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Pankaj Trivedi
In:
अतिथि-कविता
लम्हें - सरोज सिंह
"खुशगवार लम्हें ....,
'बारस्ता' गुज़रता समय,
रेत पर क़दमों के निशां
ढूंढ़ती ऑंखें और....
तुमसे बिछड़ने का डर
...तुम्हारी 'कविता'.....
तुम्हारे 'शब्द' ....
फिर मुझे घेर लेते हैं ,
तुम्हारी आँखों में ,
अपनी तस्वीर.......,
देखने का मोह,
क्यूं छोड़ नहीं पाती ?
तुम्हारे ना होने पर भी,
'रहगुज़र' में ,तुम्हारा अहसास ,
मेरा 'हमसफ़र' है शायद"
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10 Comments
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10 comments:
Bhavnao ki sunder saral adayegi Saroj...!Liked it...! :)
तुम्हारे ना होने पर भी,
'रहगुज़र' में ,तुम्हारा अहसास ,
मेरा 'हमसफ़र' है शायद"
हृ्दयस्पर्शी ,भावमय रचना। धन्यवाद।
बहुत ही गहन भाव ...अनुपम प्रस्तुति ।
तुम्हारी आँखों में ,
अपनी तस्वीर.......,
देखने का मोह,
क्यूं छोड़ नहीं पाती ?
तुम्हारी आँखों में ,
अपनी तस्वीर.......,
देखने का मोह,
क्यूं छोड़ नहीं पाती ?
इन पंक्तियों ने दिल मोह लिया।
मन के भावों को खूबसूरती से लिखा है ..
तुम्हारी आँखों में ,
अपनी तस्वीर.......,
देखने का मोह,
क्यूं छोड़ नहीं पाती
बहुत सुन्दर गहन प्रेम की भावपूर्ण अभिव्यक्ति..
सुन्दर और बहुत ही सुन्दर विचार . तारीफ के काबिल भी
मित्रों एवं श्रधेयजनो ,
मेरी इस छोटी सी कोशिश को पसंद करने के लिए दिल से शुक्रिया ......
तुम्हारी आँखों में ,
अपनी तस्वीर.......,
देखने का मोह,
क्यूं छोड़ नहीं पाती ?
uffffffffffff
gazab ki ye panktiyan hai di..!!
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