दादाजी और पौत्र

दादाजी यानी दादाजी ! उनके मुकाबले पापा कहाँ? दादाजी को अब शहरीजन बनाना पड़ा है | दादाजी प्रात: जागते हैं | दूध की थैली ले आते हैं, खुद ही पानी गर्म करके स्नान करते हैं, पूजा-अर्चना करते और पौत्र को प्यार से सहलाते हुएं जगाते हैं, उसे स्कूल तक छोड़ने जातें या सब्जी भी ले आतें | दादाजी अखबार पढ़ते हैं तो पौत्र ही चश्मे लाकर देता | दादाजी को तो फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत ! समय बीताने के लिएँ वह हमेशा कार्यशील ही रहतें | पूरा दिन एकांत में दादाजी, पौत्र के स्कूल से लौटने और उसके स्वागत के लिएँ तैयार रहते | दादाजी को पौत्र का ख़याल रखना होता और पौत्र को दादाजी का ! मम्मी को तो घर का काम ही ईतना कि बेचारी को समय ही कहाँ ? उनकी कईं बातें है, अगर सास होती तो शायद कह पाती या नहीं भी ! पप्पा को तो ऑफिस का काम, बोस के कीच-कीच और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी तो.... ! किसे फ़ुर्सत है?
दादाजी को लगे कि पौत्र को पढाऊँ | कभी-कभी किताबों के बसते के बोज से छूटा हुआ पौत्र थोडा-सा खेलें तो मम्मी की बूम सुनाई देती; "बेटे, अपना होमवर्क ख़तम कर ले, पप्पा लड़ेंगे | दादाजी को तो क्या काम है? वो तो कहानियाँ ही सुनाते रहेंगे | आजकल के बच्चों को तो पढ़ाई अच्छी ही नहीं लगती....|" दादाजी मौन रहते हैं, हमेशा | पौत्र पढ़ता है | दादाजी देखते हैं | तड़के से जगे हुए दोनों की आँखों में फर्श से चमकता हुआ सूर्य प्रकाश आँखों में फैलता है तो मेघधनुषी रंगों से विविध आकर उभर आते हैं | पौत्र कुछ पल के लिएँ खुश हो जाता है | दादाजी यह सब जानते हैं | दादाजी बारीकी से देखते हैं | पौत्र गड़बड़े अक्षरों से नोटबुक में कुछ लिखता है | वह ईंगलीश मीडियम में हाँ | दादाजी अंग्रेजी बोल सकते हैं, लिख सकते हैं मगर वह तो अंग्रेजों के समय का ! मम्मी कहती है कि आजकल की पढ़ाई में दादाजी को क्या समज होगी ? मम्मी-पप्पा की पीढी आधी-अधूरी है | वह अंग्रेजों के ज़माने की अंग्रेजी नहीं जानते और वर्त्तमान की शिक्षा में उनकी चोंच डूबती नहीं ! दादाजी जब स्कूल में पढ़ते थे तब लोग कहतें कि मास्टर तो फक्कड़ अंग्रेजी बोलते हैं और लिखते भी ! उस ज़माने में लोग अंग्रेजी में अर्ज़ी लिखवाने आते | दादाजी का मान-सम्मान और ज्ञान लोगों के दिलों में अंकित था | आज मम्मी को पता नहीं कि दादाजी कौन है ? पप्पा तो केवल नौकरी ही करें, दादाजी के प्रति उनका मौन पौत्र को आकुलाता है, वह क्या कहें पप्पा को?
उसे तो मजा आता है, दादाजी के साथ | कहानियाँ सुनाने में, खेलने में और उनकी लचकती हुई लिस्सी त्वचा पर हाथ फेरने में ! ईस स्पर्श से दंतहीन मुंह वाले दादाजी हंसने लगे तो खूब आनंद आता ! पौत्र उन्हें मुँह खुलवाकर देखता है | घीस चुके, लाल-गुलाबी मसूड़ों को देखकर पौत्र पूछता है; "दादाजी, आप रोटी कैसे चबाते हैं? आपको तो दांत ही नहीं है !" फिर से दादाजी हंसते, बिलकुल भोलेपन से | मोतियाबिंद के कारण कमजोर हुई आँखों की पलकें थोड़ी सी ऊपर उठे | दीवार पर रहे दादीमा की तसवीर को देखें, पौत्र दादाजी को देखें और दादाजी की आँखों में से दो-चार बूंद गिरने गले |
दादाजी कहें; "बेटा, अब हमें खाने के स्वाद कहाँ? रोटी को तो दाल में भीगोकर नरम करने के बाद खाना | कईं बरसों तक हमने खाया, अब तो तुम्हें खाना होगा, हं बेटा !"
दादाजी पौत्र का अमीदर्शन करते हैं, प्रत्येक सुबह में...|
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