आहट : जया केतकी
क्यों उसकी सिसकियों की आहट
कान के दरवाजे से ही लौट जाती है।
कहना चाहती है वो जो कह न सकी
सुनाए भी तो सुनी नहीं जाती है।
बन गई है वह एक भूली सी दास्तां
जो रह.रह कर उभर आती है।
पास ही उसका बसेरा है सबके
फिर भी नजर क्यों नहीं आती है।
बदल रही है करवटें किस्मत
रोशनी दूर होती जाती है।
आस है इक निगाहे हसरत की
हौसला जो उम्मीदों को देती है।
शिकायतों का दौर चलते ही जाता
बिना दाम खुलेआम बिक जाती है।
दबा के सिसकियों को रोज खाट के नीचे
सरेआम हाथ उनके लुटती है।
कैद रह जाती अगर आह निकलती दिल से
वहीं पे जिस्म लिए साँस आके रूकती है।
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4 comments:
कहना चाहती है वो जो कह न सकी
सुनाए भी तो सुनी नहीं जाती है।
औरत की व्यथा, मार्मिक अभिव्यक्ति ।धन्यवाद।
नारी कि व्यथा को सटीक शब्द दिए हैं ...
पंकज जी ....जाया जी se पहले भी आप के इस बोल्ग में परिचय हुआ था ...यहाँ पर एक अनकहे दर्द को जाया जी ने शब्दों में पेश किया है ...तो तारीफे काबिल है ...अच्छा पिरोय है इस जीवन को ...सिसकियों के साथ उस खाट के नीचे ..और और सांस लेना भी कही किसी को बतादेने के बार बर ही लगा इस कविता में तो ....सुन्दर अभिव्यक्ति जी !!!!!!!!!!!!!
नारी व्यथा का जीवन्त चित्रण कर दिया।
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