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नरेन्द्र व्यास
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अतिथि-कविता
अरुण चन्द्र रॉय की दो कविताएँ
"विश्वगाथा" पर आज हमारे लिएँ ख़ास "अतिथि" जो है वह पेशे से कॉपीरायटर तथा विज्ञापन व ब्रांड सलाहकार | दिल्ली और एन.सी.आर. की कई विज्ञापन एजेंसियों के लिए और कई नामी गिरामी ब्रांडो के साथ काम करने के बाद स्वयं की विज्ञापन एजेंसी तथा डिजाईन स्टूडियो - ज्योतिपर्व का सञ्चालन. अपने देश, समाज व लोगों से सरोकार को बनाये रखने के लिए कविता को माध्यम बनाने वाले जानेमाने कवि अरुण चन्द्र रॉय |
उनकी कविताओं में खासियत यह है कि वर्त्तमान घटनाओं के साथ प्रयोगशील कविताओं पर भी अपनी परिकल्पना के चित्र कलम के द्वार बखूबी बनाने की क्षमता रखते हैं | कुछ ही देर में आपके सामने होगी यह कवितायेँ.... "विश्वगाथा" पर...
उनकी कविताओं में खासियत यह है कि वर्त्तमान घटनाओं के साथ प्रयोगशील कविताओं पर भी अपनी परिकल्पना के चित्र कलम के द्वार बखूबी बनाने की क्षमता रखते हैं | कुछ ही देर में आपके सामने होगी यह कवितायेँ.... "विश्वगाथा" पर...
1.
ईश्वर और इन्टरनेट
बाज़ार
है सजा
ईश्वर और इन्टरनेट
दोनों का।
ईश्वर
और इन्टरनेट
एक जैसे हैं
ईश्वर विश्वव्यापी है
इन्टरनेट भी
कण कण में
समाये हुए हैं दोनों
हर ज्ञानी अज्ञानी के
रोम रोम में
रचे बसे हैं
दोनों।
जिनते पत्थर
उतने ईश्वर
मंदिरों से
मजारों तक
गिरजा से
गुरूद्वारे तक
गली गली
हर चौबारे पर
मिल जाएगा
ईश्वर के रूप
निराकार
साकार
सनातन
चिरंतन।
इन्टरनेट भी !
आस्तिक
नास्तिक
सगुन
निर्गुण
अद्वैत
द्वैत
इन्टरनेट के रूप हैं
ईश्वर के भी
सुबह से
देर रात तक
ईश्वर
और इन्टरनेट
दोनों के दरबार
भरे रहते हैं,
दोनों
वर्चुअल हैं
आभासी
किया जा सकता है
इन्हें महसूस, लेकिन
नहीं जा सकता छुआ
दोनों के
दुकान सजे हैं
बाजार सजा है
पण्डे और पुरोहित हैं
प्रचारक और
पी आर कंपनिया है
एजेंट्स हैं
ईश्वर को
नहीं देखा मैंने
भूख मिटाते
रोग भागते
हां
जरुर देखा है
अपने प्रांगन में पैदा
करते भिखारी
पोर्न
सेक्स
उन्माद
जेहाद
व्यविचार
सब हैं यहाँ
अंतर
इतना भर है कि
ईश्वर को पाने का
एक और माध्यम
बनता जा रहा है
इन्टरनेट।
विश्व व्यापी जाल
ईश्वर और इन्टरनेट
2.
अंजुरी भर ख़ुशी
वह
अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
दोनों बाहें पसार
महसूस करना चाहती है हवा
ऊँचा कर अपने हाथ
छू लेना चाहती है आसमान
वह अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
ओस की बूंदों को
समेटना चाहती है
अपनी नन्ही हथेलियों में
और गीले करना चाहती है
अपने होठ
वह बादलों के
नीले पंखों पर सवार हो
घूमना चाहती है दुनिया
नहीं चाहती है खोना
गुमनामी के भीड़ में
नहीं पसंद है उसे
मशीनी शोर
मुखौटे वाले दोस्त
गुनगुना चाहती है
किसी की कानों में
ए़क मीठी धुन और
फुसफुसाना चाहती है
किसी की धडकनों से साथ
ए़क कहानी की तरह
समा जाना चाहती है
किसी में
अपने छोटे छोटे
खाव्बों के साथ
और जीना चाहती है
एक पल के लिए
सिर्फ अपने लिए
वह अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
***
ब्लॉग : www.aruncroy.blogspot.com
ईश्वर और इन्टरनेट
बाज़ार
है सजा
ईश्वर और इन्टरनेट
दोनों का।
ईश्वर
और इन्टरनेट
एक जैसे हैं
ईश्वर विश्वव्यापी है
इन्टरनेट भी
कण कण में
समाये हुए हैं दोनों
हर ज्ञानी अज्ञानी के
रोम रोम में
रचे बसे हैं
दोनों।
जिनते पत्थर
उतने ईश्वर
मंदिरों से
मजारों तक
गिरजा से
गुरूद्वारे तक
गली गली
हर चौबारे पर
मिल जाएगा
ईश्वर के रूप
निराकार
साकार
सनातन
चिरंतन।
इन्टरनेट भी !
आस्तिक
नास्तिक
सगुन
निर्गुण
अद्वैत
द्वैत
इन्टरनेट के रूप हैं
ईश्वर के भी
सुबह से
देर रात तक
ईश्वर
और इन्टरनेट
दोनों के दरबार
भरे रहते हैं,
दोनों
वर्चुअल हैं
आभासी
किया जा सकता है
इन्हें महसूस, लेकिन
नहीं जा सकता छुआ
दोनों के
दुकान सजे हैं
बाजार सजा है
पण्डे और पुरोहित हैं
प्रचारक और
पी आर कंपनिया है
एजेंट्स हैं
ईश्वर को
नहीं देखा मैंने
भूख मिटाते
रोग भागते
हां
जरुर देखा है
अपने प्रांगन में पैदा
करते भिखारी
पोर्न
सेक्स
उन्माद
जेहाद
व्यविचार
सब हैं यहाँ
अंतर
इतना भर है कि
ईश्वर को पाने का
एक और माध्यम
बनता जा रहा है
इन्टरनेट।
विश्व व्यापी जाल
ईश्वर और इन्टरनेट
2.
अंजुरी भर ख़ुशी
वह
अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
दोनों बाहें पसार
महसूस करना चाहती है हवा
ऊँचा कर अपने हाथ
छू लेना चाहती है आसमान
वह अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
ओस की बूंदों को
समेटना चाहती है
अपनी नन्ही हथेलियों में
और गीले करना चाहती है
अपने होठ
वह बादलों के
नीले पंखों पर सवार हो
घूमना चाहती है दुनिया
नहीं चाहती है खोना
गुमनामी के भीड़ में
नहीं पसंद है उसे
मशीनी शोर
मुखौटे वाले दोस्त
गुनगुना चाहती है
किसी की कानों में
ए़क मीठी धुन और
फुसफुसाना चाहती है
किसी की धडकनों से साथ
ए़क कहानी की तरह
समा जाना चाहती है
किसी में
अपने छोटे छोटे
खाव्बों के साथ
और जीना चाहती है
एक पल के लिए
सिर्फ अपने लिए
वह अंजुरी भर
पाना चाहती है ख़ुशी
***
ब्लॉग : www.aruncroy.blogspot.com
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15 comments:
ईश्वर और इंटरनैट में एक अंतर जरूर है कि इंटरनैट पर पोस्ट पहले लगती है उसका प्रभाव बाद में होता है जबकि ईश्वर पर प्रभाव पोस्ट होता है। और भी बहुत से अंतर हैं; इंटरनैट एक जाल है और ईश्वर एक छोर।
दोनों कवितायें प्रभावशाली हैं।
दोनों रचनाएँ अच्छी लगीं ...ईश्वर हमारी आस्था है ...
अच्छी लगी दोनो रचनाये...पर क्या अक्सर वो जी पति है एक पल भी सिर्फ और सिर्फ अपने लिए???
Dushyant Chopra :
Pankaj Ji, Arun Ji Ki Dono Kavitaayein,.... ईश्वर और इन्टरनेट ..AUR.. अंजुरी भर ख़ुशी....Achchhi Lagin.... Dhanyawaad....:--)
Both the poems are wonderful!!!
especially the first one.
What a balanced and multivariate analysis.
..ईश्वर तथा इन्टरनेट-कही कोई साम्यता नहीं ...सही ही कहा है ..जहाँ न पहुंचे रवि ,वहाँ पहुंचे कवि.
Many many thanks to Arunji and Pankajji.
दोनो ही रचनायें बेहतरीन हैं।
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (4/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
donon rachnaen sundar hain. Pankaj ji blog par achchhi kavitaen padhne ko mil rahi hain .
aabhar!
Om. Arun ji dono kavitayen ati sunder hain. Eeshwar ko prangan mein bhikhari paida kartay dekha hai, usi tarah internet par hackers hain. Dilchasp chitran anjuli bhar khushi ka... Aabhaar...
दोनों रचनाएँ अच्छी लगीं
ईश्वर और इन्टरनेट
आस्तिक-नास्तिक
सगुन-निर्गुण
अद्वैत-द्वैत
इन्टरनेट और ईश्वर के रूप हैं
सुंदर....
dono rachnaein bahut achhi hain....badhai
पहली कविता में समस्या है। अगर आप ईश्वर को मानते हैं तो फिर उसके लिए माध्यम नहीं चाहिए। कहते हैं कि वह कण कण में मौजूद होता है। इंटरनेट के लिए आपको दुनिया भर का तामझाम चाहिए। बिना उस तामझाम के आप इंटरनेट का इ भी नहीं जान सकते। इसलिए अरुण भाई यह साम्यता नहीं हो सकती।
दूसरी कविता अच्छी है।
कविता के लिहाज से दोनों कविताओं में व्याकरण की अशुद्धियां खटकती हैं। वर्तनी की अशुद्धियां तो हैं ही।
अरुण चन्द्र राय जी की दोनों रचनाएँ सुन्दर हैं उन्हें यहाँ प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार!
किसी भी जाल से मुक्ति का मार्ग है ईश्वर - अंतरजाल से मुक्ति भी चाहता है इंसान जब उसमे कैद हो जाता है... कविता दोनों शानदार - अंजुरी भर ख़ुशी बहेतरीन .. पंकज जी धन्यवाद इन कविताओ को हम तक पहुचाया |
दोनों कवितायेँ नहीं सोच का परिचय देती हुई बहुत अच्छी लगी.
कभी भगवान और इन्टरनेट के बारे में इस गहनता से नहीं सोचा था.
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