वसुंधरा पाण्डेय की कविता
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुवे पुकार न पायी !
जीवन भर की थकन भरी थी
फीकी -फीकी मुस्कानों में
इतनी गहरी रची उदासी
चित्र बनाये सुनसानो में
पलकों पर अधधुलके आंसू
का, मै रूप निहार न पायी
जन्म -जन्म की बिरहा -कुल थी
खड़ी रह गयी बिना पुकारे
तुम भी अपने में खोये थे ..
रुके नहीं आसू के द्वारे
अंतर्लीन चरण की गति को
अश्रु -प्रवीन पखार न पाए
बोझिल -बोझिल सी पलकों पर ,
ठहरा हुआ अकेलापन था
अपने को निहारते थे दृग
टुटा हुआ सपन दर्पण था
सहमी सी रह गयी तुलिका ...
मै वह चित्र उतार न पायी ..
बहुत पास से .......
साथ का अवसर पाने को
अमृत लिए तृप्ति चलती थी
एक दृष्टि का दान मिल सके ..
बंधे हाथ मुक्ति चलती थी ..
अपराधी सा मिलन समय था ...
अपना जनम सँवार न पायी ......
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुए पुकार न पायी ...
This entry was posted on 8:22 PM and is filed under अतिथि-कविता . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
24 comments:
कविता की प्रांजलता और इसका प्रवाह बहुत उत्तम है। भाविभिव्यक्ति मुखर होकर सामने आई है। कहीं-कहीं टंकण की अशुद्धियां खलती है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-परम्पराहिन्दी साहित्य की विधाएं - संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत
इतनी गहरी रची उदासी
चित्र बनाये सुनसानो में
पलकों पर अधधुलके आंसू
का, मै रूप निहार न पायी
जन्म -जन्म की बिरहा -कुल थी
खड़ी रह गयी बिना पुकारे
--सच में आँखें नाम हो गई इन पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते. बहुत भावुक रचना. अति सुन्दर. कविता का यह हिस्सा बहुत ही सुन्दर लगा.
इतनी गहरी रची उदासी
चित्र बनाये सुनसानो में
पलकों पर अधधुलके आंसू
का, मै रूप निहार न पायी
जन्म -जन्म की बिरहा -कुल थी
खड़ी रह गयी बिना पुकारे
दिल को छू लेने वाले भाव। बहुत अच्छी लगी रचना। शुभकामनायें।
sundar pravaahmayi rachna hetu badhai vasundhara ji!
jivn ko chitrit krti bhtrin rchnaa ke liyen mubartk ho. akhtar khan akela kota rajsthan
Naresh Bohra December 8 at 11:03am Reply • Report
इतनी गहरी रची उदासी
चित्र बनाये सुनसानो में
पलकों पर अधधुलके आंसू
का, मै रूप निहार न पायी
जन्म -जन्म की बिरहा -कुल थी
खड़ी रह गयी बिना पुकारे
--सच में आँखें नाम हो गई इन पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते. बहुत भावुक रचना. अति सुन्दर. कविता का यह हिस्सा बहुत ही सुन्दर लगा.
Nirmal Paneri
अपराधी सा मिलन समय था ...
अपना जनम सँवार न पायी ......
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुए पुकार न पायी ...........बहुत ही सुन्दर अभिव्यत्क्ति वसुंधरा जी !!!बधाइयाँ जी आप को !!!!!!!!!!
6 hours ago · Like
vaundhra tum n bahut achchhi line likhi hai ,tumhare bhawo mai naya pan hai ,shubhakamnaye .
अपराधी सा मिलन समय था ...
अपना जनम सँवार न पायी ......
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुए पुकार न पायी ..bahut khoobsoorat ...rachna ..
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुवे पुकार न पायी !
वाह वाह , आपका गीत सुगठित और प्रशंसा के लायक है.
बोझिल -बोझिल सी पलकों पर ,
ठहरा हुआ अकेलापन था
अपने को निहारते थे दृग
टुटा हुआ सपन दर्पण था
सहमी सी रह गयी तुलिका ...
मै वह चित्र उतार न पायी ..
बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ ..अच्छी प्रस्तुति ..
सुनसानो ------ सूनसानों
अधधुलके------ अध ढुलके
अंतर्लीन---- अन्तरलीन
-प्रवीन---- प्रवीण
टुटा------ टूटा
तुलिका--- तूलिका
मनोज जी ने शायद इन शब्दों की अशुद्धियों की बात कही है ...थोड़ा ध्यान से टाइप करने पर यह नहीं होंगी ....आप मेरे इस प्रयास को अन्यथा मत लीजियेगा ...
कविता निश्चय ही बहुत अच्छी है ..
आती सुन्दर !!!!!मन के भावों को दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति वसुंधरा .........
Very Nice Pandey Ji.
ठहरा हुआ अकेलापन था
अपने को निहारते थे दृग
टुटा हुआ सपन दर्पण था
सहमी सी रह गयी तुलिका ...
भावों की सुंदर तरीके से बुनहाई अपने .. लिखती रहें ऐसे ही ..
भावपूर्ण,सुन्दर शब्द चित्र, धन्यवाद.
लोकप्रिय-अतिलोकप्रिय-महालोकप्रिय व वरिष्ठ-कनिष्ट-गरिष्ठ ब्लॉगर
bahut sundar
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुवे पुकार न पायी !
जीवन भर की थकन भरी थी
फीकी -फीकी मुस्कानों में
इतनी गहरी रची उदासी
चित्र बनाये सुनसानो में
पलकों पर अधधुलके आंसू
का, मै रूप निहार न पायी
जन्म -जन्म की बिरहा -कुल थी
खड़ी रह गयी बिना पुकारे
तुम भी अपने में खोये थे ..
रुके नहीं आसू के द्वारे
अंतर्लीन चरण की गति को
अश्रु -प्रवीन पखार न पाए
बोझिल -बोझिल सी पलकों पर ,
ठहरा हुआ अकेलापन था
अपने को निहारते थे दृग
टुटा हुआ सपन दर्पण था
सहमी सी रह गयी तुलिका ...
मै वह चित्र उतार न पायी ..
बहुत पास से .......
साथ का अवसर पाने को
अमृत लिए तृप्ति चलती थी
एक दृष्टि का दान मिल सके ..
बंधे हाथ मुक्ति चलती थी ..
अपराधी सा मिलन समय था ...
अपना जनम सँवार न पायी ......
बहुत पास से निकल गए तुम
जाते हुए पुकार न पायी ...
vasundhara ji
aadaab
aap ki nazm . "kavita pad>hi ....
aksar main pata hoon ke hindi kavita me pangtiyon ka tuta pan jhalakta hai , aor pad>hte huwey har line pe rukawat si mahsoos hoti hai , bahot sari iss tarah ki kavitaein hain , magar aap ki rachna ne mujhe bahot lutf diya ,, shabdo'n ka sahih hona likhne me woh alag si baat hai , ghaltiyaan ho jati hain , jin ka sudhar buzurg log karte rahte hain , aor hona bhi chahiye , issi se tou hamari islaah yani hamein seekh milti hai ,
aap ki kavita ke bahaao ne mujhe baandh diya tab tak jab tak ke aap ki kavita antim pangti par nahi pahonchi ,, eak bahoo hai , eak ajeeb rawani hai ,, eak tasalsul hai , jo qari " yani pad>hne wale ko apne sehar yani jadoo me bandhe rakhta hai ...
jahaan tak har pangti ke wazn ka sawal hai uss me bhi aap saphal rahi hain , reedam aakhir tak waesa hi raha jaesa ke shurooaat se chala thaa ,,, yehi iss nazm ki visheshta hai ......ke pad>hne wala arth ko samajhte huwey , har eak line ka maza lete huwey aakhir tak uske tilism me khoya rahe .. meri taraf se bahot bahot mubarak baad iss kamiyaab kavita ke liye , umeed karta hoon ke aap se aor bhi bahot kuch pad>hne ko mile ga ,
dilshadnazmi
ranchi , jharkhand ....
bahot achi kavita hai , waah waah
Vasu, tum dil ko chu jati ho Shabdo ke jariye....aur durr kahin dil tumhare bhavo ke sahare bhraman kar aata hai..thik usi prakaar jaise khushboo phailte hi sabko apne aagosh me le leti hai....bahut hi sunder bhavpurn rachna tumhari,,Badhai.
Post a Comment