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In:

इमरोज़ की कवितायें


(१)
ज़िंदगी तस्वीर भी है
और तक़दीर भी

मन चाहे रंगों से
बन जाये तो तस्वीर
अनचाहे रंगों से
बने तो तक़दीर.....
(२)
जब तू चली जाती है
ज़िंदगी ग़ज़ल हो जाती है
और जब तू आ जाती है
तो ग़ज़ल ज़िंदगी हो जाती है....

In:

संतोष श्रीवास्तव की कवितायें






१. पतझड़

ये सूखे, शाख़ों से रूठे से पत्ते
हवा में खड़कते, लरजते ये पत्ते
बहारों में नाज़ुक सी कोपल में उभरे
शाख़ों की उँगली में मरकत से पनपे

इवा गुदगुदाती तो शरमा के पत्ते
लुके जाते अपनी ही डालों में पत्ते
लरजते सरसते से रूमानी पत्ते
बहकते, सम्हलते, मचलते ये पत्ते

मगर आज पीले, रूठे से पत्ते
झरे जा रहे हैं
खि़ज़ाँ से सहमते झरे जा रहे है।
हवा एक बौरायी महबूबा जैसी
बिफ़रती, खड़कती
बियाबाँ में अपनी चीखें पिरोती
अपने महबूब पत्तों की मैयत उठाए
चली जा रही है
झरे पत्र पर सर धुने जा रही है
चली जा रही है, चली जा रही है।

2. नदी तुम रूको
नदी तुम रूको
तो मैं पल्लू पकड़ लूँ
तो मैं लहरों पे लिख दूँ
कई चिट्ठियाँ
नदी तुम रूको
वक्ष पर मैं तुम्हारे हथेली धरूँ
और हथेली में लाखों लकीरें भरूँ
अपने शब्दों के रूमाल
शँखों में बाँधू
भावुक सी कुछ सीपियाँ
तुमसे माँगू
नदी तुम रूको
चाँद का अक्स मुझको उठाने तो दो
मेरे हाथों को कुछ मुस्कुराने तो दो
नदी तुम रूको
मेरी जानिब झुको


204, केदारनाथ को.हा.सो.,सेक्टर 7, निकट चारकोप बस डिपो,
कांदिवली (प)मुम्बई - 67
फोन - ९८६९०४१७०७ / 9769023188



In:

संतोष श्रीवास्तव


१.
जिन्दगी को हाँ कह दी है

एक कली भोर की मुस्कुराहट पहन
रात का शबनबी कम्बल उतार
पँखुड़ी-पँखुड़ी अँगड़ाई ले
सँवर उठी है मेरे मुक़द्दर की
उन डालियों पर
जहाँ ज़र्द पीले पत्तों का
कमज़ोर सा सरमाया था
टूट पड़ने को आतुर
जैसे मेरी साँसें
जो अब बूरी तरह खटकने लगी हैं
तुम्हारे सीने में
मेरे नाजुक बदन का
यह पहाड़ सा दर्द
जिसको देखते हुए बूझते
तुम काँप जाते हो मुझसे
तो सुनो मैंने मौत को
अभी
इंकार कर दिया है
और
जिन्दगी को शहंश कह दी है।

२. उतरते मार्च की चंद तारीखें

आज फिर चली हैं फागुनी हवाएँ
मन हुआ
आँगन में फिर महकें
सफेद फूल जुही के
फिर पकी निंबोली टपकें
तोते मँडराएँ
मुट्ठी भर आसमान फिर हो जाए अपना सा
फिर घोला जाए सत्तू चिलचिलाती दोपहर में
कहीं दूर पपीहा टेरे
कहीं दूर कच्चे आमों की महक
ले आएं हवाएँ
टूटी खिड़की के अंदर तक
तुम देखो अवष भाव से
कि तुम ला सकते हो सितारे
आकाश से तोड़कर मेरे लिए
और मैं
फिर देखूँ
दहलीज के पास उतारे
तुम्हारे फटे जूतों को
किवाड़ पर टँगी
तुम्हारी रफ़ पतलून को
क्यों मौसम छल जाता है अक्सर
क्यों याद आता है भूला सब
बार बार...!

In:

"कह-मुकरी" - योगराज प्रभाकर


आदरणीय पंकज भाई जी, एक बहुत ही पुरातन और लुप्तप्राय: काव्य विधा "कह-मुकरी" पर कलाम आजमाई की है! हज़रत अमीर खुसरो द्वारा विकसित इस विधा पर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी बहुत स्तरीय काव्य-सृजन किया है ! मगर बरसों से इस विधा पर कोई काम नहीं हुआ है ! "कह-मुकरी" अर्थात कह कर मुकर जाना वास्तव में दो सखियों के बीच का संवाद है ! जहां एक सखी अपने प्रियतम को याद करते हुए जब कुछ कहती है तो दूसरी सखी उससे पूछती है कि क्या वाह अपने साजन की बात कर रही है तो पहली सखी बड़ी चालाकी से इनकार करके (मुकर कर) किसी ओर चीज़ की तरफ इशारा कर देती है !
().

इसको
अपनी शान भी माना,

शाने
हिन्दुस्तान भी माना,

देख
हृदय हो भाव विभोर,

सखी साजन ? न सखी मोर !
(२).
इस
बिन तो वन उपवन सूना,

सच
बोलूँ तो सावन सूना,

सूनी
सांझ है सूनी भोर,

सखी साजन ? न सखी मोर !

(३).
ऐसा
न हो - वो न आए,

घड़ी
मिलन की बीती जाए,
सोचूँ, देखूं शून्य की ओर,
सखी साजन ? न सखी मोर !

(४).
देख
बदरिया कारी कारी,

वा
की चाल हुई मतवारी,

हो न जाए ये बरजोर,
सखी साजन ? न सखी मोर !

(५).
मादक
स्वर में ज्योंही पुकारे,

सजनी
भूले कारज सारे ,

उठे
हिया में अजब हिलोर,

सखी साजन ? न सखी मोर !

(६).
देख
बदरिया मचला जाए,

नृत्य
से सजनी को फुसलाए,
बड़ा चतुर है ये चितचोर,
सखी साजन ? न सखी मोर !

(७).
सारा
गुलशन खिल जाएगा,

कुछ
भी हो पर वो आएगा,

जब
आए बादल घनघोर,

सखी साजन ? न सखी मोर !

()
श्याम रंग, सिर कलगी सोहे,
क्या
बतलाऊँ, महिमा तोहे,

चाँद कहूँ या कहूँ चकोर
सखी साजन ? न सखी मोर !
().
सांवली
मैं वो गोरा गोरा

लगता
है चंचल सा छोरा

भले
वो मुझसे उम्र-दराज
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
(१०).
जी
करता इस में खो जाऊँ

इसकी
गोदी में सो जाऊँ

और
कहूँ क्या आए लाज

सखी साजन ? न सखी ताज ! *

(११).

रूह-ओ-दिल पे छा जाता है
सबके मन को भा जाता है,
सबके मन पर इसका राज़,
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *

In:

तीन कवितायें - डॉ. सुधा ओम ढींगरा (यू. एस. ए )


(१) पतंग
परदेस के आकाश पर
देसी मांजे से सनी

आकाँक्षाओं से सजी
ऊँची उड़ती मेरी पतंग
दो संस्कृतियों के टकराव में
कई बार कटते -कटते बची
शायद देसी मांजे में दम था
जो टकरा कर भी कट नहीं पाई
और उड़ रही है .....
विदेश के ऊँचे- खुले आकाश पर ....
बेझिझक, बेखौफ ....


() प्रतीक्षा
पुस्तकों से लदी- भरी
दुकान में
ग्राहकों को देख कर
कोने में दुबकी पड़ीं
धूल से सनी
दो तीन हिन्दी की पुस्तकें
कमसिन बाला सी सकुचातीं
विरहणी सी बिलखतीं
अँगुलियों के स्पर्श को तरसतीं
पाठक प्रेमी के हाथों में
जाने की लालसा में
प्रतीक्षा रत हैं
पर अंग्रेज़ी दादा का वर्चस्व
प्रेमियों को
उन तक पहुँचने नहीं देता......


(३) सच कहूँ

सच कहूँ,
चाँद- तारों की बातें
अब नहीं सुहाती .....

वह दृश्य अदृश्य नहीं हो रहा
उसकी चीखें कानों में गूंजती हैं रहती |
उसके सामने पति की लाश पड़ी थी,
वह बच्चों को सीने से लगाए
बिलख रही थी ....
पति आत्महत्या कर
बेकारी, मायूसी, निराशा से छूट गया था |

पीछे रह गई थी वह,

आर्थिक मंदी की मार सहने,
घर और कारों की नीलामी देखने |
अकेले ही बच्चों को पालने और
पति की मौत की शर्मिंदगी झेलने |

बार -बार चिल्लाई थी वह,
कायर नहीं थे तुम
फिर क्या हल निकाला,
तंगी और मंदी का तुमने |

आँखों में सपनों का सागर समेटे,

अमेरिका वे आए थे |
सपनों ने ही लूट लिया उन्हें
छोड़ मंझधार में चले गए |

सुख -दुःख में साथ निभाने की

सात फेरे ले कसमें खाई थीं |
सुख में साथ रहा और
दुःख में नैया छोड़ गया वह |
कई भत्ते देकर
अमरीकी सरकार
पार उतार देगी नौका उनकी |

पर पीड़ा,
वेदना
तन्हाई
दर्द
उसे अकेले ही सहना है

सच कहूँ,
प्रकृति की बातें
फूलों की खुशबू अब नहीं भरमाती......
डॉ. सुधा ओम ढींगरा (यू. एस. ए )

In:

श्री नन्दकिशोर आचार्य की कविताएँ


१. पत्ता वह क्या करे लेकिन
खिलाता है हरे पल्लव
सूखे पत्तों को लेकिन
गला देता है-
प्यार है
मृत्यु भी है जल
किसी के लिए

पत्ता वह क्या करे लेकिन
जो जल की कामना में
सूख जाता है।

२. खोजती है जो

खोजती है किसको यह
खामोशी से निसरती आवाज
सूने आकाश में
खुद
गुम हो जाती हुई

खामोशी जो व्याप्ति है
खुद
उस तलाश की
खोजती है जो
खुद से निसरती आवाज।

३. मृत्यु खुद भी

अगर मैं काल में हूँ
तो अनन्त क्यों नहीं
अगर मैं दिक में हूं
तो लौट-लौट
क्यों आता नहीं यहीं

बाहर हूँ दिक्काल से
तो मृत्यु फिर क्या कर लेगी मेरा

अगर दिक्काल में है वह
ते मृत्यु खुद भी
मर्त्य कैसे नहीं ?

४. मरुथल भी

हवा के हर मिजाज के साथ
बदल जाता है
उसका रूप

यह मरुथल भी
क्या प्यार करता है
हवा को !

५. कुछ नहीं बोलता है पेड

खिलता है हर लम्हा
तुम-सा
मुर्झा कर झर जाता
मुझ-जैसा

कुछ नहीं बोलता है
पेड
महकाता रहता केवल
झर गये फूल की खुशबू
खिलते फूल में
चुपचाप !

६. तुम्हें क्या

मानी हो मेरा तुम
इससे तुम्हें क्या करना

मानी को मतलब क्या इससे
कौन है शब्द उसका
पूर्ण है खुद में वह
निश्शब्द
चाहे भटकता ही रहे
विकल
उसकी तलाश में शब्द

कविता
शब्द की विकलता है क्या ?

In:

होली विशेषांक.... अलका सिन्हा, विनय वेद, सुजीत सिंह और नवीन सी.चतुर्वेदी


रंग डालें बासंती अलका सिन्हा

अबकी ऐसे फाग मनाओ

दीवारों पर रंग लगाओ

रंग भरी भीगी दीवारें

महक उठें सोंधी दीवारें

नरम पड़ी गीले रंगों से

जहाँ-तहाँ टूटें दीवारें.

दीवारें घर के भीतर की

दीवारें मंदिर-मस्जिद की

दीवारें झोंपड़-महलों की

दीवारें मानस-मानस की

रंग डालें बासंती.

बरसे अबकी इतना रंग

बह जायें गलियारे तंग

दीवारों से राह बने

आने का हो आमंत्रण.

दीवारें घर को जोड़ें

घर में दीवारें तोड़ें

रंग भरी दीवारों से

अबकी हम भी गले मिलें

दीवारों के गीले रंग

हमको भिगा-भिगा कर के

रंग डालें बासंती.

************************ ************ ************

अलका सिन्हा

जन्म : 09 नवम्बर, 1964

भागलपुर, बिहार

शिक्षा : एम. बी. ए., एम. ए., पी. जी. डी. टी.,

केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, गृह मंत्रालय द्वारा संचालित अनुवाद प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में रजत पदक

रचना - कर्म कविता - संग्रह

* काल की कोख से

* मैं ही तो हूँ ये ( पुरस्कृत)

* तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ

कहानी - संग्रह* सुरक्षित पंखों की उड़ान

कविताओं का पंजाबी, उर्दू और मराठी अनुवाद देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशितआकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा द्वारा दर्जनों कहानियां नेपाली में अनूदित और प्रसारितप्रतिष्ठित पब्लिक स्कूलों के हिन्दी विषय के पाठ्यक्रम में कहानी सम्मिलितकविताएं, कहानियां और समीक्षात्मक निबंध प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारितकविताएं बी. बी. सी. से प्रसारित आकाशवाणी के इंद्रप्रस्थ चैनल पर प्रसारित धारावाहिक 'संस्कार' के लिए शीर्षक - गीत लेखनकविता, कहानी और निबंध के अनेक संग्रहों की सहयोगी रचनाकार

विशिष्ट गतिविधियां

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के सौजन्य से वर्ष 2008 में ब्रिटेन के विभिन्न शहरों में काव्य पाठवर्ष 1999 में लंदन में आयोजित छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन में शोधपत्र का पाठगत बारह वर्षों से गणतंत्र-दिवस परेड का आँखों देखा हाल सुनाने का गौरव और राष्ट्रीय महत्व के अन्य कार्यक्रमों की रेडियो कमेंटेटरदिल्ली दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम 'पत्रिका' की विशिष्ट श्रृंखलाओं की प्रस्तोताआकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा में पूर्व हिन्दी उदघोषकएयरलाइन्स कर्मियों को उदघोषणा संबंधी जानकारी देने के लिए आयोजित वॉइस कल्चर ट्रेनिंग में फैकल्टी पर्सन अंतरराष्ट्रीय लेखन से जुड़ी हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका 'अक्षरम् संगोष्ठी' की सह-संपादक (मानद और अवैतनिक)मासिक पत्रिका 'भारतीय पक्ष' के स्त्री - विमर्श पर केन्द्रित मई, 2010 अंक की अतिथि संपादकअनेक मूर्धन्य साहित्यकारों से साक्षात्कार प्रकाशित एवं प्रसारितबाल-पत्रिका 'नंदन' के स्थायी स्तम्भ 'विश्व की महान कृतियां' के लिए अनेक हिन्दीतर कृतियों का हिन्दी कहानी रूपांतरणराष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एन.सी.ई.आर.टी.) के श्रव्य-दृश्य शिक्षण कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरणकेन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की सूचीबद्ध साहित्यकारदिल्ली विश्वविद्यालय से अनुवाद की अतिथि प्राध्यापक के रूप में संबद्धकेन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद की पूर्व 'साहित्य एवं संस्कृति मंत्री'परिचय साहित्य परिषद की सचिव एशियन अकैडमी ऑफ आर्ट्स (ऐन इनिशिएटिव ऑफ एशियन सोसाइटी ऑफ फ़िल्म एंड टेलीविजन), फिल्म सिटी, नोएडा की सदस्यविभिन्न साहित्यिक - सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संयोजन-संचालन

सम्मान कविता - संग्रह 'मैं ही तो हूँ ये' पर हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा साहित्यिक कृति-सम्मान- २००२ सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्था 'उद्भव' द्वारा साहित्य के लिए मानव सेवा सम्मान - २००४ प्रवासी संगठन, नई दिल्ली द्वारा साहित्य के लिए प्रवासी रत्न सम्मान - २००४ समकालीन साहित्य मंच, मुंगेर द्वारा लाला जगत ज्योति स्मृति सम्मान - २००८ संसदीय हिन्दी परिषद द्वारा संसद के केन्द्रीय कक्ष में राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान - २००९ विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर द्वारा 'विद्यावाचस्पति' की उपाधि–२०१० अखिल भारतीय साहित्य परिषद् एवं कारवाने-अदब, करनाल द्वारा श्रीमती दयारानी स्मृति सम्मान – २०११ महात्मा फुले रिसर्च अकादमी, नागपुर द्वारा अमृता प्रीतम राष्ट्रीय पुरस्कार - २०११

संप्रति : एअर इंडिया में कार्यरत

संपर्क : 371, गुरू अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. - 2, सेक्टर - 6, द्वारका

नई दिल्ली : 110075

************************************************

होली रहने दो : विनय वेद

न बहे हुआ सब लाल, सो गुलाल रहने दो !

कयामत है या है यह सैलाब, सवाल रहने दो !!

काश दान कर सकता जापान को सब रंग,

अभी गीला है वहाँ काला, सो लाल रहने दो !

कैसे मनाऊँ होली, इतना हाहाकार है मचा,

कुछ न बचा सकी दुआ, यह ढाल रहने दो !

बरसों लगे थे बनने में, अब फिर बरसों लगेंगे,

पल में तो बस प्रलय होती है, कमाल रहने दो !

लगाने हैं अगर रंग, तो ख़ुदा को ही लगा लो,

छीन के सब कुछ कह रहा यही हाल रहने दो !

Copyright @ Vinay Ved

Vinay Sharma
Flat No. 103, Chinar Heights, Peer Muchhaila, Adjoining Sector 20,
NAC Zirakpur,
Dist. Mohali
Punjab
Mobile : +91-9855071888
Email : zenvinay@gmail.com

() दो- कविता : सुजीत सिंह

रंग की फुहार है , गीत की बहार है
बॉंटता जो प्यार है , होली का त्यौहार है
धूम ही मचायेंगे , होली यूं मनायेंगे
यारों की टोली में , गॉंव की होलीमें
हाथों में रंग लिये , पिचकारी संग लिये
झूमझूम गायेंगे . होली यूं मनायेंगे
गॉंव की जो गोरियॉं , भाभी और छोरियां
देख रंग हाथों में , घुस गई अहातों में
दरवज्जा तुडवायेंगे , होली यूं मनायेंगे
रंग लगा गालों में , भर अबीर बालों में
बीती बात भूल गये, हम गले से झूल रहे
भेद सब मिटायेंगे ,होली यूं मनायेंगे
पंहुचे नदी के घाट पर , भंगिया को बॉंट कर
छान कर डटाई है , मस्ती खूब छाई है
गीत गुनगुनायेंगे ,होली यूं मनायेंगे
कधे पर शर्ट टॉंग , धर के विचित्र स्वांग
होंठों पर गीत फाग . ढपली पर बजे राग
तुमको नचवायेंगे , होली यूं मनायेंगे
बाटी और दाल है , चूरमा कमाल है
पत्तों की थाली है , गंध भी मतवाली है
डट के खूब खायेंगे , होली यूं मनायेंगे
रंग की फुहार है , गीत की बहार है
बॉंटता जो प्यार है , होली का त्यौहार है
धूम ही मचायेंगे , होली यूं मनायेंगे

()

आओ मिलके खुशियाँ मनाएँ,
खेलें सब संग, होली है.

उडाये पिचकारी, लगाए गुलाल
रंगीन बनाएं होली है

लकडियों का ना नाश करें हम
पौधें लगाएं, होली है

बहनों को ना चेडें कोई
गुलमिलके मनाएं होली है

भगवान् का हम नाम जपेंगे
भस्म करें धरिंदों को, होली है

छुए ना भांग, खाए पकवान
मनाएं मस्ती, होली है

टेस ना पहुंचाएं, किसीको
साथ में खेले होली है

हास्य का कविताएं सुनेंगे
जी भर के हँसेंगे होली है

बौरा गया नवीन नवीन सी चतुर्वेदी
==================================

कुछ ज़्यादा ही पड़ रही, महँगाई की मार|
प्रेम रंग में डूब के, होली खेलो यार||

होठों पे मुस्कान हो, मन में बजे सितार|
दिल से दिल का मेल हो, दिलदारा इस बार||

सब के जीवन में पड़े, संस्कारों की छाप|
कुविचारों का हो दमन, जलें पाप-संताप||

होली में हो लालिमा, हर मुख पर द्रष्टव्य|
गाली भी दो इस तरह, सब जन को हों श्रव्य||

प्रीत लगे पकवान सी, नैन लगें नमकीन|
रसना रसगुल्ला लगे, बौरा गया नवीन||

आखर कलश डुबोय के, विश्व कथा के रंग|
पंकज भाई झूमते, पी हो जैसे भंग||

सब कवि कवियत्रियाँ, दो कमेंट के गिफ्ट|
क़ानूनन है दोस्तो, लेना-देना लिफ्ट||