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Pankaj Trivedi
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कविता
अब तो हद हो गई है यार !

आजकल हम दोनों
बहुत busy होने लगे हैं
तुम हो की नई बिहाई
बेटी की चिंता में आधी-अधूरी सी
दे रही हो gift पलपल और दामाद को
खाने में गुजराती ढोकला...
बेटा हमारा घूमता है यहाँ-वहां
मेरी तो दौड़ ज़हन से दोनों के पीछे
मगर आज भी वही प्यार हम दोनों में...
आज भी ये अटूट रिश्ता है
अडिग, पक्का जो था कभी
तुम थी नई नवेली दुल्हन... !
आज लगने लगी भले ही चांदी बालों में
हुई झुर्रिंया थोड़ी सी चहरे पे
हाल ही में शुरू हुआ है दर्द इस घुटनों में
मगर आज भी वही प्यार हम दोनों में...
बच्चों के साथ रहते, घूमते, चलते, फिरते
और गिरते
आँख मिचौलियाँ खेलते हम हलके से
वो तो डूबने लगे अपनी दुनिया में
मानों, कुछ ही दिनों की बात...
मगर आज भी वही प्यार हम दोनों में...
मगर आज भी वही प्यार हम दोनों में...
पूछ्ती रहती तुम टेड़ी आँखों से
मैं कहेता बस, फुर्सत ही फुर्सत काटेगी,
चक्कर हमारे बीच
तुम कहोगी और -
अब तो हद हो गई है यार !
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16 Comments
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16 comments:
गहरे अहसास से भरी रचना। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
योगदान!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!
मनोजजी,
धन्यवाद | हम आपके ब्लॉग पर जरुर जायेंगे मगर एड्रेस दीजिएं
"आज भी ये अटूट रिश्ता है
अडिग, पक्का जो था कभी
तुम थी नई नवेली दुल्हन... !
आज लगने लगी भले ही चांदी बालों में
हुई झुर्रिंया थोड़ी सी चहरे पे
हाल ही में शुरू हुआ है दर्द इस घुटनों में
मगर आज भी वही प्यार हम दोनों में..."
अरे वाह सच्चा प्यार तो शायद उसी वक्त होता हे,शुरुआतमें तो केवल जवानी का नशा होता हे .
Suneeta Jadhav : गहरे अहसास से भरी रचना। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
Raman Kathuria : Thank u Sir, Mai ise already share karne wala tha, kyoki is TYPE ko mai bahut pasand karta hu'n.Thank u very much sir.
12 minutes ago · Like
ek baar fir dil kee gahraiyon tak gai aapki ye rachna ! rishton kee gahrai, prem kee parakastha tak jaakar rom-rom me siharan see bhar gai..! badhai itnee bhavuk abhivyakti ke liye..! aapki kalam se sanjeeda bhavon kee jo sarita bah nikalti hai...wo aankhon ko bhee nam kar jaati hai..! aabhar, pranaam !
यही जीवन का सच है ..ऐसे ही सुकून भरे पल आ जाते हैं ज़िंदगी में ..अच्छी प्रस्तुति
भाई साब प्रणाम !
''अब भी नई नवेली दुलहन लगती हो जब बाबू जी के सामने घुघंट निकाल आती हो , नहीं खिलाती अपनी नाती पोतो को अपने बड़ो के सामने /तुम पे और प्यार आता है , नहीं नज़र आती मुझे तुम्हारी झुरिया चेहरे कि ''
सादर !
--
बीते समय की अनगिनत परतों में बसे प्यार भरे पलों में रची बसी यादें और उन यादों में खोये वृद्ध युगल का अनूठा प्रेम व्यक्त करती आपकी खूबसूरत कृति...
...शुभकामनाओं सहित....चेतन पांडे
नरेन्द्रजी, संगीताजी, सुनीलजी और चेतनजी,
आप सभी का मैं बेहद शुक्रगुजार हूँ | अमूल्य समय देकर पधारें और हौसला बढाया | हमेशा प्रतीक्षा रहेगी |
सुंदर कविता पंकज भाई
सम्मोहन से भरी वृद्ध युगल की विशुद्ध प्रेम -रस निष्ठा
से पगी प्रेम कविता को मेरा अभिनन्दन !
दाम्पत्य -जीवन की पूरी यात्रा का गतिमय शब्द -चित्र प्रस्तुत किया है !
बालो के पकने ,झुरियां पड़ने और घुटने में दर्द के बाद भी
प्रेम में कोई शिथिलता नहीं वरन शमा -परवाने जैसा
अटूट ,मनमोहक प्रेम की तल्लीनता ,प्रगाढ़ता मन को
गुदगुदा रही है !मधुर भाव ,(जो सभी भावों से मधुरतम है )
और कोमलकांत पदावली में लिखी सशक्त रचना के लिए बधाई !!
ghonsala khali to kyaa? mohabbat ki yadain to alkh jagaye rakhengi:) nice subject u chose to write on:)
pankaj ji jane kyoo in panktiyo ke saath mujhey apne maa pita ji ki yaad aa gayi..aankhe nam ho aayi... sab kuch nahi likh sakti leikin yahi kahungi kavita bahut hee sundar aur laajwaab hai...
bahut badhiya kavita hai.pati-patni ka prem to waqt ke sath har jimedari ke sath badhta hi jasta hai........
" अब तो हद हो गयी है यार !" -
कविता के लिएँ आप सब की और से भावपूर्ण और सम्माननीय टिप्पणीयाँ मिली है | आप सब ने अपना समय यहाँ दिया उसके लिएँ मैं आभारी हूँ |
सादर,
मनोजकुमार, कल्पना गवली, सुनीता जाधव, रमण कथूरिया, नरेन्द्र व्यास, संगीता स्वरूपजी (गीत), सुनिल गज्जानी, चेतन, नविन चतुर्वेदी, उदय, स्वप्निल |
डॉ. सरोजजी और डॉ. नूतन, आपने बहुत गहराई से विस्तृत विचार रखें है, जिसे सर आँखों पर रखता हूँ |
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