पूरे दिन की दौड़ धूप या मानसिक तनाव से मुक्ति पा सके ऐसी कोई जगह हो तो वह 'घर' है । इंसान के घर का वातावरण प्रेम और समर्पण की सुवास से भरे व्यक्तियों से बना होगा तो उसे वहाँ शांति का अनुभव मिलेगा । सुख का सच्चा अनुभव उसे दूसरे दिन के जीवन संघर्ष करने में शक्तिवर्धक जड़ी-बूटी बनाकर ताज़गी देगा । घर आने के बाद भी कुछ सच्चे दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने जैसे सुख का अहसास मिलेगा। ऐसा सुख पाने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है । हमारा घर मंदिर की तरह पवित्र होना चाहिए और वही श्रेष्ठ आश्रय स्थान है ।
"ॐ", गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फ़ीट रोड, सुरेन्द्र नगर, गुजरात - 363002
pankajtrivedi102@gmail.com
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4 comments:
bahut sundar.. aapka ye blog bhi ghar jaisa sundar bane... Dr Nutan
नूतनजी,
आपने इतनी सहृदयता से इस घर में प्रवेश किया है तो स्वागत है | अब तो यहाँ से गुजराती भोजन का लुत्फ़ उठाकर ही जाएँ | बहुत जल्दी है तो झालावाडी चाय और पान !
आपको बहुत बहुत बधाई !!
कुसुमजी, धन्यवाद
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