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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
कोहरे की चादर - गिरीश जोशी
कोहरे की चादर ओढ़े रात चुपके से खड़ी थी
चाँद भी थोडा था फ़ीका, जाड़े की रात कड़ी थी
ठिठुर गया था वक्त, निस्तब्ध पेड़ समान सा
बिखरते रहे पल धीरे धीरे, मंद सप्तक गान सा
थर्राई सी रात जाड़े की, झोंपड़ी में पड़ी थी
कोहरे की चादर ओढ़े रात चुपके से खड़ी थी
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3 Comments
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3 comments:
Veena Jain December 20 at 6:48am Reply • Report
`शब्द तथा चित्र का सुन्दर समन्वय........
Manjul Bhatnagar December 21 at 10:32am Report
Beautiful personification of winter night!!
शब्द वातावरण को सचित्र प्रस्तुत करते हुए से!
सुन्दर!
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