अहसास - पंकज त्रिवेदी
पता नहीं है क्यूं
आज उदासीने डेरा डाला है
ऐसा भी क्या हुआ, हर कोई पूछता रहता है
और क्या कहूं मैं उनसे,
ढूँढता हूँ मैं भी इस प्रश्न का उत्तर
याद आती है जब भी उनकी
हर पल, हर लम्हें
यहाँ से वहां तक पटकता है मेरे पूरे अस्तित्त्व को
और
लाचार बनाकर देखता हूँ खुद को
एक कोने में खडा होकर, जैसे कोई अजनबी सा हूँ मैं !
और, किसी के साथ हो रहा मज़ाक..!
कौन सी पल होगी, जिसमें
उसकी यादें न हो और न उसका साया...
बात सिर्फ यादों की ही क्यूं हो भला,
वो खुद भी समाई है मुझमें...
शायद मेरे इन शब्दों को वही लिखवाती है और
न दिखाकर भी वो साक्षात है मेरे अन्दर-बाहर
एक अहसास बनाकर...!
कहती है -
आज तुम्हारा जन्मदिन है और मैं हूँ की
उनके ही शब्दों को संजोकर बैठा हूँ आजतक
जो अब मोतीओं की भाँति बिखरता हूँ आप लोगों के सामने
क्यूंकि -
वो अहसास है भी और नहीं भी...
पता नहीं,
आप कहाँ तक पहुंचकर समज़ पाते हैं
ईसी अहसास को...
जन्मदिन : 11 मार्च को
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2 comments:
aadariya bhai saab !
saadar pranam !
aap ki abhivyakti aap ke dwand ko naman !aap ki antar vedna shabdo ke zariye man ko sparash kart hai ,
लाचार बनाकर देखता हूँ खुद को
एक कोने में खडा होकर, जैसे कोई अजनबी सा हूँ मैं !
और, किसी के साथ हो रहा मज़ाक..!
naman !
प्रिय सुनिल,
बहुत दिनों बाद तुम्हें देखकर आनंद हुआ | तुम्हें ये कविता अच्छी लगी ये मेरे लिएँ खुशी की बात है |
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