Posted by
Pankaj Trivedi
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चार लाइन
अहसास
प्यार की ही पूजा करता रहता हूँ मैं,
कुछ सपने हैं, कुछ किताबें और यादें हैं
ये सुबह है, पारिजातक है और मेरा झुला,
तुम नहीं हो यहाँ , फिर भी क्यूं अहसास हैं ?
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6 Comments
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गीत:
जीवन तो...
संजीव 'सलिल'
*
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
हाथ न अपने रख खाली तू,
कर मधुवन की रखवाली तू.
कभी कलम ले, कभी तूलिका-
रच दे रचना नव आली तू.
आशीषित कर कहें गुणी जन
वाह... वाह... यह तो दिग्गज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
मत औरों के दोष दिखा रे.
नाहक ही मत सबक सिखा रे.
वही कर रहा और करेगा-
जो विधना ने जहाँ लिखा रे.
वही प्रेरणा-शक्ति सनातन
बाधा-गिरि को करती रज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
तुझे श्रेय दे कार्य कराता.
फिर भी तुझे न क्यों वह भाता?
मुँह में राम, बगल में छूरी-
कैसा पाला उससे नाता?
श्रम -सीकर से जो अभिषेकित
उसके हाथ सफलता-ध्वज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
कुछ शब्दों में गहन अनुभूति...बहुत सुन्दर प्रस्तुति..आभार...
http://www.sharmakailashc.blogspot.com/
bahut gahan anubhuti..
yahi to baat hai pankaj bhai, koi sath nahin par har ehsaas mein basa hai wo, aur yahi prem hai. achhi prastuti keliye badhai sweekaaren.
परम आदरणीय आचार्य सलिलजी,
श्री कैलाशजी,
डॉ. नूतन और जेन्नीजी,
आप सब का मै आभारी हूँ और आपकी उपस्थिति
से बहुत खुशी हुई है |
ehsaas ki sundarta parilakshit ho rahi hai!
regards,
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