ग्रीष्म की छुट्टियाँ और छाँव की खोज - पंकज त्रिवेदी
ग्रीष्म की छुट्टियों में माता-पिता के साथ रहने और खेलने का मौक़ा बच्चों को नसीब से ही मिलता है । मगर जो समय मिलता है वही थोड़े दिनों की छुट्टियाँ होती है । बाक़ी तो आगे ज़िंदगी और पीछे हम सब भागते ही रहते हैं । घर के कोने-कोने में घोंसला बनाती चिड़िया और उनके बच्चों की चहचहाट सुनाने का यह उत्तम समय होता है । मगर हमारी दंभी व्यस्तता के बीच समय ही कहाँ? बच्चे पढ़ते हैं, वह विशाल केम्पस ग्यारह महीने तक छात्रों की चहल-पहल से ठाट-बाट में रहता है । सिवा, बारहवाँ महीना । ग्रीष्म की आलसी छुट्टियाँ । सख्त धूप से खौलती धरती और अकेला इन्सान भीतर से तरसता हुआ मानो पागल बनकर चींखने को मथता है.... मथता है... आवाज़ दबने लगे और फिर वही प्रयत्न के लिए इंसान का दम भी घुटने लगे ! छुट्टियों में ख़ाली केम्पस भी इसी तरह घुटन महसूस करता होगा?
समग्र केम्पस में रहे ऊँचे पेड़ ग्रीष्म की अति गर्म हवा के सामने सीना तानकर खड़े है, जैसे जवान! इसे जवानों से प्रेरणा लेकर जीनेवाला छोटा-सा कर्मचारी अब तो चट्टान जैसे मानसिकता को हज़म करके बैठा है । वह सोचता है, यहाँ रहकर पढ़नेवाले छात्रों को क्या सीखना है? अभ्यासक्रम तो स्पाईडरमैन की जाल जैसा है । हाँ, उसे सीखना है और यूं ही विषमताओं के बीच किसी अन्य को भी निभाना है । शरीर में से टपकते पसीने का भक्षण करके इस धरतीने तो मानो अपनी असलियत खो दी है ! जहाँ हाथ डालो, खारेपन का दरिया । इंसान कौन सी आस में जीये ? निष्ठा से कार्यकरो तो कहते हैं कि यह आदमी तो फ़लां महानुभाव का चमचा है । कार्य न करो तो कहते हैं की यह आदमी निकम्मा है । इस तरह किसी के नाम की मोहरावाले इन्सान से शुरू होती यह यात्रा निकम्मा बनाने तक पूरे इन्सान को अकाल रि-टायर्ड कर देता है । छुट्टियों में क्या करें ? यह यक्षप्रश्न है । छात्र छुट्टियों का इंतज़ार करतें है । छट्ठे पंच के अनुसार अध्यापक पैंतीस से एक लाख तक की तनख़्वाह काँख में दबाकर अपने परिवार को मौज-मस्ती करवाने निकल पडते हैं । तब क्लासरूम में मेहनत का पसीना नहीं बहानेवाला शिक्षक, पसीने की खट्टी गंध से भी आनंद लेता है । छुट्टियों का हेतु अभीतक हम समझ नहीं पाएँ या नहीं समझाया किसी ने आनेवाली पीढ़ी के शिक्षकों को । पूरे साल के ग्यारह महीने तक शिक्षणकार्य करने के पश्चात शिक्षकों को घर-परिवार के सदस्यों के साथ घूलमिलकर रहना है। पत्नी-बच्चों को सच्ची मेहनत की कमाई से किसी हिलस्टेशन या धार्मिक जगह घूमने ले जाकर प्रेम-प्रकृति का साक्षात्कार करना होता है । जहाँ मन को शान्ति मिले, एकाग्रता मिले और बीचबीच में नया पढ़ने, सोचने या सीखने और नववर्ष को क्लासरूम में आनेवाले छात्र के लिए अपनी मानसिकता को ज़्यादा परिपक्व बनाकर अपने अस्तित्व को परिमार्जित करने का अवसर यानी ग्रीष्म की पूरी छुट्टी ।
मुझे ऐसा लिखने का विचार कैसे आया? शायद आपको यह प्रश्न हुआ होगा, मुझे भी हुआ था इसीलिए आपके समक्ष रखा । गर्मी के दिनों में बाहर खडा इन्सान जैसा भिखारी असह्य ताप के कारण भून जाएँ ऐसी स्थिति है । उसे अब आदत हो गयी है । एक चिड़िया गर्भवती है । अंडे से निकालने वाले बच्चों को इस दुनिया के खेल उसे समझाने है । क्या करें बेचारी ? कहाँ जाएँ? अब पेड़ों की कटाई बेरहमी से हो रही है । और सीमेंट के घरों में अपने घोंसले को बनाने की मजबूरी को भी हज़म कर चुका है इस छोटी- सी चिड़िया का पेट ! इन्सान में से हैवान बने सुव्वारों ने गिर के महाराजाओं का जीवन हराम कर दिया है और हमारे धृतराष्ट्र बने वन अधिकारी अपनी धरतीमाता के शेरों की दलाली करने बैठे है । जानवर से भी कमीने यह अधिकारी पैसों के लिए ख़ून के व्यापार के सौदे भी करें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए । निर्दोषपर्यटकों को जाँच के बहाने परेशान करनेवाले यह अधिकारियों की नज़रों से शिकार कैसे बच पाएँ? अबतो गिर से शेरों का तबादला करने के लिए काफ़ी दबाव बढ़ा है । पशु-पक्षीओं के साथ गंगास्वरूप मेनकागांधी भी पर्यावरण बचाने की मुहीम का बोझ ढो रही है । कौन रहेगा उनके साथ ? चिड़िया ने आख़िरसमाधान कर लिया। आपके-मेरे सीमेंट के घरों में लाईट के मीटर बोक्स के नीचे-ऊपर, कहीं कोने में पड़ेपुस्तकों, जो भाग्य से ही पढ़ने का समय मिलता है, उन पर घोंसला बनाया करती है ।
छुट्टियाँ यानी टी.वी. देखना । फ़िल्म देखना । बेशर्म नटीयों के डांस देखती आज की टीनएज़र पीढ़ी को बचाने की ज़रूरत है । बच्चों को नाचते देखकर हर्षोन्मत होते माता-पिता फ़ोरवर्ड होने का दावा करतें है ।क्राईम न्यूज़ के एँकर मानो दर्शकों को धमकी दे रहें हो ऐसा लगता है और अमिताभ के लाडले ने शादी की हो या क्रिकेटर शोएब मालिक और सानिया मिर्ज़ा की शादी हो... चेनल वाले बिना वजूद के ऐसी ख़बरोंका दूषण नई पीढ़ी के दिमाग़ में ज़हर की तरह भर देते हैं । टी-20 क्रिकेट एक्ज़ाम के समय में हो तो भी शिक्षा मंत्री के पेट से पानी भी नहीं हिलता । वन-डे टीम से जिसे निकाला गया हो, वोही खिलाड़ी यहाँ पर रनों की बारिश करता है । यह मालामाल क्रिकेट का कमाल है न ? चीयर्स लीडर का कुछ जगहों पर विरोध हो रहा है तो एक समय मंदिरा बेदी के "एक्स्ट्रा ईनिग्झ" कार्यक्रम में चारु शर्मा इतना बखान करने लगा था कि उसे यह विचार भी नहीं आया कि सभी देशों के राष्ट्रध्वज की मोहर वाली साड़ी पहनने की मंज़ूरी दे दी थी । उसमें भारत का राष्ट्रध्वज पैरों में था । सिर्फ़ हमारे ही क्यूं, किसी भी देश के राष्ट्रध्वज की तौहीन करने का अधिकार मंदिरा को किसने दिया? ग्लेमर के आगे हम देश के गौरव को भी भूल रहे हैं । हमारे देश में अफज़ल को फाँसी देने और कसाब पर सिकंजा कसने के लिए अभी भी सालों लगेंगे । देश के गद्दारों के बारे में निर्णय लेने में देर करती किसी भी सरकार को इस देश की युवा पीढ़ी माफ़ नहीं करेगी और उसमें से ही लावा जैसी क्रान्ति की आग भभक उठेगी ।
दूसरी और हमारे शिक्षकों को भी कच्ची उम्र की छात्राओं को बुरी नज़रों से देखने की आदत पड़ गयी है।पवित्रता के लिए समाज ने शिक्षकों को ईश्वर का दर्जा दिया और वही शिक्षक आज अपनी बहन- बेटीजैसी छात्राओं को वासना की आग में धकेल रही है । अभ्यासक्रम के ढाँचे में रहे प्रकरणों को मैं पूर्ण शिक्षा नहीं कहता । ऐसा शिक्षक मुझे कतई पसंद नहीं और न होगा । मुझे तो पसंद है चिड़िया के घोंसले के सामने बैठता संवेदनशील-कोमल ह्रदयवाला शिक्षक, जो बच्चों की चोंच में दाने रखती चिड़िया को आनंद से देखने का रोमांच महसूस कर सकें, वो भी दिल से !
तालाब के किनारे ग्रीष्म की छुट्टियों में बैठे-बैठे तैरने के अज्ञान के अफ़सोस के साथ, तालाब में तैरते-नहाते बच्चों को देखना, भेंस पर सवारी करते किसी शरारती बच्चे को देखना, जिसे सिरफ़िरे बच्चों की टोली का सरदार कहकर पिछले माह को ही शिक्षक ने बरख़ास्त किया था स्कूल में से ! फिर भीउसने अपनी मौज-मस्ती या बालसहज शरारतों का संगप्रामाणिकता से नहीं छोड़ा और छोड़ा प्राण-प्रकृति का संग ! उसके मन पुस्तक के कीड़े जैसा शिक्षक या पोपट जैसे ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं है । उसके मन प्रकृतिकी गोद में सर रखने का साहस जुटाने का कार्य पसंद है । वह अब इसे ही जीने लगे है । शिक्षक को आतेदेख वह घबराता नहीं, नमस्कार-प्रणाम करता नहीं है या ना है उनके चेहरे पर स्मित ! वह जानता है किमेरा शिक्षक ज़मीन-मकानों की दलाली से आगे बढाकर अब तो ज़रूरतमंद शिक्षकों के तबादले कीदलाली भी करने लगा है । संस्थाओं के संचालक भी अब तो शिक्षकों की दलाली के बारे में सिफ़ारिशकरने लगे है । पदाधिकारी सूँघकर रिश्वत लेते हैं । इस कारण वह छात्र, शिक्षक को देखकर सिर्फ़ उनकेसामने देखता है और फिर तालाब के मैले पानी में गोता लगाकर दूर तैरती भेंस की और थूकता है, फिरएकबार पानी में गोता लगाकर अदृश्य हो जाता है। वह जबतक पानी से बाहर निकलता है उससे पहलेख़ुद शिक्षक ही गायब हो जाता है ।
चौराहे या पाठशालाओं में मैदानी खेल बंद हो गया इस कारण टी.वी. देखता थाला युवा कल्चर पेट के दर्दोंसे पीड़ित हो गया है । पंद्रह की उम्र में पैंसठ की तोंदवाला बच्चे देखने को हमारी आँखे आदी हो गई है ।ग्रीष्म की छुट्टियों में पूरा केम्पस ख़लीखम्म है । गर्म हवा बहती है । चमड़ी जल जाती है । रेकोर्ड ब्रेक गर्मी का पारा पिछले वर्ष के साथ होड़ लगाने लगता है । आदिकाल में रुषी वृक्षों के नेचे बैठकर बच्चों को पढ़ाते थे । अब शिक्षक रुषी ही नहीं रहा, उसे प्रकृति से संग करने की फ़ुर्सत ही कहाँ? कुछ लोग समजतेहै की ज़माने के साथ जंगल से क्लासरूम में शिक्षक आया तो क्या बुराई? बात है मानसिकता की । ऋषि जैसी पवित्रता शिक्षको में होनी चाहिए और अपने कार्य को सेवा समझकर करना चाहिए । पेड़ के नीचे बैठकर नहीं, पेड़ की तरह अपने ज्ञान की छाँव में छात्रों को पढ़ाकर अच्छे इन्सान बनाने की ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए । मगर ऐसे सजीव शिक्षक मिलेंगे कहाँ? यही प्रश्न ने मुझे लिखने की प्रेरणा दी है । आपको तो सिर्फ़ इस बारे में गहराई से सोचने की प्रेरणा तो मिलेगी न ?
"ॐ", गोकुलपार्क सोसायटी, 80 फ़ीट रोड, सुरेन्द्र नगर, गुजरात - ३६३००२
pankajtrivedi102@gmail.com
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