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Pankaj Trivedi
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आज का दिन
गांधीजी का शहर पोरबंदर
पोरबंदर गुजरात के समुद्र के किनारे पर बसा शहर | हमारे राष्ट्रपिता गांधीजी की जन्मभूमि | साथ ही कृष्ण के मित्र सुदामा भी यहीं बसते थे, इस कारण इसे "सुदामापुरी" से भी लोग जानते हैं | अंतरराष्ट्रीय प्रवासन में भी पोरबंदर शामिल है |
एतिहासिक दृष्टी से देखें तो यहाँ जेठवा खानदान के राजाओं का साशन था | जिन्हों ने सोलहवीं सदी में अपने राज्य की स्थापना की थी | उस वक्त के राजा को "महाराजा राणासा
हब" का ख़िताब और तेरह तोपों की सलामी दी जाती थी | यहाँ पर सुदामा चौक और सुदामा मंदिर प्राचीन है | नेहरू प्लेनेटोरियम है तो गांधीजी के जीवनदर्शन करता कीर्ति मंदिर और उनका भी पर्यटकों को लुभाता है | कथाकारश्री रमेशभाई ओझा का सांदिपनी विद्यानिकेतन, राणासाहब का महल, चोपाटी और तारा मंदिर देखने लायक है
| पोरबंदर और आसपास में हडाप्पन संस्कृति के अवशेष 14 से 16 वीं सदी के साथ सम्बन्ध थे यह भी स्पष्ट करता है | उस समय पोरबंदर समंदर के कारण महत्त्व का बंदरगाह होगा, ये सबूत भी मिलता है |


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4 comments:
बहुत सुंदर बहुत अच्छा व२आह क्या बात है...???
http://www.todays24.com/
मैं फिर जनम लूंगा
फिर मैं
इसी जगह आउंगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा ।
इस समूह में
इन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता !
पर इन आवाजों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा ।
मेरी तो आदत है
रोशनी जहाँ भी हो
उसे खोज लाऊँगा
कातरता, चु्प्पी या चीखें,
या हारे हुओं की खीज
जहाँ भी मिलेगी
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा ।
जीवन ने कई बार उकसाकर
मुझे अनुलंघ्य सागरों में फेंका है
अगन-भट्ठियों में झोंका है,
मैने वहाँ भी
ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किये
बचने के नहीं,
तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ?
तुम मुझकों दोषी ठहराओ
मैने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है
पर मैं गाऊँगा
चाहे इस प्रार्थना सभा में
तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ
मैं मर जाऊँगा
लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा
कल फिर आऊँगा ।
Aparna, bahut sundar kavita...
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