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In:

लकीरें - पंकज त्रिवेदी



प्रिय दोस्त,
तुम्हारा न होना,
तुम्हारी मौजूदगी का गवाह बनाता हैं
हर पल...
तुम चाहे कहीं भी हो, रहो... खुश रहो... !
दोस्ती का अर्थ अपेक्षा या अधिकार नहीं
यह तो जनता ही हूँ..
मगर -
दोस्ती का अर्थ यह भी हैं कि
अपने दोस्तों के कंधे
दुःख-दर्द को सहन करने के लिए
अपने सर को विश्राम दे सकता हैं
अगर कोई साथ देता भी हैं तो अलग बात हैं मगर
साथ देने के भी तरीके होते हैं...
जरूरतों पर बने रिश्तें अपनी मंज़िल से
भटकने में ही साथ देता है.....
दोस्त,
जब कोई अपना बनाकर साथ निभाता हैं तो
उनकी मर्यादाओं को नज़रंदाज़ करते हुए
साथ निभाना चाहिए..
ये दोस्ती का रिश्ता बड़ा अजीब होता हैं न ?
न छोड़ सकते हैं और न कुछ कह सकते हैं
क्योंकि-
कहें तो भी क्या कहें और किसे कहें?
दोस्ती की मिसाल पर यह दुनिया प्रेरित हैं
मगर एक पल रूककर सोचना होगा
दोस्त के फैले हुए हाथों को 'मांगना' नहीं कहते
हो सकता हैं - उन खुले हाथों की लकीरें
सिर्फ तुम्हारे लिए ही हों...!

In:

सवाल - पंकज त्रिवेदी


ये मन की गहराई की
तह को तलाशने की मंशा....!

ये मन ढूँढता हैं तुम्हें तो पहुंचता हैं

कोशों दूर...

जहां कंकाल सी स्मृतियाँ

आज भी मेरे कदमों की आहट से
अंग मरोड़कर खड़ी हो जाती हैं..

तुम्हारा बिछड़कर लुप्त हो जाना और जैसे

सदियों से दफ़न हुएं उन सपनों को

फिर से जगाना

दुनिया की पैनी नज़रों से

छल्ली होता हुआ वो प्यार
आज भी नज़र आता हैं...

प्यार का दूसरा नाम ही दर्द है...
फिर भी क्यूं तरसते-भड़कते हैं लोग
?

प्यार करना तो माँ ने
अपने गर्भ से सीखाया था

प्यार की परिभाषा के बोज तले दबा हुआ आदमी

कब समझेगा प्यार और अहसास को...

दफ़न हो सकता हैं प्यार?
कईं सवालों के बीच में

प्यार की अडिगता को भी आकलन करने को

मति की दौड़ क्यूं लगाते हैं..
?

In:

मैं तुम्हें अब भी बहुत चाहता हूँ ....! - पंकज त्रिवेदी


मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारी उन आँखों को

जो तरसती थी मुझे देखने के लिए

और फैलती रहती थी दूर दूर तक से आती हुई

पगदंडी पर...

मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारे कानों को

जो उस पगदंडी से आते हुए मेरे कदमों की

आहट सुनकर खड़े हो जाते थे..........

मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारे उन हाथों को, जिस पर

चूडियाँ आपस में टकराकर भी खनकती हुई

छेड़ती हो प्यार के मधुर संगीत को...

जिस पर हम दोनों कभी गाते थे प्यार के तराने......

मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारे मन को

जो हमेशा सोचता रहता था मेरी खुशियों के लिए

आसपास के लोगों के लिए, दुखियों के लिए

मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारे उस धड़कते हुए ह्रदय को

जो हरपल खुद को छोड़कर भी धड़कता था मेरे लिए

परिवार और बच्चों के लिए.....

मैं

देखना चाहता हूँ उन साँसों को

जो दौड़ी आती हैं अंदर-बाहर

जैसे तुम दौड़ी आती थी मेरे घर आने के

इन्तजार में बावरी होकर.....

मैं

देखना चाहता हूँ तुम्हारे पैरों को

जो उम्र को भी थकाते हुए दौड़ते रहते थे

मेरी हर आवाज़ पर.......

मैं

तुम्हें देखना चाहता हूँ तुम्हें

जिसने कुछ न कहकर भी सबकुछ किया था

खुद के सपनों को दफ़न करते हुए समर्पित करती थी

अपने अरमानों को.......

मैं

तुम्हें देखना चाहता हूँ

ईसी घर में, खानाती चूड़ियों और पायल के साथ

उस मन की सोच और धड़कते दिल के साथ

उन खड़े कानों और फ़ैली हुई आँखों के साथ.....

क्योंकि-

मैं जनता हूँ, तुम अब भी चाहती हो मुझे

मेरी प्रत्येक मर्दाना हरकतों की मर्यादाओं के साथ

मगर मैं कुछ नहीं कर सकता दूर से तुम्हें चाहकर भी

मर्द हूँ मैं, तुम औरत...

इतना जरूर कहूंगा कि-

मैं तुम्हें अब भी बहुत चाहता हूँ ....!

In:

कदमों के निशाँ - पंकज त्रिवेदी


मैं जनता हूँ कि -

तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है

तुम्हें अपनी पहचान बनानी हैं

तुम हो कि उसके लिए

चाहे कुछ भी क्यूं न करना पड़े !

ज़िंदगी के आयामों को अपने

कब्ज़े में करना और

आसमाँ को छूने की तुम्हारी

हसरत हमेशा से रही हैं !

मगर ज़िंदगी यही हैं आज के दौर में

किसी के सर को कुचल दो

किसी की इज्ज़त को सरे आम निलाम कर दो

किसी की भावनाओं से खेलो...

या फिर -

किसी के आगे अपने अस्तित्त्व को झुका दो

खुद को भूलकर दूसरों में खुद को ढूंढों

फिर जो असर होगा उसको भी भूल जाओ

दुनिया वाले हैं, कहेंगे यार !

कुछ दिनों की तो बात हैं... सुन लेना....

यही तो है शोर्टकट !

यही तो हैं सफलता की पायदान

यही तो हैं खुद को रौशन दिखाने की चाह

मगर -

जो छूटता है, जो छोड़ता हैं, वोही आखिर जीतता हैं !

शायद यही सबसे बड़ी सफलता पर

चाहे कितनी भी धूल झोंक दो...

सफलता किसीकी मोहताज नहीं होती

न उसे सीढीयों की जरूरत होती हैं न किसी की

तारीफ़ की...!

सफलता खुद आनी चाहिए हमारे पुरुषार्थ की

ऊंगली पकड़ती हुई,

खेलनी चाहिए हमारे आँगन में...

जहां हमारे कदमों के निशाँ को

कोई मिटा नहीं सकता और वहीं पर तांता लगता हो...!!

In:

प्रतिशोध - पंकज त्रिवेदी


प्रतिशोध की ज्वाला
भड़क रही है मेरे अंदर
घुटन सी महसूस होती है
निराशा भी हैं,
धोखा भी हैं,
आशा-अपेक्षा की नींव पर
खड़ी थी सपने की ईमारत
वो भी अब गिर चुकी हैं
किस तरह से जीना होगा मुझे
यह भी नहीं पता था मगर
हर पल सबको साथ लेकर
किसी के एक बोल पर दौड़ता रहता
और
जाने क्यूं ? कुछ नहीं कहना हैं मुझे......
जाने दो उस बात को.........
अब मैं -
जो भी हो.... ख़त्म होना हैं मुझे
लोग चाहें जिस तरह भी ख़त्म करें
मैं उन्हें सहयोग देता रहूँगा
मगर -
अपनी इंसानियत को,
अपनी आत्मा को,
कभी भी ख़त्म नहीं होने दूंगा... !!

In:

तेरे ही नाम से.... ! - पंकज त्रिवेदी



दिल हैं तो धड़कता हैं तेरे ही नाम से,
कहूं क्या ये लगन हैं तेरे ही नाम से |
तूं कौन, मैं हूँ कौन, हम क्यूं फ़िक्र करें ?
भरोसा सिर्फ हमें यहाँ तेरे ही नाम से |
न चार दिन की ज़िंदगी, न सदियाँ यहाँ हैं,
जीना हैं यहाँ हमें तो सिर्फ तेरे ही नाम से |
तूं हैं या नहीं भी तो बात क्यूं करें हम ?
लोग हैं कहेंगे, मगर हूँ मैं तेरे ही नाम से !

In:

जैसे कुछ हुआ ही नहीं...!! - पंकज त्रिवेदी


लोगों की भीड़ को

चीरती हुई तुम्हारी दो आँखे

जब देखती है मुझे तो

लोगों की भीड़ की सभी आँखें

एक ही शख्स पर तरकश से निकले

ज़हरीले तीर की तरह

चुभने लगती है मुझे और

लहूलुहान कर देती हैं मेरी संवेदना को....

और मेरा कलेवर

सहता है चुपचाप हमेशा की तरह !

ऐसा क्यूं होता है कि -

लोगों की नज़रें

तीर की नोंक बन जाती है फिर भी

मैं तुम्हे देखता रहता हूँ,

जैसे कुछ हुआ ही नहीं...!!

In:

विकार - पंकज त्रिवेदी


समंदर के किनारे
पर्यटकोंने
फेंके हुए पोपकोर्न
खाने के बाद
एक मछली
खो बैठी है अपनी चंचलता....
और अब -
उसके पेट से जन्म
लेने वाली मछली
तडफडाती है
एक्वेरियम में...!!

In:

वेब दुनिया -पर आई कविता

कोहरे ने
आगोश में ले लिया है मुझे
तुम्हारी तरह

और
चुंबनों-सी बारिश की बूँदें
नहलाती है मुझे

मीठी नोंकझोंक-सी
चट्टानों की ठोकरें

फिर भी-
कितनी सुहानी लगती है
यह ज़‍िंदगी...!!

In:

नाम नहीं...!


तुम्हारे चेहरे को मैं यहाँ से पढ़ सकता हूँ

तुमको मैंने दोस्त कहा

यानि हम समान है...

उम्र और विचार से भी हम समान- दोस्त हैं

तुम्हे मेरे लिए सम्मान है तो मुझे भी

हम एकदूजे को समझते है हम

जब दोस्त बनाया तो not good, not bad

क्यूंकि- प्रत्येक इंसान चाहता है....

पूरे परिवार के बावजूद... कोई ऐसा हो,

जिसे हम सबकुछ कह सके खुले मन से

ये मानव स्वभाव है...

कोई इससे परे नहीं

अब तुम कहो, मै गलत हूँ ?

एहसासों के इस रिश्ते को मैंने भी स्वीकार किया है

जानता हूँ कि हम दोनों किसी ऐसी डगर पर आये हैं,

जहाँ पहुँचने हमारा मन भी चाहता था....

जो सबकुछ मिलकर भी अधूरा था

शायद वही सबकुछ हम एकदूजे से पा रहे हैं

हाँ शायद ऐसा ही है

इस संबंध का नाम नहीं, शरीर नहीं, मौजूदगी भी नहीं -

फिर भी यह सब है हम दोनों के साथ...

ईन सब के साथ ही हम मिलते है

और यही अहसास हमारे दिल को - मन को अच्छा लगता है...

तुम्हारे पास सबकुछ है, फिर भी मेरी जगह भी है...

अलग...

शायद तुम भी इसी तरह मेरे अंदर हो...

तुम मुझसे जुदा नहीं हो... कही भी...

शायद धड़कने लगी हो मेरे साथ.....

सच कितना अच्छा लगता है.....

In:

पंकज त्रिवेदी की रचनाएं "अनुभूति" पर पढ़िए...


ईस लिंक पर ........... http://anubhuti-hindi.org/kavi/p/pankaj_trivedi/index.htm

In:

निराशा-आशा

1

यह नश्वर देह

कब छूटेगा,

किसको पता?

एक पल में झूझना

जीना और

पल पल में मरना !


जन्म हुआ

यही बड़ी आशा,

ईच्छा

संभावना और

वास्तविकता...

जाना तो भले ही

किसी भी पल

एक एक पल में

मनभर जानना,

पाना,

खुश रहना और

जीना

भरसक !!

In:

धरती


तुम वो हो जो -

बालू के कण के समान हो

सब के साथ रहकर भी अकेली

कण-कण में बिखरी हुई

तुम वो मिट्टी हो

सब के साथ चीपकी हुई

मगर सबका दुःख झेलती हुई

तुम, तुम हो-

जिसका अस्तित्त्व होते हुए भी

खुद कुछ नहीं

न अभिमान तुझे

न सम्मान की ईच्छा

तुम सह रही हो सबको

तुम अपनी छाती को चीरती हुई

दे रही हो प्रत्येक सजीवों को

एक नया जीवन

हाँ, तुम बालू का कण हो, रेणु हो

और तुम ही धरती !

जिसके बिना जीवन ही कहाँ?

मगर तेरे समर्पण को देखने की

फुर्सत ही कहाँ और किसे है यहाँ?

तुम चुपचाप सह रही हो, हंसती हुई

ईठलाती सी.... दूसरों की नज़र में

जानता हूँ -

तुम्हारे अंदर भभकता हुआ

लावा भरा है

फिर भी तुम शांत हो

तुम अगर करवट भी बदलती हो

तो तहस-नहस हो जाती है ये दुनिया

तुम्हारी विडम्बना है ये...

फिर भी

दूसरों के सुख के लिएँ सदा तुम

अडिग, अविचल.... तेरे ईस रूप को

मेरा नमन !


समय : 5 .30 AM 21/10/2010