जया केतकी और रेणु सिंह
बिना दरवाजे, खिडकियों की झोपडी में,
बाहों में बाहें डाले,
मिला करती थी, तेरी-मेरी संवेदनाएं।
सिसक, सिमटकर कह जाती,
एक-दूसरे का दर्द।
खिलखिलाकर बांटती थी,
खुशी के लम्हे, बीते वाकये।
अब नहीं मिल पाती संवेदनाएं,
पहले जैसी निकटता अब कहाँ,
छत के नीचे की दीवारों पर
जड गए हैं दरवाजे।
बंद रहती है खिडकी हमेशा,
खुलती भी है तो मोटा पर्दा
बीच में आ जाता है, दूरियाँ बढाने।
कैसे मिलें, कैसे कहें?
अब अपना सुख-दुख कैसे बांटें?
घुट रही है जिन्दगी,
अकेली, निराधार, असहाय!
काश! यह पर्दा उठे,
दिखजाए संवेदना का चेहरा फिर,
दूर करे कोई उसकी उदासी,
पूछ जाए आकर, सीने से लगाकर,
क्या तुम्हें कुछ कहना है? मुझसे . . . . . .
झँझावतोँ मेँ मन उलझा फटी पतंग सा,
कुछ अनिश्चितताओँ मेँ मगन,
ढेर सी चिँताओँ मेँ मगन
सब कुछ तो करेँ क्या न करेँ,
कुछ असमँजस सा
टिकेँ कि रहेँ कदम जमीन पर भी और
थाम लूँ ये सारा गगन, कुछ इच्छायेँ
जगीँ सी ख्वाब भी जाग गये से,
कुछ तो पहले ही की दमित इच्छायेँ,
कुछ कुचले हुये सपने भी पर सोचा ये भी
कि झटक दूँ समस्त झँझावतोँ को,
कि जगा लूँ समस्त कुचले हुये सपने,
दमित इच्छाये भी , समेल लूँ साहस जीने का ,
कुछ सँघर्ष करने का, कि इसके बिना तो
हो जाये जीना मुश्किल सा....
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14 comments:
काश! यह पर्दा उठे,
दिखजाए संवेदना का चेहरा फिर,
दूर करे कोई उसकी उदासी,
पूछ जाए आकर, सीने से लगाकर,
क्या तुम्हें कुछ कहना है? मुझसे . . .
जया जी की कविता में समय के साथ साथ बदलते हुवे और बढती सुविधाओं के बीच खोती संवेदना का दर्द है .. बहुत सुन्दर
रेणु जी की कविता भी सुन्दर ..मन का मंथन .. साहस का आह्वान ..बहुत खूब..
''संवेदनाएं और साहस जीने का" दोनों ही रचनाएँ भाव-विभोर कर देती हैं..अंतर-द्वंद्व से जूझती दोनों रचनाओं का दर्द स्वाभाविक है क्यूंकि ये स्त्री स्वभाव है जिसने हम पुरुषों को भावनाओं और संवेदनाओं का पाठ पढाया है ...हम पुरुषों में संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती आपकी रचना सराहनीय है ..पंकजजी, आपके स्नेह और आशीर्वाद का अभिलाषी ..
dono rachnayen sundar hain!
samvedna ka mukhar hona ek or aur doosri kavita mein jijivisha aur sangharsh ka chitra....
saargarbhit abhivyaktiyan!!!
saargarbhit rachnaaon ka chayan kiya hai, bahut hi achhi lagi ... dono ko shubhkamnayen
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (1/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
दोनों रचनायें मानवीय अंतर्द्वंद का यथार्थ परक चित्रण है..संवेदनायें और निकटकता परिपूरक हैं....शब्द, भाषा, भाव सभी मौन हो गये..अंतर्मुखी हो गये..
भई वाह, एक ही पोस्ट में दो दो कवितायें...
एक से बड कर एक बढिया.
दोनों चर्चा मंच में सम्मिलित होने पर अग्रिम बधाई स्वीकार करें.
“दीपक बाबा की बक बक”
क्रांति.......... हर क्षेत्र में.....
.
aek achchaa ehsaas aek achchi soch he kvitaa men judaayi or miln ka jo ansh he voh laajvab he . akhtar khan akela kota rajsthan
काश! यह पर्दा उठे,
दिखजाए संवेदना का चेहरा फिर,
दूर करे कोई उसकी उदासी,
पूछ जाए आकर, सीने से लगाकर,
क्या तुम्हें कुछ कहना है? मुझसे . . . . . .
-दोनों ही रचनाएँ अनुपम!! बहुत आभार इन्हें पढ़वाने का.
दोनों रचनायें बहुत अच्छी हैं ...सच सब खिड़कियाँ बंद कर अपनी संवेदनाओं को खत्म किये बैठे हैं ...
और दबी कुचली सी इच्छाएं भी जीने का सन्देश देती हैं ...बहुत खूब .
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
दोनों रचनायें बहुत अच्छी हैं .!
दोनों ही कविताएं मन की अंतर्व्यथा का अर्थों के बेहद सूक्ष्मतम स्तर और गहन संवेदनशील रूप चित्रण दिल को छू लेती है. आभार.
सादर
डोरोथी.
"निर्झरी बन फूटती पाताल से
कोपलें बन नग्न रुखी डाल से
खोज लेती हैं सुधा पाषाण में
जिंदगी रूकती नहीं चट्टान में"
These lines motivates persons like me.Very nice Mamata Didi.
and Renu ji, your views are excellent.
Manjula ji, I'm too weak in Urdu and You have written in strong urdu,So madam,I'm sorry to say that I'm not in position to make a comment.
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