रंग और समुद्र
मानव के जीवन में कईं रंग हो ते हैं | सभी रंगों की अनोखी दास्ताँ होती है, सभी का सुख और दुःख अलग होता है | रंग मानव के जीवन को बसंत-बहार की ताजगी देते हैं और रंग ही मानव को विडंबनाओं की गहरी घाटी में घकेलाते हैं | रंगों के मिजाज के साथ बदलता मानव हमेशा अकल्पनीय रहा है | धारणाओं की मर्यादा में जो बंध जाए वह मानव कहाँ ! मानव का प्तात्येक पल उसके व्यक्तित्त्व के अनोखे रूप-रंग में कोइ नया ही स्वरूप धारण करता है | मानव को इस अकल्पनीय लीला का वर देकर ईश्वर क्या साबित करना चाहता होगा? सुख क्या है? सच में सुख है क्या? जिस पल में दुःख नहीं वह सुख है | हम लगातार उस पल को बेसब्री से रटते रहते हैं और दुःख हमसे चिपका रहता है | हमारे जीवन का प्रत्येक रंग हमारे अस्तित्त्व की पड़ताल करता है, तब किसी पल पसंदीदा रंग हमें मीठा दर्द देता है | दर्द हमेशा अप्रिय नहीं होता | मानव उसी दर्द के खुमार में सारा जीवन बिता देता है और वही उसके जीवन की संजीवनी बन जाता है |
मैंने तुम्हें
कुछ चटकीले रंग दी थे
चुनने को कहा था,
उनमें से कोइ एक रंग
जो फबता जो,
तुम्हारे तोप सौन्दर्य पर |
तुम थी, कि
रंगों में उलझ बैठी
मन बालकों की हाथ-सा
मचल उठा अभी रंगों पर
लेकिन, चयन तो करना था |
किसी एक रंग का |
तुम सारी उम्र रंगों से लिपटी रही
और मामाना खेलती रही |
मैं मोमबत्ती-सा जलता हुआ
हर बार अँधेरे को पीछे धकेलता रहा |
करता रहा इंतजार,
तुम्हारे जवाब का,
कि शायद तुम्हें,
कभी कोइ रंग पसंद आए
जिसे हर स्त्री
अपने जीवन में पसंद करती है |
समय के साथ मानव की अपेक्षाए भी विस्तृत होती रहती है | जीवन की स्वायत्तता बंधनों को उखाड़कर आगे निकल जाए, तब मनोभाव लहूलुहान हो जाते हैं | अपेक्षा और प्रेम के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है | हम इन दोनों को जोड़ने का प्रयत्न करने लगे तब प्रश्नों की हारमाला का सृजन होता है | अपने साथी को मुक्त रखने की हमारी उदारता मानवीय है | मगर वह उदारता तो प्रेम का प्रतीक होती है | जब अपेक्षाओं का आवरण मन के आगे आकर खड़ा हो जाए, तब वह दर्द बन जाता है | अपने रंगों को बीनकर जीने का अधिकार तो सब को है | फिर भी प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शोभा के अनुसार रंग को पसंद करना चाहिए | रंग का चयन जीवन की शिस्त का एक हिस्सा है | मगर मानव जब चयन करने में भटक जाए तब उसका मार्ग बदल जाता है | मन हठ लेकर बैठ जाता है | सार-असार का भेद उसकी समझ में नहीं आता और जीवन के प्रत्येक पल को वह खिलौना समझकर खेलता रहता है | उस वक्त उसकी समझ में नहीं आता कि खुद के साथ कईं लोग मेघधनुषी रंगों के वास्तविक सौंदर्य को लेकर उसे सुन्दर बनाने के लिए खड़े हैं | उनका भी अलग दर्द है, जो भीतर से धीरे-धीरे जलता है | वह धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता है, अँधेरे को धकेलता है | कभी तो समझदारी का सूरज खिलेगा और मेरी इच्छाओं की मोमबत्ती अखंड रहेगी | इस आशा में जीने का दर्द जितना कष्टदायक है उतना ही मीठा होता है | खुद जिस रंग को चाहता है, उसी रंग के प्रति का समर्पण ही कभी-कभी मानव को जीवन देता है | वही दुःख आखिर सुख में परिवर्तित हो जाता है |
दूसरी ओर जीवन का एक अनूठा रंग है, जो खुद के द्वारा ही उभरकर आया है | निजरंग का अस्तित्त्व कोइ आकर लेकर सामने खड़ा हो तब उसके अनुभव में वात्सल्य और एश्वर्य का संगम होता है | मानव को इस अनोखे रंग का सुख जितना प्यारा है, उतना ही उसमें दर्द होता है और उतना ही सुख
नदियों की धारा समुद्र में मिल जाती है, यह प्रकृति का सनातन नियम है | नदियों के मिलन के बाद ही समुद्र को यौवन प्राप्त होता है | फिर उसमें खुशी के विविध रंगों की रचना होती है | उन रंगों में आकाश का प्रतिबिंब और सूर्य की किरणों का तेज अनोखा वैभव रचते हैं | समुद्र की यही खुशी और वैभव अचानक ही कोइ छीन ले तो? समुद्र के रंगों का यह सुख किसी की ईर्ष्या का कारण बन जाए या समुद्र को किसी की नजर लगे, उसके इस दर्द को कौन अनुभव कर पाएगा ? हम तो किसी और के सुख को देखने के आदि है | किसी का दुःख जल्दी से नज़रों में नहीं आता | यह मानव मन का स्वभाव है | स्त्री नदी है तो पुरुष समुद्र | नदी चंचल है और समुद्र धीर-गंभीर | नदी बह सकती है, समुद्र अडिग रह सकता है अथवा उसे रहना पड़ता है, यही नियति है | श्री आँसूं बहाकर सहजता से स्वस्थता प्राप्त कर पाती है, पुरुष के लिए यह संभव नहीं है | स्त्री का ह्रदय सीमित है, इस कारण उसकी भावनाएँ बहती हैं, जब कि पुरुष का ह्रदय तो समुद्र जैसा है | उसका बहना तो ईश्वर को भी मंजूर नहीं | नदी माता है तो समुद्र पिता है | पिता के रूप में अपनी जिम्मेदारी में अडिग रहता समुद्र नदियों का दुःख कैसे सह पाए ? फिर भी वह आँसूं नहीं बहा सकता | पति से विमुख हुई स्त्री, नदी बनकर बहाने लगती है | तब एक पिता अपनी बेटी को समझाता है | बीमार बेटी समुद्र को देखने की जिद्द करती है | उसे भला कौन समझाए कि समुद्र जैसे ह्रदय के पिता की आँखों में देख सके इतनी परिपक्व नहीं हो पाई है अब तक ! तब पिता के दर्द शब्दों के आँसू बहाते हैं --
बीमार बेटी,
जिद्द करती है
समुद्र देखने की
मैंने कहा-
पहले ठीक हो जाओ
उसके बाद |
लेकिन नहीं,
मैंने कुछ किताबें दिखाई,
दवाई की शीशी तोड़ दी
फिल्म देखाना चाह तो
बोलना छोड़ दिया |
हार कर मैंने कहा,
बेटी झाँक मेरी आँखों में
देख,
हर किसी की आँख में
एक नदी बहती है |
सीने में
समुद्र लहराता है |
बस फर्क सिर्फ इतना है,
कोइ देख लेता है,
कोइ देख नहीं पाता |
(* इस आलेख में पंजाबी-हिन्दी कविश्री जसवीर त्यागी की दो कवितायेँ)
This entry was posted on 7:48 PM and is filed under निबंध . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
6 comments:
यह तो बहुत सुन्दर कविताएं है.
पाखी की दुनिया में भी आपका स्वागत है.
ओह! कितना गहन विश्लेषण मै तो इसमे खो ही गयी।
sundar vishleshan!!!
sundar kavitayein!
स्त्री नदी, व् पुरष समुद्र I अति सुन्दर मेल-मिलाप I रूप का विश्लेष्ण व् उपमा दोनों ही अति सुन्दर I काश ऐसा समर्पण (सरिता)व् आगोश (समुद्र) हर भाग्यवान पति-पत्नी को प्राप्त होI जीवन भी सरिता की लहरों में आन्दादित होता अन्तोगत्वा समुद्र की गहराई व् शांत मुद्रा का सुख उठाता रहे I पर यह मानवी दुनिया इस प्राक्रतिक आनद से परे है I यह भावनात्मक आनदं जो इस लेख ने दिया है उसके झूले में झूलते हुए आप सभी को कोटि कोटि धन्यवाद व् शुभ कामनाएं I
Surya Mohan Dubey December 13 at 7:42pm Reply • Report
स्त्री नदी, व् पुरष समुद्र I अति सुन्दर मेल-मिलाप I रूप का विश्लेष्ण व् उपमा दोनों ही अति सुन्दर I काश ऐसा समर्पण (सरिता)व् आगोश (समुद्र) हर भाग्यवान पति-पत्नी को प्राप्त होI जीवन भी सरिता की लहरों में आन्दादित होता अन्तोगत्वा समुद्र की गहराई व् शांत मुद्रा का सुख उठाता रहे I पर यह मानवी दुनिया इस प्राक्रतिक आनद से परे है I यह भावनात्मक आनदं जो इस लेख ने दिया है उसके झूले में झूलते हुए आप सभी को कोटि कोटि धन्यवाद व् शुभ कामनाएं I
Sanjay Mishra Habib December 13 at 8:52pm Reply • Report
पंकज भईया, सादर नमस्कार,
अद्भुत लेख है यह. पढ़ते पढ़ते अनेक बार अनायास 'वाह' निकल गया दिल से... "सुख क्या है? जिस पल में दुःख नहीं, वह सुख है..." , "दर्द हमेशा प्रिय नहीं होता..." कितनी अच्छे बातें...
नदी और समुद्र का जीवन और रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में सांकेतिक विश्लेषण वाकई अनूठा है.... और इस लेख में जसबीर त्यागी जी की अंतर तक उतरती कविताओं की उपस्थिति लेख को अलग ही ऊँचाई प्रदान कर रही है.... एकदम बाँध लेती है....
लेख से रूबरू कराने के लिए बहुत शुक्रिया... आभार और बधाई.
आपका छोटा भाई,
हबीब.
Post a Comment