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अंतिम किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी

अंतिम किश्त...


थोड़ी देर बाद जब मैंने वहां से बिदाई लेने के लिए इशारा किया तब मत्स्यकन्या मेरे सामने देखती ही रही | जैसे ही मैं पीछे मुदा कि मत्स्यकन्या जल्दी से मेरे सामने आई और मुझे गले लगा लिया | मेरे लिए यह पल अत्यंत भावासभर था फिर भी वहां रहना मेरे लिए असंभव ही था | यह मैं उसे कैसे समझाता? इंसान होने के कारण समंदर के अंदर रह पाना... सोच ही नहीं सकता, यह वास्तविकता थी | हाँ, मै इतना जरूर चाहता था कि अगर मत्स्यकन्या मेरे साथ किनारे पर आए तो उनके लिए मैं जरूर कुछ कर सकता था | मैंने उसका हाथ पकड़ लिया | हम दोनों एक साथ तैरते हुए किनारे तक पहुंचे |

कुछ लोग अभी भी समंदर के किनारे पर थे | सभी ने मुझे देखा कि तुरंत खुशी से झूम उठे | और फिर......अचानक सब चुप हो गए | सभी के आश्चर्य के बीच मत्स्यकन्या भी पानी से बाहर आती दिखने लगी | किनारे के पास आते ही मत्स्यकन्या ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया | मगर वह कैसे चल पाती? उनके तो पैर ही कहाँ? वह चलने को सक्षम ही नहीं थी | मैंने उसके हाथ को खींचा तो वह समझ गयी कि मैं उसे बाहर ले जाना चाहता हूँ | अचानक उसने देखा कि मेरे जैसे इंसान मछलियों को जाल में फँसाकर ले जाते थे | तो किनारे पर सुखाई गई मछलियों का ढ़ेर भी देखा | यह सब देखकर इंसानों पर से मानों मत्स्यकन्या का विश्वास ही उठ गया | क्यूंकि मैं भी तो आख़िर इंसान ही तो था... !! उसे ऐसा लगा कि मैं भी उसे इसी तरह लेने के लिए प्यार का बहाना बनाकर उन तक पहुंचा था... ! मछली का जन्मजात स्वभाव तो डरपोक हैं | शायद यह कारण भी था कि मत्स्यकन्या डर गई थी | उसने अपनी पूरी ताक़त के साथ मेरा हाथ छुड़वाया और पानी में गोता लगाया और फिर सर्रर्रर्रर्र... सी गहरे पानी में उतर गई |

मैं रोज समंदर के किनारे पर आकर बैठता हूँ | उसका इंतजार करता हूँ | शायद मत्स्यकन्या को कभी विचार आए कि मैं उन इंसानों में से नहीं हूँ | पूर्ण श्रद्धा के साथ मैं घंटों तक बैठा रहता हूँ | मगर अभी भी मत्स्यकन्या बाहर आई नहीं हैं |

भूख़-प्यास से बेहोश होकर मैं किनारे की रेत में गिर पडा हूँ | उठने की ताक़त ही कहाँ? समंदर की मौजें मुझे भिगोती हैं | शाम हो गई हैं | अचानक एक बड़ा सा मौजा आता हैं और पटकते ही समंदर में वापस मुड़ता हैं | तब किनारे की रेत में मेरा पूरा अस्तित्त्व *'दरिया का छोरा' बनाकर उसी में समा जाता हैं...........!!!

******
समाप्त
(*'दरिया का छोरा' का मतलब यह है कि जब कोई मछुआरे का बेटा समंदर के पानी में बह जाए या डूब जाए तो उसे गुजराती में "दरियानो छोरूं थई गयो" कहते हैं | वैसे तो सभी मछुआरे *'दरिया के बेटे-छोरूँ ही तो हैं | )

"मत्स्यकन्या और मैं" - यह लम्बी कहानी मूल रूप से गुजराती से हिन्दी में आपके सामने आई हैं | प्रस्तुत कहानी में बिलकुल नया प्रयोग होने के कारण "भास्कर ग्रुप" के दोपहर के गुजराती संस्करण में प्रकाशित हुआ था | इस कहानी को पढ़ने के बाद बहुत सारे पाठकों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं | फेसबुक, ऑरकुट, ट्वीटर और विश्वगाथा के पाठकों-दोस्तों ने मैसेज के साथ फोन पर भी बहुत सारी चर्चाएँ की हैं | सभी ने इस कथा में कल्पना और पौराणिक किंवदंती (लोककथा) के आधार के प्रयोग को भी सराहा हैं | मैं उन सभी नामी-अनामी दोस्तों का शुक्रगुजार हूँ | साथ ही जिन्होंने इस कहानी को पढ़ने के बावजूद समयाभाव की वजह से अपने विचार प्रकट नहीं कर पाए हैं, उनका भी धन्यवाद करता हूँ | इस कथा को प्रकाशित करने और सजाने में मेरे साथी "विश्वगाथा" और "आखर कलश" के सम्पादक श्री नरेन्द्र व्यास का भी आप सभी के साथ अभिवादन करता हूँ |

In:

सातवीं किश्त- मत्स्यकन्या और मैं.... - पंकज त्रिवेदी


अब तुम्हें क्या लगता हैं? हमारे ऐसे सानिध्य को हम क्या नाम देंगे? मुझे लगता हैं कि हमारा संबंध किसी नाम का मोहताज नहीं है | वो ऐसे ही बना रहें | जो संबंध नाम से हैं वह कभी कभी अपनी चमक खो देता ही हैं | हमारे संबंध ही चमक इस तरह चली जाएँ वो मुझे मंज़ूर नहीं हैं | लोग भले ही कह रहे हैं कि हम हमारे संबंध को नाम देने में विफल रहे हैं | मगर यह बात सुनने में मुझे अच्छी ही लगती हैं |

मुझे अगर तुम्हारे नाम के बारे में कोइ पूछे तो क्या कहूं? चांदनी कहूँ या मेघना? अवनी कहूं या आकाशगंगा ? मेरे लिएँ यह सभी नाम व्यर्थ हैं | तुम्हारा अस्तित्त्व मेरे मन शारीरिक अनुभूति हैं ही नहीं | मैं तो तुम्हें एक्वेरियम की मछलियों में भी पा सकता हूँ | चांदनी और मेघवर्षा में भी आत्मसात कर सकता हूँ , फिर तुम्हें खोजने की जरूरत ही कहाँ? मुझे तो तुम्हारी सागर सी आँखों में, पल-दो पल तैरने को मिले या एक्वेरियम की मछली मेरे सामने देखकर अंगभंगियों की लचक दिखाकर शरमा जाएं इससे ज्यादा क्या चाहिएं?

तुम्हें लगता होगा कि मैं तुम्हारे पीछे कितना पागल बन गया हूँ? हाँ, तुम जब से अभ्यास पूर्ण करके चली गयी हो, तब से मैंने मेरे में ही परिवर्तन का अहसास पाया है | मेरे घर में रहे एक्वेरियम की मछलियों को मैंने समंदर को सोंपकर बहा दी हैं | अब तो सिर्फ कांच का खाली पडा हुआ एक्वेरियम अब सिर्फ कांच की पेटी बनाकर टेबल पर पडा रहता हैं|

मुझे जब भी तुम्हारी याद आती हैं, तब मैं अपने अश्रुओं के दो चार बूँद उस एक्वेरियम में गिराता हूँ |

तुम्हारे बारे में मेरी कल्पनाएँ अंतहीन हैं | इसीलिए हमारे संबंधों के बारे में मेरी अभिव्यक्ति भी निरंतर बदलती रहती हैं | मगर उसमें उन मछलियों का सहवास एक पल भी नहीं रहता | तुम्हारे लिएँ मै नई कल्पना के रंगों को मिलाऊँ तो मत्स्यकन्या का स्वरूप उभरता हैं मेरे सामने ! तुम्हें मत्स्य और कन्या के उस अलौकिक रूप में देखता हूँ तब मेरे में छीपी हुई आध्यात्मिकता प्रकट हो जाती है और स्त्री-पुरुष के औपचारिक संबंध अपनेआप छू हो जाता हैं | तुम्हें शायद पता नहीं है कि मेरी इस दीवानगी के कारण मै हरपल अलग मस्ती में रहता | कौन, कब, क्या कहेंगे वह भी मैं नहीं जानता था | मानों मैं इंसानों के समाज से बिलकुल अलिप्त हो गया था | पुरुष के शरीर में मैं भी मत्स्य की तरह जीने लगा था | यही समंदर का किनारा साक्षी हैं, पूछ ले उसे ! मेरे समाज में मेरे परिवार की और खुद मेरी ही पहचान अलग थी |

पिछले कईं वर्षों से लोग हैरान-परेशान थे, मेरे व्यवहार और वाणी से ! तुम नहीं मानोगी, अब पहले की तरह मैं स्पष्ट बोल भी नहीं पाता | मेरी जुबां अटक जाती थी और पूरा शरीर धीरे धीरे सिकुडाने लगता हैं | पूरे शहर में बात फ़ैल गई थी | सभी लोग समंदर के किनारे पर उमड़ने लगे थे | अभी एक घंटे पहले ही किसी ने बात फैलाई थी | सभी लोग अचंबित थे | बच्चों और युवाओं में कुतूहल था | तो बुजुर्गों में चर्चा हो रही थी कि हमारी उम्र में कभी देखा नहीं | हाँ, पुराणों में कहीं मत्स्यकन्या का जिक्र मिलता हैं | मगर वास्तविक जीवन को उससे क्या ताल्लुक? पुराणों और धर्मग्रंथों लिखा हुआ ऐसा बहुत कुछ हैं, जिसकी अनुभूति हमारे लिएँ संभव ही नहीं | धार्मिक ग्रंथों में लिखी हुई कईं बातों से अभी लोग सहमत हो ऐसा भी हो सकता हैं! या हमारी संस्कृति की परम्परा के अनुसार हम अनादर करना सीखे ही नहीं | जो भी हो ! मगर यह बात सही हैं कि मत्स्यकन्या के बारे में सूना था मगर किसी ने देखी नहीं थी |

बुजुर्गों ने अपनी याददाश्त के धनुष की डोरी कान तक खींचकर निशान लेने का प्रयास प्रयास किया था | फिर भी कोइ निशान सही लगता नहीं था| पीढीओं से इतिहास को खोज लिया फिर भी कोइ ठोस जानकारी नहीं मिली| जो मिलता उससे संतोष नहीं था | यह सब के कारण पूरा शहर अपने काम-धंधे छोड़कर समंदर के किनारे पर आ खड़ा

था | दूर दूर तक उनकी नज़रें सागरपंछी बनकर उसने लगे थे | हमेशा दिखने वाली मछलियों को किसी ने इतनी आतुरता से नहीं देखी थी | उनके लिए तो यह सब सहज था मगर हजारों आँखों ने आज छोटी सी छोटी मछली को भी अपनी बगशक्ती का परिचय करवाया था | समग्र दृश्य ऐसा लगता था कि मानों सभी मछुआरे आज आँखों से समंदर को खंगालने के लिएँ इकठ्ठे हुए हो | सभी अपने-अपने विचार रखतें थे | कहीं पर बहस होती थी तो कहीं पर लोग शांत-स्वस्थ होकर खड़े थे | सभी की नज़रों की जिज्ञासावृत्ति की धार अब तेज़ होने लगी थी | उस वक्त ही एक घटना हुई | सभी की चिंता बढ़ गई | सब लोग हंगामा-शोर मचाने लगे | सभी की दृष्टि एक ही दिशा में स्थिर हो गई |

समंदर की दाईं ओर मोड़ पर ही समंदर किनारे से हे बहुत गहरा था | वह गहराई समंदर के मध्य भाग तक सामान ही थी | सब लोग यह बात जानते थे | ज्यादातर मछुआरे इस बात से वाकिफ़ थे | यही कारण था कि कोइ भी दाईं ओर से समंदर में जाने का साहस ही नहीं करते थे| उस खाड़ी के बारे में कहा जाता था कि प्रतिवर्ष किसी न किसी का भोग लेता ही हैं | कोइ अनजान आदमी उस तरफ़ जाने की गलती करें तो ठीक हैं मगर मेरे जैसा यानी किशन जैसा श्रेष्ठ तैराक युवक को दाई खाड़ी में नहीं जाना चाहिए था | सभी को मेरी तैराकी पर पूरा भरोसा था | वहां पर भूतकाल में कईं नाव और बड़े-बड़े जहाज समेत कईं मछुआरे समा गएं थे | इसी कारण से सभी के मन में वो बात ठूंस गई थी | लोगों की चिंता भी सही थी | सब लोग मस्यकन्या को देखने की लालच में खड़े थे | पता नहीं कहाँ, कैसे दिखेगी वह? कैसी होगी? यही प्रश्न, आतुर आँखें और बहस से समंदर का किनारा छलकने लगा था |

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छठी किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी

गतांक से आगे.. (छठी किश्त)

मैं जानता हूँ, हम मिले थे तब कुछ भी बोल नहीं पाए थे | मगर मुझे उसका दुःख नहीं हैं | तुम्हारे और मेरे बीच ऐसा भेद ही कहाँ? सब लोग ऐसा कहते थे, याद हैं तुम्हें? तुम्हारे चहेरे पर मुँहासे को देखकर कोइ कहता भी... कितना सुन्दर चहेरा है, सिर्फ ये न होता तो....?

मैं उनके कहने का अर्थ समझता | अरे छोडो यार ! वो सभी दोस्तों के मन कितने छिछोरेपन से भरे हुए थे ! उनके लिए तुम्हारा बाहरी सौंदर्य ही महत्त्व का था | मैं उनसे आगे था | हाँ, तुम्हारे लिए मेरी कल्पना, दूसरी लड़कियों के लिए कभी नहीं हुई | इसका अर्थ यह भी नहीं कि तुमसे ज्यादा सुंदर कोइ नहीं | मगर लोग जिस सुंदरता को देखते हैं, मैं ऐसे नहीं देखता तुम्हें ! यूं भी मैं दूसरों से अलग हूँ, यह अहसास खुद मुझे भी हैं | फिर भी समाधान मेरे लिए संभव नहीं हैं | सच कहूँ? मुझे तो तुमसे अच्छा अगर कोइ दिखता हैं तो वह हैं एक्वेरियम में तैरती मछलियाँ ही ! मुझे ये मछलियाँ इसलिए अच्छी लगती हैं कि उसे कुछ भी छूता ही नहीं, पानी के बीच में रहने के बावजूद भी वह कोरी की कोरी ही रहती हैं | हम दोनों भी साथ रहकर कोरे ही हैं न? लोग इस घटना को विडम्बना से देखते हैं और मैं सिर्फ प्यार से ही |

मुझे समझ नहीं आता कि हमारे बीच ऐसा कौन सा सेतू हैं, जो अंदर से हमें निरंतर हचमचाता हैं ! हमारे संबंध क्या हैं, यह भी मैं नहीं जानता | फिर संबंध का नाम भी क्या दें ? शायद वह संभव भी नहीं | भविष्य में हमारे संबंध को नाम देने का विचार आ भी जाए तो तुम क्या दोगी? मुझे तुम याद आती हो और मैं आँखें बंद करता हूँ और महासागर में तुम्हारा चहेरा प्रतिबिंबित होता है | मुझे लगता हैं कि हमारे बीच यह मछलियाँ जो सेतू बनाती हैं वह संबंधों की परिभाषा से भी अलग हैं | इस संबंध की गरिमा तक पहुँचाने में हमारे कहे जाने वाले दोस्तों की वामनता ही सिद्ध होती हैं | हालांकि कौन क्या कहेता हैं यह मैं नहीं जानता | वो लोग तुम्हारे चहेरे के मुहाँसे को देखते हैं, काले दाग़ को देखते हैं और मैं.....? मेरे मन उस बात का कोइ स्थान नहीं |

हाँ, मुझे जब भी तुम्हारी याद आती हैं, तुझे मिलने का प्रबल आवेग उछलने लगता हैं तब मैं तुम्हें देखने को दौड़ पड़ता | उस वक्त तुम्हारी आँखों में रही नमीं अपनेआप उभर आती थी और मुझे ओसबूंद की तरह भिगोती थी ! कुछ पलों के मौन के बाद मैं तुम्हें पूछता; "क्यूं रो रही हो?"

फिर तुम्हारा स्मित हमें मुहाँसे के दाग़ को भुला देता, मेरी थकान को भी भुलाता और ताक़त के साथ बरसता | फिर तो तुम्हारी आँखों में समंदर की लहरें उठती | मैं इसी पल का साक्षात्कार करने के लिए ही बार-बार पूछता | उस वक्त तुम्हारे शरीर में उठते आतंरिक आंदोलनों को समझ सकता था, जो दूसरों के लिए मुमकिन नहीं था | शायद वही कारण था की वो लोग तुम्हारे मुहाँसे और काले दाग़ की आलोचना करते थे |

चँद्रमा के चहरे पर रहे दाग़ को किसने नहीं देखा? मागत अवनी पर फैलती चांदनी को लोग कितने प्यार से झेलते हैं ! हाँ, चँद्रमा का भी एक दिन आता हैं, जब वह भी दुल्हेराजा की तरह बनठन के आता हैं | वो दिन है शरद पूर्णिमा का ! लोगों को उस दिन काला दाग़ याद नहीं आता | उस दिन तो चंद्रमा के तेज-रूप पर चांदनी आफ़रीन होते हैं |

मैं तुम्हारे चहरे की तुलना चाँदनी से करूँ या नहीं, उस बारे में तुम ज्यादा न सोचो | सच तो यह हैं कि महासागर में चाँदनी का बिम्ब जब प्रतिबिंबित होता हैं, ऐसी ही तुम्हारी आँखों को पाने के लिए कई लोग मर मिटने पर तैयार होते हैं | तुम्हें यह सत्य कब समझ में आएगा ? मुझे भी यही बात काफी लम्बे अरसे के बाद समझ में आई थी | जब तुम्हारी आँखों में मैंने गरज़ता महासागर देखा था | मेरी दृष्टि ने, मेरी इन्द्रियों को सतेज किया था तब कान में ऐसा नाद गूंजने लगा था और न जाने क्यूं मेरे बत्तीस कोठे में दीप झिलमिलाने लगे थे, तुम्हारी कसम ! यह बात अगर मैं किसी और को कहने जाऊं तो लोग मुझे पागल ही समझेंगे | एक बात कहूं? मुझे इंसानों पर ज्यादा भरोसा नहीं हैं, इसीलिए तुम्हारे बारे में मैंने उसे कभी भी कुछ नहीं कहा |

हाँ, तुम्हारी बात करने का उत्साह जब उतावला होने लगे तो मैं दौड़ पड़ता हूँ उस एक्वेरियम के पास ! जिसके रंगों में, मुझे तुम्हारी मेघधनुषी प्रतिभा और पारदर्शिता का दर्शन होता हैं | इतना कुछ पाने के बाद भी मुझे निरंतर किसी अलौकिक तत्त्व का अहसास होता रहता हैं |



तुम कौन हो? यह प्रश्न बारबार मेरे सामने आता हैं | भले ही आए ! मैं जानता हूँ कि तुम कौन हो? इसीलिए तो कभी मैंने तुम्हें यह प्रश्न पूछा ही नहीं | कुछ प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए हमारा पागलपन होता हैं | मुझे ऐसा पागल नहीं बनना | मुझे जब भी इस प्रश्न का सामना करना पड़ता हैं तब मैं तुम्हारी स्मृति में खो जाने का प्रयास करता रहता हूँ | मेरी बंद आँखों के सामने तुम्हारा मुहाँसे वाला चेहरा उभर आता हैं | और फिर मैं धीरे-धीरे तुम्हारी बंद आँखों की पलकों को प्यार से उठाने का प्रयास करूँ, न करूँ और तुम्हारी ही आँखों को मेरे आने की भनक की ख़बर तुम्हारे कानों से मिल जाती हैं | फिर मेरे लिए पूरा महासागर ही छलका देने की श्रद्धा भी पूर्ण हो जाती हैं | मेरे सभी प्रश्न उस गरज़ते महासागर के नाद में अपनेआप घुलमिल जाते हैं | और उसमें से कोइ सुरीला सुर एक दिन बहाने लगेगा | ऐसी अनुभूति की पराकाष्ठा ही मेरे और तुम्हारे अस्तित्त्व को, हमारे स्वप्न को, कुछ पलों के लिए भी झंकृत कर देगी |

(क्रमशः...)

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पांचवीं किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी

गतांक से आगे.. (पांचवीं किश्त)



कई बार तुम्हें देखकर ही मुझे ख़याल आता था कि जीवन में सभी सजीव दूसरे जीवों पर आधारित होते हैं | सबको अपनी इच्छाएं होती हैं, थोड़ा भी स्वार्थ होता हैं और उसे मीठा-सा नाम दिया जाता है प्रेम का | शार्क मछली ने जब से इंसान को निगलना शुरू किया है तब से उसकी आक्रामकता में घुलमिल गई है दगाखोरी !! इंसान भी शार्क जैसा हैं |

मगर मेरे सामने देखने की तुम्हारी इच्छा ही कहाँ? मैं बेसब्री से रटता था तुझे और आज भी कहाँ भूल पाया हूँ? शायद इसीलिए ही मेरी ज़ख़्मी संवेदना के घाव को कलम से कुरेद रहा हूँ | मैं अभी भी तुझे चाहता हूँ, यही पीड़ा मेरे जीवन का रक्त बनकर मुझे ज़िंदा रखती हैं |


मैं तुम्हारे लिए पागल बनकर दौड़ता था और तुम बिलकुल अनजान थी | मगर मैं तुम्हें जिस जिज्ञासा से देखता उसी तरह मेरा इंतज़ार करती कई अन्य मछलियाँ भी तो थी ! यह कैसा प्रेमचक्र हमारे जैसे कई प्रेमियों के लिए? जिसे चाहते हैं उसे देख सकें मगर पा नहीं सकते ! जो पा लेता हैं वह तो सिर्फ दंभ हैं, दिखावा हैं इसलिए उसमें बेचैनी नहीं रहती बल्कि छटपटाहट ही ज्यादा देखने को मिलती हैं | कैसा अजीब है यह जीवन हमारा?

तुम्हारे प्रति मेरा पागलपन देखकर फ़ोरेन रिटर्न मछली ने पूछा; "तुम अभी भी संवेदनाओं में ही जी रहे हो? कौन समझेगा तुम्हारी भावनाओं को?" तब मैंने उसके सामने देखा और तुरंत वह दूसरी दिशा में तैरने लगी, जहां मछलियों का समूह उसका इंतज़ार करता था...! मुझे पता था कि प्यार की सच्चाई में उसे ज्यादा रुचि नहीं थी | उसके लिए तो जीवन यानी आनंद.... आनंद... और सिर्फ आनंद | जो मिले उसमें आनंद पाने के कारण उसका मन कहीं स्थिरता प्राप्त नहीं कर पाता था | अगर ऐसा होता तो किसी के जीवन में दु:ख-दर्द ही न होता | इसी कारण से वह निरंतर घूमती रहती थी, भंवरे की भाँति !

आजकल तो समाज में देखते हैं तो सब जगह आधुनिकरण का अजगर सबको भींस पीस लेता हैं | एनाकोंडा जैसी मानसिकता में हमारी युवा पीढ़ी में लज्जा की बात तो दूर, बेफिक्र होकर कैसे ठेस पहुंचाते हैं ! युवक-युवतियों को समंदर के किनारे देखूं तो तुम्हारी याद आती हैं | उसमें मछली जैसी चंचलता तो बहुत होती हैं मगर संस्कार... बड़ा अंतर देखने को मिलता हैं | वास्तविकता कितनी कुरूप लगती हैं हमें ?

मैं हमेशा इन्हीं प्रश्नों की जाल में फंसता जाता हूँ और उसमें से ही प्रत्युत्तर खोजने को मथता रहता हूँ |

मुझे ये सब रास आता नहीं था | एक ओर आधुनिकता हैं तो दूसरी ओर मेरा पुरातन इतिहास है | मान, मर्यादा और संस्कार हैं | प्रेम है तो सच्चाई भी हैं | आज के युग की तरह छिछोलापन का तो काम ही नहीं | तुम ही कहो न...... आजतक तुझे कुछ भी कह पाया हूँ ? मैं तो अकेले में मेला और मेले में अकेला देखने का आदि था |

इसीलिए मेरे जीने का अंदाज़ ही निराला हैं | मैं शायद ही बोलता मगर मेरा जीवन ही बोलने लगा है अब ! उसके लिए मंझा हुआ मन भी तो चाहिए न? जो बारबार अनुभव कर सके जीवन को एक-एक पल में जी सकें ! मैं जी रहा था, चाहता था सिर्फ तुम्हारे लिएं ही !

मगर उसके लिए तो विचारशील और अनुभवी मन भी चाहिए | जो हर पल को समझ सके | वो सारी पल मेरा धबकार बन गई थी | मैं जी रहा था, बेचैनी से रटता था और चमक रहा था सिर्फ तुम्हारे लिए ही | मुझे अब वह दु:ख भी नहीं है कि तुम मुझे देख न पाई, मुझे समझ न पाई या फिर मिली भी नहीं | मेरी नियति में तुम्हारे लिए अटूट वेदना का बंधन ही लिखा होगा | हम अपनी नियति को झूठी कैसें साबित कर पाएं भला ! मुझे तो उस मछलियों ने कही थी वह व्यथा कि बात याद आती हैं ; अर्जुन ने भले ही बींध डाली मेरी आँख ! ऐसी एकाग्रता कौन दे सकता उन्हें मेरे सिवा... ?

कितना बड़ा समर्पण है उस मछली का ? मैं भले ही तुम्हारे नाम की माला का जाप करता रहा मगर उस मछली की तरह समर्पण करने की ताक़त ही कहाँ? मेरा अभी भी खुद पर भरोसा नहीं हैं | मुझे तो लगता है कि एक्वेरियम में मछली ने जब निश्वास छोड़ा होगा तब जल की सतह पर कैसे बुलबुले बने होंगे ! पल-पल तुम्हें रटने और प्रतीक्षा में अनिमेष नज़रों से समंदर को देखता रहता हूँ | मेरी आँखों की रौशनी भले ही कम हो रही हो मगर मेरी श्रद्धा में कभी भी ओट नहीं आई |

मुझे याद आती हैं एक पौराणिक कथा....

अंजनीपुत्र

पवनसुत हनुमान के

पसीने में से

गर्भवती हुई

उस मत्स्यगंधा की कथा

आज भी गाते हैं समंदर की गहराई में...

कौन जाने,

फिर कब आयेगा अंजनी का जाया

उस प्रतीक्षा में..... !!

प्रेम की सच्छाई जब पराकाष्ठा पर पहुँचती है तब ही प्रतीक्षा को साधना का दरजा मिलता हैं | कई वार प्राप्त करने की इच्छा ही हमें जीवन दे देती हैं | जब सब कुछ प्राप्त हो जाये तब जीवन नीरस बन जाता हैं | प्रतीक्षा की खुशी पाने में नहीं रहती| मुझे लगता हैं कि जो हुआ सो अच्छा हुआ | फिर भी हम एक-दूसरे के मन तक तो पहुँच गए हैं, ऐसा नहीं लगता तुम्हें? तुम्हारे पक्ष में क्या स्पष्ट हैं, यह जानने की ईच्छा मुझे नहीं है | मेरी आत्मा स्वीकार करती हैं कि मैं तुम्हारे मन तक पहुँच ही गया हूँ | तुम्हारे पारदर्शी शरीर पर उभरते स्नायुओं के ताने-बाने देखकर मैं अपने जीवन बिखरे टुकड़ों को सीने के लिए मथता रहता हूँ अविरत.....!

मछलीघर में तैरती लाल, पीली, सुनहरी, रूपहली, आसमानी जैसे रंगों की आभा रचकर मेघधनुषी मछलियाँ कितनी मनमोहक और पारदर्शक लगती है ! मुझे भी तुम्हारे आँखों में रही नमीं घेर लेती हैं | मेरी नज़रों के समक्ष विशाल समंदर लहराता हुआ दिखाई देता हैं और तुम्हारी काली पुतलियों का मनोहर नृत्य, मछली जैसे ही लगे - यह घटना मेरे मन छोटी सी तो नहीं हैं | किसी की आँखों में पूरा समंदर लहराने लगे, असंख्य नदियों के अंगभंगियाँ स्नेह से मिले और अपना सर्वस्व लुटाकर विलीन हो जाए उससे बढ़कर आत्मप्राप्ति और कौन सी हो सकती हैं...?

(क्रमशः...)

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चतुर्थ किश्त - मत्स्यकन्या और मैं.. - पंकज त्रिवेदी

गतांक से आगे.. (चतुर्थ किश्त)

संभव हैं कि तुम्हारा कोइ प्रेमी हो और वह तुम्हारे प्रेम को समझ न पाया हो ! शायद तुम उसे जितना चाहती थी उतना चाहने की बात तो दूर, वह तुम्हें समझ ही न पाया हो और तुम तन्हा रहकर तरसती रहती निरंतर... अथवा वह किसी पूर्व जन्म का बदला भी ले रहा हो तुम्हारे साथ, अपने भाग्य का सहारा लेकर और तुम निरंतर प्रेमगंगा बहाती रहती हो, यह भी हो सकता हैं न? संभव यह भी हैं की तुम्हारी एक नज़र से उसे जीने का, जीवन की विडंबनाओं से लड़ने की प्रेरणा मिलती हो और वह एकाग्र होकर चलने लगा हो तुम्हें भूलकर कहीं ओर..... | तुम्हें तो वो घटना भी याद नहीं रही होगी, ठीक है न? अब तो तुम भी उसे भूलने का प्रयास करती होगी | मगर तुम्हें छोड़ने वाला तो कोइ और था | मैं तो तुम्हारे प्यार में पागल था, तुम्हारे प्रति कितना सम्मान ! यही कारण था की हर पल मैं तुम्हारे लिए जी रहा था | मैं तुम्हें अपनी दृष्टी से अलग देख ही नहीं सकता था | वो था, जिसे तुमने सबकुछ दे दिया और वह तुम्हें निस्पृह भावों से अनदेखी करके चला गया |

मैं तो तुम्हें आज तुम्हारी ही कहानी सुनाता हूँ | समंदर के किनारे पर किसी रोते हुए इंसान को देखकर एक मछली ने प्यारभरी नज़रों से देखा | उस इंसान को तुम्हारी नज़रों से नई ऊर्जा मिली, ऊष्मा मिली | दूसरे दिन- समंदर में उसने जाल फैलाया | उसमें फँसी हुई मछलियों में से एक मछली ने देखा इंसान के सामने... गौर से... | अपने कंधे पर जाल को उठाकर वह ताकतवर इंसान चलने लगा | उसे मछली की नज़रों से नज़रें मिलनी ही नहीं थी | अब समझ रही हो न तुम? उसने तो अपनी ही पसंद को जाल में फँसा दी थी मगर तुम्हारे प्यार को परखने की, उसे समझने या पाने की उन्हें फुर्सत ही कहाँ थी? मैं तो दूर से यह सब देख रहा था | मेरा मन उतावला होकर कईबार कहता कि तुम्हें रोक लूं | मैंने तुम्हारे साथ जीने के लिए कैसे सपने देखें थे, वह बताऊँ | मगर अफसोस यह है की तुम बिलकुल बेख़बर थी मेरे प्यार से | मैं तो इंसानों के बीच ही रहता हूँ, कैसे रह पाता हूँ ये तुम क्या जानो? सच कहूं तो जलकमलवत ! इसीलिए तो मैं अपनी पीड़ा के साथ सृष्टि के अनेक जीवों के जीवन को भी बड़ी सूक्ष्मता से देखता हूँ | कईं बार ऐसा भी हो कि मेरी और तुम्हारी बातें करते हुए मैं ही सबकुछ कह देता, जो मेरा अहसास था | मेरा तो स्वभाव हैं, कोइ मेरी बात सुने तो अच्छा, न सुने तो मैं खुद से ही संबाद कर लेता हूँ | मेरा अकेलापन जीवन की वास्तविकता हैं या नहीं, यह तो मुझे मालूम ही नहीं | फिर भी मैं अपने सपनों की बात कहता ही रहूँगा | लोग उसे भ्रमणा भी कह दें |

शायद इसीलिए ही -

खोखली इंसानियत मुझमें से ही छटकने लगी होगी !

और सारी इंसानी बिरादरी ने इल्जाम लगाया मुझ पर

कि तुम हमसे धोखा कर गए हो

और मैं सोचता हूँ,

मेरा सुख कहाँ हैं? मेरी पहचान क्या हैं?

अभी तो परिवर्तन की लहर में भिगोया, न भिगोया

ऐसे में दुष्ट वृत्तियों ने बगावत ही कर दी, फिर विचार आया

छोटी सी मछली को पकड़कर स्वाहा कर जाऊं,

कई प्रयासों के बाद भी विफलता...

मानों शरीर साथ नहीं देता था,

दोनों का अपना प्रभाव था और मैं उसमें

इधर-उधर हिल-डुल रहा था...

अचानक एक विशालकाय मछली मेरे पीछे पडी

शायाद, वो मेरा शिकार करने को बेताब थी !

मैं बिलकुल बेख़बर,

पहली मछली ने मेरे कान में कहा; "भाग जल्दी,

वो तुम्हें खा जाएगी... तेरे अस्तित्त्व को मिटा देगी..."

"इंसान" जैसा डर मेरे शरीर में फ़ैल गया

मैं अपनी अंगभंगी के नखरें भूलकर

जलराशि को चीरता हुआ तैरने लगता हूँ

तब -

एक बड़ी सी चट्टान की खोखली जगह में से आवाज़ सुनाई देती हैं मुझे

मैं अपनी गति रोककर, जल्दी से उस दिशा में...

देखते ही पहुच जाता हूँ

जहां वह मछली थी -

जिसने मुझे किस की थी... जिसका नाम मैंने

किस मछली रखा हैं

हम दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और

मेरे पीछे शिकार करने को तेज़ी से तैरती वह विशालकाय मछली

चट्टान के साथ टकराती हैं और कईं टूकड़ों में बिखर जाती हैं...

किस मछली ने धीरे से पूछा मुझे; "अरे ! इन टूकड़ों में से इंसानी वृत्तियों की बू आ रही हैं !"

तब मैंने कहा; "मेरी आँखों में ध्यान से देखोगी तो एक दूसरा

समंदर दिखेगा तुम्हें, उसमें रहते इंसान और मेरे-तेरे जैसी

मछली की जाति में भी ख़ास कोइ फर्क नहीं

हाँ, फर्क हैं तो सिर्फ इतना कि -

उनमें मछली की रंगीनता हैं, निर्दोषता हैं और निखालस सरल वृत्ति.. !"

किस मछली ने मुझे फिर से किस करते हुए कहा; "तुम्हारी बात सही हैं, इंसान और

मछली, एक-दूसरे के पूरक हैं,

आखिर तो दोनों वृत्तियों का ही तो नाम हैं न...?

शायद -

मैं उन वृत्तियों को ही पा न सका, उसके विविध

स्वरूपों को पहचान न पाया

और तुम उसे पाने के बाद भी "मछली" होने से खुद को चंचल

साबित करके छटक गयी |

ठीक उसी समय -

किसमछली, जो पहले मिली थी,

जिसने उस विशालकाय के जबड़े में समा जाने से पहले

प्यार से भागने के लिए आदेश दिया था

वही मछली, चट्टान से निकली

मैंने उसे देखा, उसने मुझे

हम दोनों ने किस मछली को भी देखा,

वह चुपचाप आगे निकल गई... !!


(क्रमशः...)