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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
सरोज सिंह की कविता
"तेज़ बारिशों में....
सब परिंदे,ढूंढ़ते हैं
पनाह! छिपने की
इक परिंदा 'चील' है
जो नहीं करता परवाह
भीगने की..और उड़ता है
बेफिक्री से 'बादलों के पार'
..
"उसी तरह मुश्किलें,
सभी की एक जैसी
कुछ उससे 'हार' जाते हैं
कुछ उसके 'पार' जाते हैं
जो उसके 'पार' जाते हैं
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4 Comments
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4 comments:
bahut sundar ..bhavmayi rachna hai didi badhayi ho aapko ..!!
very positive....! :)
वाह! सकारात्मक सोच को दर्शाती एक बहुत ही उम्दा रचना।
आभार मित्रों!
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