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Narendra Vyas
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कथा-कहानी
चतुर्थ किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी
गतांक से आगे.. (चतुर्थ किश्त)
संभव हैं कि तुम्हारा कोइ प्रेमी हो और वह तुम्हारे प्रेम को समझ न पाया हो ! शायद तुम उसे जितना चाहती थी उतना चाहने की बात तो दूर, वह तुम्हें समझ ही न पाया हो और तुम तन्हा रहकर तरसती रहती निरंतर... अथवा वह किसी पूर्व जन्म का बदला भी ले रहा हो तुम्हारे साथ, अपने भाग्य का सहारा लेकर और तुम निरंतर प्रेमगंगा बहाती रहती हो, यह भी हो सकता हैं न? संभव यह भी हैं की तुम्हारी एक नज़र से उसे जीने का, जीवन की विडंबनाओं से लड़ने की प्रेरणा मिलती हो और वह एकाग्र होकर चलने लगा हो तुम्हें भूलकर कहीं ओर..... | तुम्हें तो वो घटना भी याद नहीं रही होगी, ठीक है न? अब तो तुम भी उसे भूलने का प्रयास करती होगी | मगर तुम्हें छोड़ने वाला तो कोइ और था | मैं तो तुम्हारे प्यार में पागल था, तुम्हारे प्रति कितना सम्मान ! यही कारण था की हर पल मैं तुम्हारे लिए जी रहा था | मैं तुम्हें अपनी दृष्टी से अलग देख ही नहीं सकता था | वो था, जिसे तुमने सबकुछ दे दिया और वह तुम्हें निस्पृह भावों से अनदेखी करके चला गया |
मैं तो तुम्हें आज तुम्हारी ही कहानी सुनाता हूँ | समंदर के किनारे पर किसी रोते हुए इंसान को देखकर एक मछली ने प्यारभरी नज़रों से देखा | उस इंसान को तुम्हारी नज़रों से नई ऊर्जा मिली, ऊष्मा मिली | दूसरे दिन- समंदर में उसने जाल फैलाया | उसमें फँसी हुई मछलियों में से एक मछली ने देखा इंसान के सामने... गौर से... | अपने कंधे पर जाल को उठाकर वह ताकतवर इंसान चलने लगा | उसे मछली की नज़रों से नज़रें मिलनी ही नहीं थी | अब समझ रही हो न तुम? उसने तो अपनी ही पसंद को जाल में फँसा दी थी मगर तुम्हारे प्यार को परखने की, उसे समझने या पाने की उन्हें फुर्सत ही कहाँ थी? मैं तो दूर से यह सब देख रहा था | मेरा मन उतावला होकर कईबार कहता कि तुम्हें रोक लूं | मैंने तुम्हारे साथ जीने के लिए कैसे सपने देखें थे, वह बताऊँ | मगर अफसोस यह है की तुम बिलकुल बेख़बर थी मेरे प्यार से | मैं तो इंसानों के बीच ही रहता हूँ, कैसे रह पाता हूँ ये तुम क्या जानो? सच कहूं तो जलकमलवत ! इसीलिए तो मैं अपनी पीड़ा के साथ सृष्टि के अनेक जीवों के जीवन को भी बड़ी सूक्ष्मता से देखता हूँ | कईं बार ऐसा भी हो कि मेरी और तुम्हारी बातें करते हुए मैं ही सबकुछ कह देता, जो मेरा अहसास था | मेरा तो स्वभाव हैं, कोइ मेरी बात सुने तो अच्छा, न सुने तो मैं खुद से ही संबाद कर लेता हूँ | मेरा अकेलापन जीवन की वास्तविकता हैं या नहीं, यह तो मुझे मालूम ही नहीं | फिर भी मैं अपने सपनों की बात कहता ही रहूँगा | लोग उसे भ्रमणा भी कह दें |
शायद इसीलिए ही -
खोखली इंसानियत मुझमें से ही छटकने लगी होगी !
और सारी इंसानी बिरादरी ने इल्जाम लगाया मुझ पर
कि तुम हमसे धोखा कर गए हो
और मैं सोचता हूँ,
मेरा सुख कहाँ हैं? मेरी पहचान क्या हैं?
अभी तो परिवर्तन की लहर में भिगोया, न भिगोया
ऐसे में दुष्ट वृत्तियों ने बगावत ही कर दी, फिर विचार आया
छोटी सी मछली को पकड़कर स्वाहा कर जाऊं,
कई प्रयासों के बाद भी विफलता...
मानों शरीर साथ नहीं देता था,
दोनों का अपना प्रभाव था और मैं उसमें
इधर-उधर हिल-डुल रहा था...
अचानक एक विशालकाय मछली मेरे पीछे पडी
शायाद, वो मेरा शिकार करने को बेताब थी !
मैं बिलकुल बेख़बर,
पहली मछली ने मेरे कान में कहा; "भाग जल्दी,
वो तुम्हें खा जाएगी... तेरे अस्तित्त्व को मिटा देगी..."
"इंसान" जैसा डर मेरे शरीर में फ़ैल गया
मैं अपनी अंगभंगी के नखरें भूलकर
जलराशि को चीरता हुआ तैरने लगता हूँ
तब -
एक बड़ी सी चट्टान की खोखली जगह में से आवाज़ सुनाई देती हैं मुझे
मैं अपनी गति रोककर, जल्दी से उस दिशा में...
देखते ही पहुच जाता हूँ
जहां वह मछली थी -
जिसने मुझे किस की थी... जिसका नाम मैंने
किस मछली रखा हैं
हम दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और
मेरे पीछे शिकार करने को तेज़ी से तैरती वह विशालकाय मछली
चट्टान के साथ टकराती हैं और कईं टूकड़ों में बिखर जाती हैं...
किस मछली ने धीरे से पूछा मुझे; "अरे ! इन टूकड़ों में से इंसानी वृत्तियों की बू आ रही हैं !"
तब मैंने कहा; "मेरी आँखों में ध्यान से देखोगी तो एक दूसरा
समंदर दिखेगा तुम्हें, उसमें रहते इंसान और मेरे-तेरे जैसी
मछली की जाति में भी ख़ास कोइ फर्क नहीं
हाँ, फर्क हैं तो सिर्फ इतना कि -
उनमें मछली की रंगीनता हैं, निर्दोषता हैं और निखालस सरल वृत्ति.. !"
किस मछली ने मुझे फिर से किस करते हुए कहा; "तुम्हारी बात सही हैं, इंसान और
मछली, एक-दूसरे के पूरक हैं,
आखिर तो दोनों वृत्तियों का ही तो नाम हैं न...?
शायद -
मैं उन वृत्तियों को ही पा न सका, उसके विविध
स्वरूपों को पहचान न पाया
और तुम उसे पाने के बाद भी "मछली" होने से खुद को चंचल
साबित करके छटक गयी |
ठीक उसी समय -
किसमछली, जो पहले मिली थी,
जिसने उस विशालकाय के जबड़े में समा जाने से पहले
प्यार से भागने के लिए आदेश दिया था
वही मछली, चट्टान से निकली
मैंने उसे देखा, उसने मुझे
हम दोनों ने किस मछली को भी देखा,
वह चुपचाप आगे निकल गई... !!
(क्रमशः...)
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