Posted by
Pankaj Trivedi
In:
कविता
गुडिया
बेटी की जिद्द पर गुडिया लेने की
वह भी ईलेकत्रोनिक्स, महंगी वाली
बहुत समझाई थी उसे मगर मनाने से
मान जाएं तो बच्चे नहीं !
उन्हें आशा थी कि आज तो
लोग अपने घरों से रद्दी के सामान का
अंबार लगा देंगे
लंबा सफ़र भले ही तय करना पड़े
मगर बेटी को गुडिया दिलाकर ही रहूँगी
शाम ढल चुकी और सड़कें चमचमाने लगीं
कंधे पर रद्दी का बड़ा सा थैला लिएँ
औरत हवा में उड़ रही थी
पीछे उनकी बेटी आँखों में चमक लिएँ
दुनिया से बेखबर... दौड़ रही थी....
सड़क के एक कोने में पड़े खिलौने को
देख रहा नहीं गया और
बेटी मुड गई उस तरफ... माँ तो सड़क पार
खिलौना हाथ में आया तो बेटीने
खुशी से उछलकर सीने से लगाई प्यारी सी
गुडिया को...
बड़ा सा धमाका हुआ और शहर थर्रा गया
सड़कें थम गई, लोगों के होशहवास उड़ गएं
पुलिस की गाड़ियां चींखने लगी
सन्नाटे के बीच सड़क के उस पार से
लहुलूहान, बंद आँखे, कांपते हाथ
राख के ढेर में फैलाती हुई
भय और दर्द से लथपथ
मेरी बेटी...
कोमल सी ऊँगलियाँ आई हाथ में...
और
अखबारों के पन्ने छप रहे थे उस
औरत के काले आँसूंओं से....!!
-------------------------------------------------------------------------------------------------
बृहस्पतिवार को "विश्वगाथा" पर आपके लिए एक नई ताक़त, आत्मसम्मान, सामाजिक सेवाओं की नींव में से उभरती संवेदनात्मक कविताओं का परिचय होगा |
-------------------------------------------------------------------------------------------------
बृहस्पतिवार को "विश्वगाथा" पर आपके लिए एक नई ताक़त, आत्मसम्मान, सामाजिक सेवाओं की नींव में से उभरती संवेदनात्मक कविताओं का परिचय होगा |
Posted on
undefined
undefined -
18 Comments
This entry was posted on 5:54 PM and is filed under कविता . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
18 comments:
बहुत भावपूर्ण!
sundar vishleshan kavita ke madhyam se,
diltak pahunchi aapki kavita
मेरी बेटी...
कोमल सी ऊँगलियाँ आई हाथ में...
और
अखबारों के पन्ने छप रहे थे उस
औरत के काले आँसूंओं से....!पंकज जी आज तो सुबह ही सुबह आप ने समाचार पत्रिका की तरह ...मुझे भी दह्लादिया ......एक मन से जड़ में से महसूस की हुई पक्तियां .....सुन्दर अभिवयक्ति आप की !
सन्नाटे के बीच सड़क के उस पार से
घायल हुई माँ ढूंढ रही थी फूल सी बेटी को
लहुलूहान, बंद आँखे, कांपते हाथ
राख के ढेर में फैलाती हुई
भय और दर्द से लथपथ
मेरी बेटी...
कोमल सी ऊँगलियाँ आई हाथ में...
और
अखबारों के पन्ने छप रहे थे उस
औरत के काले आँसूंओं से....!!
padhkar man vyathit ho gaya .. bhaavpurn rachna!
दिल को पिघला देने वाली इस भावपूर्ण रचना के लिए आपको दिल से बधाई देता हूँ !
कविता इतनी सशक्त है कि उस धमाके की गूँज अब भी मेरे कानो को बहरा कर रही है और उठता हुआ ज़हरीला धुयाँ अभी भी मेरे नथुनों से निकलने का नाम नहीं ले रहा है !
योगीभाई, कल रात मैं सोया नहीं | मैंने एकबार कहा था, पता नहीं ये त्यौहार मेरे लिएँ दुखदायक है...
दिवाली के सन्दर्भ में लोगो के घर से रद्दी लेने वाली महिला और बेटी को देखकर और मुम्बई ब्लास्ट की स्मृति- जिसमें मेरे शहर के १६ लोग थे... उन्हें देखकर ये कविता...
भाई साब प्रणाम !
अभी भी मेरे जहाँ में वो बच्ची , गुडिया और माँ घूम रही है ,, गंभीर है रचना मगर यथार्थ को सामने लाती ,
साधुवाद !
मन में मंत्रोच्चार हो रहे
मस्तिष्क में धमाकों की व्यथा
और सर्द आँखें !
हर सुबह दहशतजदा !
ॐ कहो या फिर अल्लाह
वो भी रोता होकर बेजार !
मंत्र,अजान से हो अनजान,
नाच रहे केवल शैतान !
कौन है दुश्मन?
क्यूँ है दुश्मन?
क्या पाना और क्या खोना है?
तुम मारो या वो मारे
जाना तो जीवन का क्रम है .....
तुम्हे भी जाना है इस क्रम में
क्यूँ हाथ खून से रंग डाले?
सन्नाटों में चीखें दहलायें
क्यूँ पाप ऐसे कर डाले ?
कुछ देर रुको,
पानी पी लो
आँखें बंद कर एक बार सुनो !
सुनो बिलखते उन लम्हों को
जिन्हें बनाया अपने हाथों
बनकर भगवान्
और कहो ,
उन लम्हों की जाति क्या थी !
मन्दिर में इंसान गया ,
या भगवान् ,
या गया तुम्हारा ईमान ?
कहो , कहो , -
धमाकों की तरह
क्या मिला बनकर हैवान ?
किस दुश्मनी को ठंडक मिल गई ?
और तुम्हारी आयु बढ़ गई ?
देखो ख़ुद को आईने में -
चेहरे की तकदीर बदल गई !
.... जिस चेहरे पर नाज़ था माँ को ,
उस चेहरे की मौत हो गई !!!
अखबारों के पन्ने छप रहे थे उस
औरत के काले आँसूंओं से....!!... antim panktiyon ke bimb ne sihra diya.. kai marmaantak dhamake ho gaye maanas ke bhitar !
बहुत ही भावों से भरी हुई मार्मिक रचना..गरीबी के दर्द की इस से ह्रदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और क्या होगी ?..
bahut dardbhari kavita hai.... bacchi ne gudiyaa ki jidd kee maa uske liye gudiya lene chali ..aur maa ki apni jiti jaagti pyaar bhari gudiya hee chin gayi.... badi dard vidaarak kavita hai... nireeh nirdoshon kee maut aatankvaad ke haath... Dukh bhari kavita...
बहुत ही मार्मिक एवं भावपूर्ण शब्द रचना ।
bhaavpoorna rachna ki vyatha gunjaymaan hai...
drishya vyathit karta hai!
समाज में व्याप गई एक सच्चाई यह भी.. बहुत-बहुत-बहुत पीड़ादायक क्षणों की याद दिला दी है आपने पंकज भाई. ..
मन-मस्तिष्क में व्याप गई है एक रात.. स्याह.. घटाटोप चुप्प अंधेरा.. सुलगती सर्दी भी बस शुरु ही होना चाहती है.. बेतरतीब यादों के घुमड़ते घने बादलों ने लगातार झीहीं-झीहीं कर माहौल को और नम बना रखा है.. अभी-अभी क्षीण हुआ भरा-पूरा मातृत्त्व काले-खोखले शून्य को अपलक निहार रहा है.. उस ऊर्जस्वी बेटी की उन उंगलियों को थामे बेलिहाज आगे बढ़ता .. और.. और कविता अपने रहस्यमय संसार से झिर-झिर संसृत हो रही है. .. पंकजभाई, अनवरत रीत रहे हैं हम.. अपनी समस्त चेतनता को लसरता देखते हुए.. ..
कुछ भी कहने मे असमर्थ हूँ………………निशब्द!
उड़नजी, आलोकजी, ट्रवेल, अपर्णाजी, प्रिय योगराजजी, सुनील, आदरणीय रश्मिजी, अरुणजी, कैलाशचंद्रजी, डॉ. नूतन, सदा, अनुपमाजी, सौरभजी और वन्दना जी... आप सबने मेरी कविता को इतना सराहा और स्नेह दिया... आभारी हूँ |
Hridayvidaarak vastvik chitran..Ye kahaan aa gaye hum..kahaan ke liye chale the..
Post a Comment