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Narendra Vyas
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कथा-कहानी
पांचवीं किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी
गतांक से आगे.. (पांचवीं किश्त)
कई बार तुम्हें देखकर ही मुझे ख़याल आता था कि जीवन में सभी सजीव दूसरे जीवों पर आधारित होते हैं | सबको अपनी इच्छाएं होती हैं, थोड़ा भी स्वार्थ होता हैं और उसे मीठा-सा नाम दिया जाता है प्रेम का | शार्क मछली ने जब से इंसान को निगलना शुरू किया है तब से उसकी आक्रामकता में घुलमिल गई है दगाखोरी !! इंसान भी शार्क जैसा हैं |
मगर मेरे सामने देखने की तुम्हारी इच्छा ही कहाँ? मैं बेसब्री से रटता था तुझे और आज भी कहाँ भूल पाया हूँ? शायद इसीलिए ही मेरी ज़ख़्मी संवेदना के घाव को कलम से कुरेद रहा हूँ | मैं अभी भी तुझे चाहता हूँ, यही पीड़ा मेरे जीवन का रक्त बनकर मुझे ज़िंदा रखती हैं |
मैं तुम्हारे लिए पागल बनकर दौड़ता था और तुम बिलकुल अनजान थी | मगर मैं तुम्हें जिस जिज्ञासा से देखता उसी तरह मेरा इंतज़ार करती कई अन्य मछलियाँ भी तो थी ! यह कैसा प्रेमचक्र हमारे जैसे कई प्रेमियों के लिए? जिसे चाहते हैं उसे देख सकें मगर पा नहीं सकते ! जो पा लेता हैं वह तो सिर्फ दंभ हैं, दिखावा हैं इसलिए उसमें बेचैनी नहीं रहती बल्कि छटपटाहट ही ज्यादा देखने को मिलती हैं | कैसा अजीब है यह जीवन हमारा?
तुम्हारे प्रति मेरा पागलपन देखकर फ़ोरेन रिटर्न मछली ने पूछा; "तुम अभी भी संवेदनाओं में ही जी रहे हो? कौन समझेगा तुम्हारी भावनाओं को?" तब मैंने उसके सामने देखा और तुरंत वह दूसरी दिशा में तैरने लगी, जहां मछलियों का समूह उसका इंतज़ार करता था...! मुझे पता था कि प्यार की सच्चाई में उसे ज्यादा रुचि नहीं थी | उसके लिए तो जीवन यानी आनंद.... आनंद... और सिर्फ आनंद | जो मिले उसमें आनंद पाने के कारण उसका मन कहीं स्थिरता प्राप्त नहीं कर पाता था | अगर ऐसा होता तो किसी के जीवन में दु:ख-दर्द ही न होता | इसी कारण से वह निरंतर घूमती रहती थी, भंवरे की भाँति !
आजकल तो समाज में देखते हैं तो सब जगह आधुनिकरण का अजगर सबको भींस पीस लेता हैं | एनाकोंडा जैसी मानसिकता में हमारी युवा पीढ़ी में लज्जा की बात तो दूर, बेफिक्र होकर कैसे ठेस पहुंचाते हैं ! युवक-युवतियों को समंदर के किनारे देखूं तो तुम्हारी याद आती हैं | उसमें मछली जैसी चंचलता तो बहुत होती हैं मगर संस्कार... बड़ा अंतर देखने को मिलता हैं | वास्तविकता कितनी कुरूप लगती हैं हमें ?
मैं हमेशा इन्हीं प्रश्नों की जाल में फंसता जाता हूँ और उसमें से ही प्रत्युत्तर खोजने को मथता रहता हूँ |
मुझे ये सब रास आता नहीं था | एक ओर आधुनिकता हैं तो दूसरी ओर मेरा पुरातन इतिहास है | मान, मर्यादा और संस्कार हैं | प्रेम है तो सच्चाई भी हैं | आज के युग की तरह छिछोलापन का तो काम ही नहीं | तुम ही कहो न...... आजतक तुझे कुछ भी कह पाया हूँ ? मैं तो अकेले में मेला और मेले में अकेला देखने का आदि था |
इसीलिए मेरे जीने का अंदाज़ ही निराला हैं | मैं शायद ही बोलता मगर मेरा जीवन ही बोलने लगा है अब ! उसके लिए मंझा हुआ मन भी तो चाहिए न? जो बारबार अनुभव कर सके जीवन को एक-एक पल में जी सकें ! मैं जी रहा था, चाहता था सिर्फ तुम्हारे लिएं ही !
मगर उसके लिए तो विचारशील और अनुभवी मन भी चाहिए | जो हर पल को समझ सके | वो सारी पल मेरा धबकार बन गई थी | मैं जी रहा था, बेचैनी से रटता था और चमक रहा था सिर्फ तुम्हारे लिए ही | मुझे अब वह दु:ख भी नहीं है कि तुम मुझे देख न पाई, मुझे समझ न पाई या फिर मिली भी नहीं | मेरी नियति में तुम्हारे लिए अटूट वेदना का बंधन ही लिखा होगा | हम अपनी नियति को झूठी कैसें साबित कर पाएं भला ! मुझे तो उस मछलियों ने कही थी वह व्यथा कि बात याद आती हैं ; अर्जुन ने भले ही बींध डाली मेरी आँख ! ऐसी एकाग्रता कौन दे सकता उन्हें मेरे सिवा... ?
कितना बड़ा समर्पण है उस मछली का ? मैं भले ही तुम्हारे नाम की माला का जाप करता रहा मगर उस मछली की तरह समर्पण करने की ताक़त ही कहाँ? मेरा अभी भी खुद पर भरोसा नहीं हैं | मुझे तो लगता है कि एक्वेरियम में मछली ने जब निश्वास छोड़ा होगा तब जल की सतह पर कैसे बुलबुले बने होंगे ! पल-पल तुम्हें रटने और प्रतीक्षा में अनिमेष नज़रों से समंदर को देखता रहता हूँ | मेरी आँखों की रौशनी भले ही कम हो रही हो मगर मेरी श्रद्धा में कभी भी ओट नहीं आई |
मुझे याद आती हैं एक पौराणिक कथा....
अंजनीपुत्र
पवनसुत हनुमान के
पसीने में से
गर्भवती हुई
उस मत्स्यगंधा की कथा
आज भी गाते हैं समंदर की गहराई में...
कौन जाने,
फिर कब आयेगा अंजनी का जाया
उस प्रतीक्षा में..... !!
प्रेम की सच्छाई जब पराकाष्ठा पर पहुँचती है तब ही प्रतीक्षा को साधना का दरजा मिलता हैं | कई वार प्राप्त करने की इच्छा ही हमें जीवन दे देती हैं | जब सब कुछ प्राप्त हो जाये तब जीवन नीरस बन जाता हैं | प्रतीक्षा की खुशी पाने में नहीं रहती| मुझे लगता हैं कि जो हुआ सो अच्छा हुआ | फिर भी हम एक-दूसरे के मन तक तो पहुँच गए हैं, ऐसा नहीं लगता तुम्हें? तुम्हारे पक्ष में क्या स्पष्ट हैं, यह जानने की ईच्छा मुझे नहीं है | मेरी आत्मा स्वीकार करती हैं कि मैं तुम्हारे मन तक पहुँच ही गया हूँ | तुम्हारे पारदर्शी शरीर पर उभरते स्नायुओं के ताने-बाने देखकर मैं अपने जीवन बिखरे टुकड़ों को सीने के लिए मथता रहता हूँ अविरत.....!
मछलीघर में तैरती लाल, पीली, सुनहरी, रूपहली, आसमानी जैसे रंगों की आभा रचकर मेघधनुषी मछलियाँ कितनी मनमोहक और पारदर्शक लगती है ! मुझे भी तुम्हारे आँखों में रही नमीं घेर लेती हैं | मेरी नज़रों के समक्ष विशाल समंदर लहराता हुआ दिखाई देता हैं और तुम्हारी काली पुतलियों का मनोहर नृत्य, मछली जैसे ही लगे - यह घटना मेरे मन छोटी सी तो नहीं हैं | किसी की आँखों में पूरा समंदर लहराने लगे, असंख्य नदियों के अंगभंगियाँ स्नेह से मिले और अपना सर्वस्व लुटाकर विलीन हो जाए उससे बढ़कर आत्मप्राप्ति और कौन सी हो सकती हैं...?
(क्रमशः...)
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2 comments:
भाई साब प्रणाम !
शायद पौराणिक कथा पे अच्छा कथानक है .
साधुवाद ,
विम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कहती हुई कहानी बाँध कर रखती है.. अगली कड़ी की प्रतीक्षा है.. बधाई.. नव वर्ष की शुभकामना..
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