Posted by
Pankaj Trivedi
In:
कविता
निराशा-आशा
1
कब छूटेगा,
किसको पता?
एक पल में झूझना
जीना और
पल पल में मरना !
२
जन्म हुआ
यही बड़ी आशा,
ईच्छा
संभावना और
वास्तविकता...
जाना तो भले ही
किसी भी पल
एक एक पल में
मनभर जानना,
खुश रहना और
जीना
भरसक !!
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14 Comments
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14 comments:
जीवन के फलसफे को कितने कम शब्दों में कह दियेया.. बहुत सुंदर कविता..
बहुत ही बढ़िया, आपने तो गागर मे सागर भर दिया जी
nirasha asha ke beech jhoolti jindagi...ke chitra!
sundar shabdrachna!
आधुनिकता और सभी उम्र के लोगों को
साथ लेकर लिखी गई एक सुन्दर रचना है I
नरेन्द्र व्यास जी क़ी रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा
कितना सुन्दर दर्शन है ......बहुत खूब..... बधाई I
लक्ष्मीनारायण जोशी
bahut sundar ..aik choti see rachna me itni gehri gud baat..
bhai sab
pranam !
dono kavitae behad sunder hai , ek bodh pradan karti hai .
sadhuwad .
saadar
कविताओं के कथ्य में नितांत नवीनता है...गहन भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति।
पंकज जी दोनो की दोनो कविताएँ और उन से संबंधित चित्र नितांत मनमोहक लगे| साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार|
Jeene ki raah!
रचनाओं का आत्म बहुत बड़ा किन्तु देह बहुत छोटी है.
व्याकरण पर भी चर्चा होती रहे.. संप्रेषण का मूल व्यञ्जन हैं, इसके प्रति संवेदना कथ्य की गहराई को बहुगुणित कर देता है.
रचनाओं को साझा करने के लिए धन्यवाद..
Pankaj ji aapki yah sundar rachna kal kee charchamanch par hai... dhanyvaad
शाश्वत सत्य ...
सुन्दर रचना !!!!
सर्वश्री - उड़नजी, अरुणजी, भगवतसिंहजी, अनुपमाजी, लक्ष्मीनारयनजी, डॉ.नूतन, सुनील गज्जानी, महेन्द्रजी, नविनजी, अजीतसिन्हजी, सौरभजी, संगीताजी और रंजनाजी...............
आप सब का धन्यवाद किन शब्दों में बयाँ करूँ... नहीं? अरे हाँ ! दोस्तों में स्नेह ही काफी है.... स्वागत है... स्वागत है.....
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