हाथ में लहराने लगे वो राखी....!! - पंकज त्रिवेदी
मेरे लिएँ प्रत्येक त्यौहार कष्टदायक होता है | आँखें बहती रहती है निरंतर...., घर का एक कोना है जो मुझे अपनी
माँ की गोद की तरह अपनी आगोश में लेकर संभाल लेता है | मेरी पत्नी और दो बेटियों के सिवा कौन है...? रहने दो... मत पूछो आगे...
मैं ज़िंदगी के प्रत्येक उन भावों को जीया हूँ और उसी रंगों से खेला हूँ... जिसमें गाँव, खेत-खलिहान, बैल, गाय, भेंस, तालाब, वो कूआँ और खद्दर की चड्डी और आधी बांह का कुर्ता पहन के पाठशाला में जाना और माँ सरस्वती को सच्चे मन से प्रार्थना करना |
नगर-महानगर भी देखें, होटलें देखी, पैसे देखे और उन पर नाचती इस दुनिया के सभी रूप देखें... गुजराती में कहावत है - "दुनिया नो छेड़ो घर !" मतलब की सारी दुनिया घूमो, अंतिम विश्राम तो घर में ही... ! लाखों दोस्तों से मिला, मगर हर वक्त दोस्ती का मतलब उन्हें समझाने का कष्ट उठाना पडा | दोस्त बनने-बनाने की काबिलियत मैंने बहुत ही कम लोगों में देखी है, अनुभव की बात तो दू....र..... !
एक परिवार था मेरा भी ! माँ थी, पिताजी थे, भाई और बहन भी... हम सबने ज़िंदगी को जीने के लिएँ, ज़िम्मेदारी और प्रामाणिकता से जीने के लिएँ बहुत संघर्ष किया है | समय का चक्र सबके लिएँ बदलता है, हमारा भी बदने लगा | सब अपने में मस्त होने लगे... एक कोना है जो मेरी माँ की गोद है और मेरे पिताजी का साया ! वो मेरा अतीत है मेरे भाई.... !!
देखो मेरी आँखों में और समझा करो ह्रदय की भाषा को... जितना गहराई में जाओगे उतना ही पाओगे... प्यार और करुणा का एक महासागर बैठा है शांत... !
हो सकता तुम्हारे आने से खुशियों के मारे वह उछलने लगे....
ये आँखे टिक-टिककर, सफ़ेद लम्बे लहराते हें बालों के बीच से देख रही उस बरामदे को चीरती हुई आँगन में....., फ़ैली हुई धुप के बीच से उस ड्योढ़ी को... शायद वर्षों से बंद वह मेरे मन का दरवाज़ा खुल जाए और एक छोटी सी गुडिया पाँव में झांझर झनकाती हुई दौड़ी आएं और गले मिल जाएँ मेरे...! मेरे दो बूढ़े हाथ उन्हें प्यार से उठाकर चूम लें और हाथ में लहराने लगे वो राखी....!!
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