Posted by
Pankaj Trivedi
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कविता
भ्रूण ह्त्या...
वृद्धाश्रम के दरवाजे के
सहारे खड़े यह
मेरे ध्रुजते दोनों पाँव
रहते थे कभी अडिग....!
लगता है...
बेटी जो होती तो
संभालती मुझे माँ बनाकर
उन्मत खड़ा रहता
देव मंदिर में....!
शादी का ढोल बजने लगा
और मेरे ह्रदय की खिड़की खुल गयी
देखा मैंने...
बिदाई के समय
ईर्ष्या आती है मुझे उनके सुख की
पीड़ा देती है आज मुझे
मैंने करवाई हुई उए भ्रूण ह्त्या का
पाप... !!
(बेटी बचाओ अभियान- पर लिखी कविता)
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3 comments:
पाप के बोझ से दबी भावना को बखूबी लिखा है
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका, मनोज कुमार,की प्रस्तुति राजभाषा हिन्दी पर, पधारें
संगीता जी और राजभाषा,
आप दोनों का धन्यवाद
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