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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
हर हार मुझे और हराती है... जेन्नी शबनम
आज मैं खाली खाली सी हूँ
अपने अतीत को टटोल रही,
तमाम चेष्टा के बाद भी
सब बिखरने से रोक न पायी !
नहीं मालूम जीने का हुनर
क्यों न आया ?
अपने सपनों को पालना
क्यों न आया ?
जानती हूँ मेरी विफलता का आरोप
मुझपर हीं है,
मेरी हार का
दंश मुझे हीं झेलना है !
पर मेरे सपनों की परिणति
पीड़ा तो देती है न,
हर हार मुझे
और हराती है !
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13 Comments
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13 comments:
मेरे सपनों की परिणति
पीड़ा तो देती है न,
हर हार मुझे
और हराती है !
अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई
अपने सपनों को पालना क्यों ना आया..... बहुत सुन्दर सोच... अक्सर हम सपनों को हकीकत समझ लेते हैं और सपने सपने ही रह जाते हैं . सपनों को अगर हम हकीकत में बदलना सील्ख लें या फिर आपकी भाषा में पालना सीख लें तो जीवन सफल हो जाता है . अत्यंत सुन्दर रचना . बहुत बधाई .
!!तमाम चेष्टा के बाद भी
सब बिखरने से रोक न पायी !........पंकज जी ...बहुत सुन्दर भाव है ...खुद को टटोलने के ...यह ही जीवन जीने की कला है .....और ये है बुलंदियों की नीव भी ...बहुत शुब कामनाएं .. जेन्नी जी को ....और आप को धन्यवाद ...अच्छी कविता का परिचय कराने का !!!!!!!!!!!!!!!!1
बहुत सुन्दर रचना शबनम जी ...बधाई
अक्सर हम अपने अतीत को बटोरते हैं जब हाथ से छुट चुके होते हैं वो लम्हें..!
और तब हमारे पास स्मृतियों केअलावा कुछ नहीं रहता...!!
har haar jine ka manobal deti hai, tabhi shabdon ki yaatra hoti hai ...
यही तो पीडा है।
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (13/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
हर हार मुझे
और हराती है !//
मुझे तो लगता है /
मन के हरे हार है /
मन के जीते जीत /
Bahut sunder
@ pankaj bhai,
tahedil se shukriya meri rachna ko yahan shaamil karne keliye.
@ vandana ji,
charcha manch par shaamil karne ke liye dil se aabhar.
@ sabhi mitro ka mann se aabhar, meri rachna ko waqt aur sneh dene keliye.
sundar abhivyakti!!!
बहुत ही खुबसुरत रचना.......मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना"at http://satyamshivam95.blogspot.com/ साथ ही मेरी कविताएँ हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" पर प्रकाशित....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे....धन्यवाद।
मेरी हार का
दंश मुझे हीं झेलना है !
पर मेरे सपनों की परिणति
पीड़ा तो देती है न,
हर हार मुझे
और हराती है !
It presents real philosophy of human life. Thanks for a real feelings ....
हां एक बात जरूर कहना चाहूंगा आज इस पर, कुछ नया हा एहसास हुया मुझे.....इस 'हार' को गले का 'हार' बना लीजिये, प्यार में हारना ही जीत है. प्यार में तो जीती हुयी बाजी भी जानबूझकर हार जानी चाहिए. प्रयोग कर के तो देखें. आप भी यही कहेंगी, आपका अनुभव, पल -पल का एहसास, मिटती हुयी दूरियां..., नित बढ़ती हुयी नजदीकियां .. खुद स्वीकार करेगी इसको, ...जनता हूँ मै....आशा है सलाह को अन्यथा नहीं लेंगी..
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