विचार तो वेदवाणी : पंकज त्रिवेदी
र की कॉलबेल पुकारते मुर्गे की आवाज़ से इंसान जाग जाता है। क्या जागने की यह प्रक्रिया सही अर्थ में होती है? ईश्वर ने दिन-रात क्यों बनाए हैं ? दिन भर दौड़-धूप करके, मज़दूरी-मेहनत करके परिवार को पालने-पोसने के लिए ही ? और रात थके हुए इंसान के शरीर को आराम देने के लिए? ऊँघना और जागना यानी क्या ? दिनभर के कार्यों और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को देर शाम आराम के पलों में जाँचने के बाद संतोष मिले तो ही नींद आती है। जिस रात नींद न आए तो उसके अगले दिन दुबारा सख़्त होकर अपने आपको जाँचना चाहिए ।तड़के घर के काम में जुटी पत्नी, फूल जैसे हंसती बेटी या अपनी जनता को देखकर मन प्रसन्न हो, तो मानना चाहिए कि हम वाक़ई सुखी हैं । सुखी होने की यह यात्रा सुबह घर से शुरू होती है और शाम को घर आते ही पूर्ण होती है । घर से निकलते ही किसी पसंदीदा व्यक्ति से मिलना हुआ, तो मन प्रफुल्लित हो जाता है और अच्छे शगुन होने का आनंद मिलता है । फिर दिन के दौरान मन-ह्रदय से जो भी कार्य हों, उनमें सफलता, यश-कीर्ति और आत्मसंतोष मिलते हैं। यही ईश्वर का साक्षात्कार है। मानव का मन रहस्यमय है। कब कौन उसे भाए या न भाए, यह उसके ही हाथ की बात होने के बावजूद हाथों में नहीं रहती। मन तो मछली की तरह चंचल है । किसी भी क्षण वह फिसल जाता है । मन की एकाग्रता और दृढ़ता के साथ किसी अन्य के अभिप्रायों को परखकर सत्य की खोज करने में सफलता प्राप्त करें तो शायद हम जीवन के मार्ग पर सही क़दम चल पाएँगे । कईं बार हमें दूसरों की बातें सुनाने में आनंद आता है । उनकी बातों में से सार-असार को मक्खन के पिंड की तरह निकालने की सजगता कितनी ? हमारा अंधविश्वास, नासमझी और अस्वस्थता मन के गढ़ में बड़ा छेद कर देती है । ऐसे समय में हम अपने ही अस्तित्व को मानो लुप्त होने का अनुभव करने लगते हैं न ? ऐसी स्थिति में आसपास के लोगों पर हमारे संस्कार और सत्य का प्रभाव घटने लगता है, और उसकी आभा में हम क़ैद हो जाते हैं । यह सामान्य लगाने वाली घटना एक ही पल में दुर्घटना में तब्दील हो जाती है, जिसका कोई सरल इलाज़ नहीं होता ।
दुनिया में ज़्यादा ही बोलने वाले और मौन रहने वाले लोग चलते हैं । ज़्यादा बोलने वाले इंसान सामान्य रूप से निख़ालिस और भावनाशील होते हैं, वह तब तय होगा, जब उनका एक-एक वाक्य नाभि से निकलता हो । मौन रहकर ज़्यादा सोचने वाले लोगों का गणित सही होता है । वह लोग सिर्फ़ गिनती के लिए नहीं, जीवन जीने में भी गणित का राजनीति-कूटनीतियुक्त उपयोग भी कर लेते हैं । उनके लिए एक-एक शब्द की क़ीमत होती है । ऐसे इंसान सकारात्मक तरीक़े से व्यवहार करें तो समाजोपयोगी बनाते हैं और नकारात्मक बनें तब विनाश का पर्याय बनाते हैं । कुछ लोग व्यवहारशील होते हैं । जो समय के अनुसार सावधानी की नीति को अख़्तियार करते हैं । कुछ भोले लोग अपनी मूर्खता को सिद्ध करते हैं। ऐसे इंसान समाज के लिए अल्प नुकसानकारी साबित होते हैं, मगर दूषित तो कतई नहीं । ऐसे इंसान भोलेपन में कोइ अच्छा-बुरा काम कर भी दें तो सही हो जाता है । वह भविष्यवेत्ता नहीं होते मगर अपने दिल से पनपे हुए विचार को बिना सोचे प्रकट करने की उन्हें आदत होती है । परिणाम की गंभीरता उसमें नहीं होती है । कई बार किसी के लिए आशीर्वाद या श्राप स्वरूप हुए उच्चार फ़ायदा या नुकसान करते हैं । फ़ायदा हो जाए तो कहते हैं की "भगवान का आदमी" है और नुकसान हो तो कहते हैं की उसकी "हाय" लगी । ऐसी बातों में श्रद्धा और अंधश्रद्धा का टकराव होता है, सत्य-असत्य का और मान-अभिमान का भी टकराव होता है।
कुछ सामान्य सी लगती बातों से खंडनात्मक या सर्जनात्मक परिणाम मिलते हैं । परिवर्तन अनिवार्य है । वह सहज और सर्वस्वीकृत हो, यह ज़रूरी है । सवाल इतना ही है की उसमें हम कितने सहज हैं ? स्वीकृति में भी हमें अपनी समझ को जाँचना चाहिए, भेड़ों के प्रवाह की तरह जुड़कर मूर्खता साबित करना बुद्धिमानी नहीं है । संघर्ष किसको पसंद है? सच मानो तो प्रत्येक इंसान को शांति से जीना है, परिवार-समाज को चाहकर जीना है । तो फिर चारों ओर संघर्ष क्यों हो रहा है? जवाब एसा मिलता है की मुट्ठीभर लोग धन और सत्ता की भूख और मान-सम्मान और वासना को पाने के लिए शोर्टकट से नज़दीकी और खुद को चाहनेवालों का ही पहले भोग लेते हैं । उनके हाथ, पाँव और कंधे का सहारा लेकर उनकी ही खोपड़ी पर बैठकर आधिपत्य के भाव से सभारता प्राप्त करके कहकहा लगाते दिखते मिलते हैं ।
हमारी चेतना और संवेदना दिन-ब-दिन नष्ट होती जाती है और हमारी चमड़ी ही नहीं, मानसिकता भी खुरदरी हो रही है । जो आसपास के लोगों को खुरच देती है । किसी के दुःख से दु:खी होने की बात समाज के सामने बोलोगे तो भी लोग तुम्हें पागल कहेंगे । समाज का ऐसा पागलपन स्वीकारने के बाद भी समाज के उत्कर्ष के लिए काम करने वाले बहादुर और सन्नारियाँ आज भी देखने को मिलते हैं । जो बिना स्वार्थ से समाज के लिए समर्पित हैं । इस मायाजाल के बीच निजत्व को ढूँढ़ना पड़ता है । कुछ सेवा करने के लिए पूरा जीवन ख़र्च कर देते हैं । और फिर भी आत्मसंतोष मिला या नहीं यह प्रश्न सिर्फ़ हमारा नहीं, उनका भी होता है । मगर इस बात को स्वीकार करने की हिम्मत ही कहाँ ?
मुझे एक प्रसंग की याद आता है । महिलाओं के उत्कर्ष के लिए कार्य करने वाली "सेवा" नामक संस्था को कौन नहीं जानता होगा भला? इस संस्था में आरोग्य, बीमा, बालाकेंद्र, कागज़, कूड़ा इकठ्ठा करना आदि कई तरह के काम महिलाओं द्वारा किये जाते हैं । यह संस्था महिलाओं की मदद हेतु कई योजनाएँ भी चलाती है । जिसमें से एक बैंक सेवा है । श्रमिक महिलाओं के लिए इस बैंक का उद्भव कैसे हुआ, वह रसप्रद बात बताता हूँ ।
एक लाख करोड़ रुपये वाली सालों पुरानी बैंक की उगाही हमारे उद्योगपति चुकाते नहीं, फिर भी बैंक को चलाने वाले दिवालिये उद्योगपतियों के लिए धन की थैली खुली कर देते हैं । मगर कमरतोड़ मज़दूरी करनेवाले, पसीना बहाने वाले को कोइ दो कौडी भी देने को तैयार नहीं होता, तब पुराने कपड़ों के बदले बर्तन बेचने वाली चन्दा बहन व्यथित हो जाती है । वह 1974 की एक सभा में ज़्यादा ही व्यथित हुईं, वह ईलाबहन को कहती है - "बहन, आप हमारी बैंक निकालो न !"
तब ईला बहन ने प्रत्युत्तर में कहा था - "बैंक बनाना हमारी क्षमता के बाहर का कार्य है । हम तो ग़रीब हैं ।"
अब तक दिल की भड़ास निकालती चन्दा की सूझ-बूझ उसे अन्दर से बोलावाती है - "हाँ, ग़रीब तो हैं, मगर हैं कितने सारे !"
श्रमिकों के संगठनों का प्रतिघोष देने वाले ये शब्द "सेवा" की बैंक बनाने में प्रेरक साबित हुए । इस बैंक के बारे में लिखी गयी अँगरेज़ी पुस्तक 'We are poor, but so many' चंदा बहन की देन है ।
सामान्य लगती बर्तन वाली इस महिला का छोटा-सा लगता विचार एक क्रान्ति की ज्योत जलाता है और उसमें से महिला उत्कर्ष के लिए राजमार्ग बनाता है । हमने कभी सोचा है की हमारे एकमात्र छोटे से काम से, विचार से या व्यवहार से इस समाज का कितना भला और कितना बुरा हो सकता है? विचार तो वेदवाणी और कुविचार तो विकार साबित हो सकता है । जिस स्वरूप से वह बाहर आएगा, उसी स्वरूप में उसका परिणाम मिलेगा । सुबह अपने घर के अंदर बिछौने से जागा हुआ इंसान सचमुच नींद उड़ाकर जाग गया तो समझो की सिर्फ़ सुबह ही नहीं, उसका जीवन भी सुधर जाता है और ऐसा इन्सान प्रफुल्लित होकर जीता है और समाज को भी प्रसन्नता अर्पित करता है।
चाय पीने का मेरा भी मन है...
चाय हमारे लहू में घुलमिल गयी हो, ऐसा नहीं लगता? चाय के बारे में कोई जाती-पाती का भेद नहीं है और ना अमीरी-गरीबी का| मानो चाय तो सर्वस्वीकृत है | चाय के बारे में कई विशेषताए या तुकबंदी भी प्रसिद्द है | कश्मीर में चाय की असली पत्ती के बदले विशेष प्रकार की जदीबुत्तीयों के कंदमूल को ही उबाला जाता है | उसमे नमक डालकर नीम्बू का रस निचौडा जाता है | ऐसी चाय को सोल्टी-टी कहते है | सोल्टी-टी के साथ पतली-मीठी पापड जैसी रोटी सुबह के नाश्ते में ली जाती है | जिसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है की पहाड़ियों की ऊंचाई के कारण डी-हाईड्रेशन होने का खतरा रहता है | उसी कारण नमक और नीम्बू का मिश्रण किया जाता है | कश्मीर में जो नमक सल्पाई किया जाता है वह गुजरात के सुरेंद्रनगर के पाटडी और खाराघोदा क्षेत्र से है और वह प्रथम श्रेणी का है | जो आमतौर से यहाँ के लोगों के नसीब में कहाँ? दार्जिलिंग में चाय के पौधों की पत्ती को जब उबाली जाती है तो उसकी असली सुगंध हमारे मन को ताज़गी से भर देती है | क्यूंकि उसमे प्रकृती की अनूठी सुगंध होती है | दीव में वांजा जाती के लोग प्रतिदिन शाम के वक्त चाय के साथ दो केणां (छोटे, पीले, सुनहरी छीलकेवाले केले) का भोजन लेते है | उनकी चाय में दूध नहीं मगर पुदीना और नीम्बू के रस का मिश्रण होता है | दक्षिण भारत में ऊंचे कद की तांबे की कोटली (चायदानी) के चोंगे में लकड़ी का डाट दिया जाता है | जब डाट निकाला जाता है तो उसमे से निकलती भांप की महक तन-मन में फुर्ती का संचार कर देती है | तम्बाकू और कोफी के मुकाबले चाय में निकोटिन की मात्रा मामूली होती है | पित्त (वात और कफ़) प्रकृति के लोगों के लिए चाय तो मानो एसिड ही बन जाती है ! उत्तर में चाय और दक्षिण में कोफ़ी ज्यादा प्रिय होती है | कुछ समय पहले हुए संशोधन के अनुसार चाय पीने से हार्ट एटेक की मात्रा कम होती है | मगर ऐसे संशोधन के बारे में दिन-प्रतिदिन बदलाव आता है |
भारतीय समाज में बेटी जब बड़ी होती है तो सबसे पहले उन्हें चाय बनाने की तालीम डी जाती है, उसके बाद ही खाना पकाने का काम ! जब कोई अपने बेटे के लिए लड़की देखने जाते है तो वह चाय कैसी बनाती है उन पर ही ज्यादा निर्भर रहते थे | मगर आज के ज़माने में ऐसा नहीं है | गुजराती भाषा में चाय के लिए - "चा पीधी? या चा पीधो?" - बोला जाता है | मानो हम हिन्दुस्तानीओ के लिए चाय ही "सर्वधर्म समभाव" की सुगंध फैलाती है | ट्रेन में जब हम सफ़र करते है तो तड़के कांच की प्याली खनकने की आवाजें या प्लास्टिक की प्याली पर लम्बे नाख़ून से ऊंगली फेरकर कर्कश आवाज करता चायवाला "चाय बोलो भाई चाय.. " - एलार्म की घंटी का कार्य करता है |
चाय के लिए महंगे पारदर्शक कांच के टी-सेट, सिरेमिक, स्टील या सिल्वर और जर्मन मेटल के टी-सेट का उपयोग होता है | उसके अलावा प्लास्टिक, थर्मोकोल और मिट्टी की कुल्हडियों में चाय दी जाती है | चाय के लिए गुजराती में एक तुकबंदी है -
"कपटी नर कोफी पीवे, चतुर पीवे चा,
दोढ़ डाह्या दूध पीवे, मूरख पाड़े ना !"
अमदावाद में एल.डी. इंजीनियरींग कोलेज और यूनिवर्सिटी के सामने बैठकर कोलेजियाँ लडके-लड़कियां "दो कटिंग" कहते देखना अच्छा लगता है | वहां पढाई कम और मौज-मस्ती की बाते ज्यादा होती है | यही मीरजापुर-लाल दरवाजा के पास "लक्की" चाय जिसने नहीं वह भला अमदावाद के बारे में क्या जाने? लक्की की चाय और मस्काबन दिन में एक ही बार खाकर मैंने भी कई दिन गुज़ारे है, वह स्मरण आजा भी ताज़ी चाय जैसा ही है ! अमदावाद की पतंग और सूरत की टेक्षप्लाज़ा होटल में दस वर्ष पहले पचास से पचहत्त रुपये में एक कप चाय मिलती तो आश्चर्य लगता था | डायाबिटिस के मरीज़ भी चाय की मोहकता को नज़रअंदाज़ नहीं कर पातें, इसी कारण से तो सुगर-फ्री का संशोधन हुआ न ?
आधी चाय में तो लोग मुश्किल कार्य भी करवा लेते है | सचिवालय हो या कोई भी सरकारी दफ्तर, चाय के बहाने कर्मचारी को बाहर ले जाकर आप छोटा-बड़ा सौदा भी कर सकते है | कईबार तो किसी ख़ास होटल की चाय पीने के बाद फिर से वहीं जाने को मन करता है | पूछो क्यूं ? उस चाय के साथ
अफ़िम की डोडी भी उबाली जाती है | थोड़ा नशा हो तो अच्छा लगता है न?
गुजरात के सुरेंद्रनगर में "राज" की चोकलेटी चाय का मजा ही कुछ अलग है | उसके मालिक स्वर्गीय सजुभा बापू काउंटर पर बैठकर बोलते है तो घडीभर लोग सुनाने खड़े रह जातें hai | आंबेडकर चौक में उनकी होटल के सामने ही रेलवे की दीवार है | शाम के वक्त वहां मजदूर इकट्ठे होते है | दातून बेचने वाले देवीपूजक भी होतें है | जज़दिक में ही कागज़ के पेकिंग मटीरियल की फेक्ट्री है | उन सब के लिए सजुभा बापू अपने वेइतर को सूचना देते सुनाई देतें है, उसी का नमूना आपके लिए; "बे भींते (दीवार), दोढ़ कागळ (कागज़ की फेक्ट्री) , आदधी दातण (दातून वाला) आदि...
हमारे मित्र डॉ. रुपेन दवे सुबह १०-बजे मरीजों पर गुस्सा हो जाए और कम्पाउन्डर घनश्याम रोज़मर्रा की तरह डॉक्टर पर गुस्सा करें तब पास में रहे केमिस्ट जिज्ञेश को भी गुर्राहट करते हुए देखने का मौक़ा कीं मरीजों को मिला है | ऐसा क्यूं होता होगा, भला ! अरे भाई, सुबह दस बजे का समय तो चाय का होता है, बेचारे सुज्ञ मरीज़ क्या जाने?
गुजरात के जानेमाने लोक-कलाकार बाबू राणपुरा चोटिला के पास केतना मेहता की फिल्म "मिर्च मसाला" में काम कर रहे थे, तब सुरेंद्रनगर की पतारावाली होटल में स्वर्गीय स्मिता पाटील, नसीरुद्दीन शाह, सुरेश ओबेरॉय और डिरेक्टर केतन मेहताने बाबू की प्रिय चाय पीने की जिद्द की थी |
गुजरात में छोटे शहरों में चाय की होटल पर ऑर्डर देने की ख़ास स्टाईल होती है | जैसे की; " एक अड़धी चा, पंखो चालु करो, आजनु छापुं लावो तो भाई ! रेडियामां भजन वगाड़ोने यार ! बहार सायकल छे, एमां तालूं नथी, ध्यान राखजे |" आधी चाय के ऑर्डर में होटल के वेइतर को खरीद लिया न हो जैसे? बारिश के मौसम में चाय का महत्त्व ज्यादा होता है | अगर कोई हमसे मिलकर खुश हो जाता है तो कहता है; "चलो, आईसक्रीम खाए | उसमें अपनी खुशी को बांटने का आनंद होता है | मगर, मन उदास हो, थकान हो, दू:ख की बात हो या मन पर बोज... ऐसे समय अगर कोई अपना मिल जाए तो सहजता से ही शब्द निकलते है; "आईऐ, चाय पीतें है |" अंत में हिन्दी कविश्री ज्ञानप्रकाश विवेक के इन शब्दों को समझने की कोशिश करें...
"शेष तो सबकुछ है, अमन है; सिर्फ कर्फ्यू की थोड़ी घुटन है
बंद मुठ्ठी

Children have more need of models than of critics. (बच्चों को नुक्ता-चीनी करनेवालों से ज़्यादा ज़रूरत आदर्श-नमूने की है)
- जोसेफ़ होबेक्स्ट
कुछ दिनों पहले एक अँगरेज़ी माध्यम की स्कूल में पाँचवीं कक्षा में पढ़ती छात्रा को मासिकधर्म शुरू हो गया । जब इस घटना की जानकारी उसकी शिक्षिका को हुई तो उसके आघात और आश्चर्य की सीमा न रही । उस छात्रा के वर्ग के बच्चों में भी आश्चर्य और दर की भावना जगी थी । इस वर्गखंड के बच्चों की सामान्य उम्र दस वर्ष के आसपास ही थी । इस बात पर पिछड़े इलाक़े की एक पाठशाला की शिक्षिका ने बताया की ऐसी घटना नई नहीं है, क्यूंकि मैंने भी ऐसे क़िस्से देखें है । उसकी बात से हम सब की चिंता बढ़नी चाहिए न? अपनी उम्र से पहले ज़ल्दी से परिपक्व बनते बच्चे हमें अच्छे लगते है, उनकी बढ़ती जानकारी (ज्ञान नहीं) से हम उन्हें फुलाकर किसी और के पास बखान करने से पहले हमें सावधान होने की ज़रूरत है । बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ उनकी नैसर्गिक समझ-बुद्धि का विकास होना चाहिए । ये उससे ज़्यादा बढ़ जाएँ, तो भी विकृति ही है । हम जाने-अनजाने में उनका नुकसान कर रहे हैं ।
हमारी सामाजिक विचारशैली ने मौलिकता खो दी है । धन-संपत्ति की लालसा इतनी प्रबल बन गयी है कि इंसान की हैवानियत फूल जैसे मासूम बच्चों का शोषण करते हुए भी नहीं हिचकिचाती । इंसान के शरीर की विकृति ज़हर ओकने लगे तब उसकी मानसिकता समाज के लिए ख़तरा बन जाती है । इस पूरी स्थिति के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं । गुजराती लोकगायक स्वर्गीय दुला भाया काग के एक दोहरे का अर्थ कुछ इस प्रकार है - "सूखे घास के पूले के गंज में अगर आग लगे तो उसे बुझाने के बदले जितने पूले को बचा सके उसे बचना चाहिए ।" मतलब कि समाज में विकृति की आग बेकाबू होती जाती है, तब हम अपने बच्चों को उससे बचा सकें तो अच्छा । इसके लिए हमें घर से शुरुआत करनी होगी । पति-पत्नी को संयमी और सात्विक व्यवहार करना चाहिए । उत्तम विचारों के लिए उत्तम पठान, संगीत और धार्मिकता के कारण घर का वातावरण पवित्र बनेगा । यह पवित्रता एक से की तक पहुँचेगी । क्षणिक सुख की इच्छा विकृति को खींच लाती है । हमें इस कमज़ोर पल का निशाना साधकर उसे तोड़ना होगा ।
जातीय शिक्षा को पाठशाला की कक्षा में रखना हमारी समझदारी हैं, यह मानना भी बावलापन है । इसके लिए पहले बच्चों का मनोवैज्ञानिक अभ्यास करने के बाद ही उन्हें जातीय शिक्षा देनी चाहिए । छोटी उम्र में मासिकधर्म-स्त्राव से प्रभावित बच्चियों के लिए आबो-हवा, रासायनिक घास-पात-गोबर-दवाईयों से युक्त खुराक़ और मीडिया भी ज़िम्मेदार हैं । प्रगति के नाम पर अंधा अनुकरण की दौड़ हमने पचास वर्षों से लगाई है । इस पर भी अँगरेज़ों से कुचले हुए रहने के बाद - अब हम स्वतन्त्र हैं - ऐसा भाव ज़्यादा ही प्रकट होता है । कृषिक्षेत्र में रासायनिक पदार्थों के उपयोग से उत्पादन ज़रूर बढ़ा है, मगर उसमें से मिट्टी की महक, कुदरती मिठास और सात्विकता चली गई है । हमारी संस्कृति में गोबर के घास-पात और गौमूत्र की महिमा अनूठी है । विदेशी हमारी संस्कृति और आयुर्वेद को अपनाकर कुदरत की और मुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं और हम पश्चिमी चकाचौंध में चौंधियाने के लिए बेकार कोशिश करते हैं । फलस्वरूप हमारी नस्ल कंगाल और विकृत पैदा होती है ।
सुबह में ज़ल्दी से जागकर स्कूटर-रिक्शा में बच्चे पाठशाला जाएँ, पूरे दिन बैठकर पढ़ें, शाम को टी,वी, के सामने बैठकर भोजन करें तब उनका मन भोजन में नहीं होता । भोजन के समय टी.वी. पर दिखती घटनाओं के साथ मानसिक तनाव का भोग भी बनाता है । इसलिए भोजन में लार मिले, उसकी मिठास मिले, अच्छी तरह चबाकर भोजन को पेट में उतारें, ऐसी संभावना बच्चों में नहीं होती । फलस्वरूप बदहजमी, गैस, एसीडिटी जैसे दर्दों के साथ मानसिक तनाव के भोग भी बनाते हैं । थाले बैठे जीवन के कारण शरीर मेदस्वी बन जाता है । हमारी फ़िल्मों-सीरियलों में भी ज़माने की माँग के बहाने भूत-प्रेत, सेक्स और मारधाड़ के दृश्यों का अति उपयोग होने लगा है । परिवार में बड़े और बच्चे बेशर्म होकर यह सब देखते हैं । फ़ैशन के नाम पर अरूचिकर वस्त्रों में बेटी को देखकर शर्म महसूस करने के बजाय प्रोत्साहन दिया जाता है । ऐसे माहौल में आदर्श परिवार की कल्पना करना नामुमकिन है ।
हमारे राष्ट्र में गांधीवादी विचारधारा ही क्रान्ति ला सकेगी । क्यूंकि उसमें प्रवृत्ति और प्रकृति का सीधा संबंध है । वहां सहजीवनी और सहअभ्यासक प्रवृत्तियों का मेल है, ये कोन्वेन्ट में कहाँ? ऐसी संस्थाओं में पारिवारिक भावनाओं का जतन और कृषि-स्वास्थ्य जैसे विषयों के कारन मानसिक-शारीरिक गढ़न भी होता है । श्रम और सेवा के गुण विक्सित होते होने के कारन ऐसे बच्चे सामाजिक और राष्ट्रीय सेवा में ज़्यादा अग्रेसर रहते हैं । वहाँ मिट्टी की मोहब्बत होने के से अच्छा स्वास्थ्य और सत्त्वशील विचारधारा बहती है । हमने कभी सोचा है की बच्चे पाठशाला से छूटकर आएँ, तब हम उनका सहर्ष अभिवादन करें? पूरे दिन की उनकी प्रवृत्तियों की जानकारी प्राप्त करें, उनके विचार, प्रश्नों को सुनें और सर पर प्यार भरे हाथ से सहलाएँ? शाम का भोजन परिवार के सभी सदस्य साथ मिलकर करें । टी.वी. शो देखने के बदले किसी देश-विदेश की कोइ उत्तम कहानी या घटना की बात करें तो कैसा? इस से उनको पठान का शौक़ भी बढेगा और उनके विचारों के या कल्पना के क्षितिज का विस्तार भी होगा । वे विचार ख़ुद उनके ही होंगे, मौलिक होंगे, ठीक है न? बच्चों के साथ शायद हमारा बचपना भी लौट आए, ऐसा भी तो हो सकता है ।
बच्चों के साथ आत्मभाव साधकर यह सब करने का हमारा सघन प्रयास और हमारा नि:स्वार्थ प्यार होगा तो रेतघड़ी की तरह फिसलती आज की युवा पीढ़ी की हमारे द्वारा हुई ग़ैर ज़िम्मेदाराना परवरिश की बंद मुठ्ठी कहीं खोल न दें । शायद, उसकी बंद मुठ्ठी में ही हमारे अस्तित्व और असलियत टिक जाएँ, ऐसा भी हो
राष्ट्र भाषा हिन्दी : कल, आज और कल - पंकज त्रिवेदी
किसी देश की अपनी एक अलग राष्ट्र भाषा होती है | जिसके गौरव के लिए हर आदमी सोचता रहे, यही उस भाषा के अस्तित्त्व का प्रमाण सिद्ध करता है | भाषा और संस्कृति सिक्के के दो पहलू समान है | किसी भी राष्ट्रभाषा का कार्य एकता के सूत्र में पिरोनेवाले मोतीयों से कम नहीं होता | पिछले 500 से ज्यादा वर्षों तक हमारे देश की भाषाएँ प्राकृत, संस्कृत, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी भी रही है |
मातृभाषा, व्यक्ति को अपनी जन्मभूमि के प्रति ह्रदय की भाषा सिखाती है | जिसके लिए सिर्फ दिल की धड़कन ही जरुरी है | जब कि राष्ट्रभाषा तो हमारे पूरे राष्ट्र की एकता, समानता और गौरव का प्रतीक बनकर हमारे जीवन के धागों को बुनती है | और उसी के बलबूते पर किसी भी राष्ट्र का नया निर्माण होता है |
जापान और चीन जैसे कईं देशों ने अपनी ही भाषा का सदैव प्रयोग किया है | फिर भी उनकी तरक्की में कभी भी बाधा नहीं आई | हमारे कुछ राजनीतिज्ञों ने हिन्दी भाषा को केन्द्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है | फिर भी राजनीतिज्ञों को बख्शा भी नहीं जा सकता | दक्षिण भारत में जो प्रांतीय भाषा का प्रयोग हो रहा है, वो तो ठीक है मगर राष्ट्रीय फ़लक पर भी वहा लोग हिन्दी का अस्वीकार कर रहे हैं, वो तो हम जानते ही है न !
यह बात पहली नज़र में राजकीय मुद्दा भले ही लगे, फिर भी भाषा विज्ञानी, साहित्यकार, शिक्षक और संस्कृति के प्रहरियों को कुछ ठोस कदम उठाना जरुरी हो गया है | अगर यही बात चलती रही तो सभी प्रांत के लोग अपनी ही भाषा को महत्त्व देने लगेंगे | मुम्बई में भी "हमची मुम्बई" के मुद्दे के साथ "मराठी मानुष" की मराठी भाषा भी प्रभावक है | राजनीतिज्ञों की नीति-अनीतियों के कारण भी जनमानस में दुविधा बढ़ती है और राष्ट्रीय एकता की माला के मोती बिखर जाते हैं |
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है और हर भारतीय के
मन में उसके प्रति गौरव का आसार भी नज़र आये तो हमारा सपना अवश्य साकार होगा | अमरीका में कुछ अरसे से हिन्दी के प्रति सम्मान की भावना से देखा जाता है | वहां की 27 युनिवर्सिटीओं में हिन्दी अभ्यास के लिएँ सुविधा उपलब्ध की गयी है | अपनी अंग्रेजी को समृद्ध करने के लिए उन्होंने हिन्दी और संस्कृत भाषा के शब्दों का विपुल मात्रा में उपयोग शुरू कर दिया है | भारत की कईं प्रादेशिक भाषाओँ में से बंगाली, तमिल, मराठी और मलयालम के बहुत से शब्दों को वहां के शब्दकोश में स्थान दिया गया है | शायद सन 2000 में ही "वेबस्टर" की "न्यू वर्ल्ड कोलेज डिक्शनरी" में भारतीय भाषाओँ के शब्दों को शामिल करके "हेल्लो" और "हाय" के बदले "नमस्ते" शब्द चमकता हुआ दिखाई देता है | जैसे कि "हमिर्टेज " के बदले "आश्रम" ही कहा जाता है | अमरिकन शब्दकोष में "हरिजन" शब्द के अर्थ में बताया गया है कि - "भारत में वह अछूत थे और बाद में अनुसूचित जातिओं में शामिल किए गए | चेंबर ऑफ़ 21st सेंचुरी डिक्शनरी, कोलिन्स मिलेनियम एडिशन और ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी हिन्दी शब्द दिखाई पड़ते हैं |
यह भी सच है कि दुनिया के सरेराश 43.7 करोड़ लोग हिन्दी भाषा में बात करते हैं | हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानीयों ने उर्दू और हिन्दी दिल से सम्मान दिया | दोनों का व्याकरण एक ही आधार पर है | मगर उर्दू, फारसी लिपि में और हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है | अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी भाषा का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है | फिर भी कईं साहित्यकारों और भाषा विज्ञानीओं ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है | हमारे राष्ट्र की विविध भाषा और विदेशी भाषा में से हिन्दी अनुवाद विपुल मात्रा में आज भी हो रहा है | मगर हमारी भाषा में से विदेशी भाषा में कम मात्रा में अनुवाद हो रहे हैं |
हमारे साहित्यकारों ने अंगरेजी, पोलिश, जर्मन, हंगेरियन, डेनिश तथा चीनी जैसी कईं भाषाओँ का अनुवाद करके विश्वस्तरीय एकता का परिचय दिया है | हमारे पास भी बड़ी मात्रा में संस्कृति-साहित्य का खजाना है | क्यूं न हम उसे विश्व के सामने रखें? हाल ही में जानीमानी लेखिका शोभा डे अपने पुस्तकों के गुजराती अनुवाद के लोकार्पण कार्यक्रम में अहमदाबाद आई है | उन्हों ने गुजराती चेनल को दिए इन्टरव्यु में कहा कि - "मै अंग्रेजी में पढी और लिखती हूँ | मगर प्रादेशिक भाषा की समृद्धि न होने के कारन मैंने क्या गँवाया है, यह अब समज में आया" | गुजरात में थीं तो कहा - "गुजराती भाषा में इतने बड़े साहित्यकार है मगर एक कमी यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुस्तक मेले में उच्च स्तरीय अनुवाद के साथ प्रादेशिक साहित्यकारों को उपस्थित रहना चाहिए |" शोभा डे ने ये बहुत ही बड़ी बात कह दी है |
हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार में प्रांतीय भाषा का ही उपयोग होता है | मगर केंद्र सरकार के हस्तगत जो भी कचहरी या संस्थाएं है, कम से कम उसमें तो हिन्दी भाषा का प्रयोग अवश्य होना चाहिए | मगर वहां सिर्फ सूचना लिखी जाती है, अमल खुद कर्मचारी भी नहीं करते | अंग्रेज शासन के दौरान तो अंग्रेजी का ही वर्चस्व था | मगर "भारत छोडो" आन्दोलन के वक्त राजनेताओं ने हिन्दी में ही जन
जागृति के सन्देश दिए थे | हम हिन्दुस्तानी है और हमारे विचार, पीड़ा और खुशी का इज़हार हिन्दी में ही हो उससे अच्छा क्या होगा भला ! अब तो सायबरयुग में कंप्यूटर का बोलबाला है | उसमें भी हिन्दी भाषा का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है | हम कंप्यूटर में प्रांतीय और अंग्रेजी के साथ हिन्दी भाषा का ज्यादा ही उपयोग करेंगे तो राष्ट्रीय भावना का संतोष मिलेगा और देश की एकता में भी हम शामिल हो जायेंगे |
किसी भी युग में परिवर्तन के लिए राष्ट्र का कूटनीतिज्ञ, कुशाग्र बुद्धि प्रतिभा, राजनीतिशास्त्र के प्रणेता और आजीवन शिक्षक चाणक्य आज भी प्रस्तुत है | विश्व आज प्रलय की चोखट पर खड़ा है | हम सब मिलकर चाणक्य की दिखाई राह पर चलाकर राष्ट्र की एकता का नया निर्माण करें | क्यूंकि, आज हमारा भारत उस बुलंदी को छू रहा है, जहां पर विश्व के प्रत्येक देशों को महासत्ता बनाकर छूना है |
हमारे जवानों ने अपने प्रेम की बलि चढ़कर भी राष्ट्रप्रेम को महत्त्व दिया है | राष्ट्र के लिए शहीद हुए हैं | उनकी भी बीवी थी, बच्चे थे | और हम खुशी बाँट रहे थे | अब हम सबको साथ मिलकर ही आगे बढ़ना होगा | हमारे पास प्यार के मोटी और राष्ट्रभाषा का धागा होगा तो अवश्य साथ-साथ रह पाएँगे | हम वह करके दिखायेंगे | हम भरातीय है, हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है और हमें उन पर नाज़ है |
"ॐ", गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फूट रोड, सुरेंद्रनगर-363002 Gujarat
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