Showing posts with label चार लाइन. Show all posts
Showing posts with label चार लाइन. Show all posts
Posted by
pankaj trivedi
In:
चार लाइन
ज़ख्म - पंकज त्रिवेदी
कौन कहता हैं तुम नहीं हो यहाँ पर
यही ज़ख्म खड़े हैं झुककर यहाँ पर !
यह ज़ख्म भी बड़े शरारती हैं मेरे यार !
तुम्हारे न होने के बिच रुलाता है हमें !
यही ज़ख्म खड़े हैं झुककर यहाँ पर !
यह ज़ख्म भी बड़े शरारती हैं मेरे यार !
तुम्हारे न होने के बिच रुलाता है हमें !
Posted on
-
1 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
दीदार - पंकज त्रिवेदी
दीदार हो जाये तो भी क्या कम है दोस्त !
हर लम्हा अधूरा सा लगता है तुम्हारे बीना
तसवीर में देखने से क्या दीदार हो गया?
कैसे कटेगी यह ज़िंदगी भी तुम्हारे बीना?
Posted on
-
0 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
अहसास
प्यार की ही पूजा करता रहता हूँ मैं,
कुछ सपने हैं, कुछ किताबें और यादें हैं
ये सुबह है, पारिजातक है और मेरा झुला,
तुम नहीं हो यहाँ , फिर भी क्यूं अहसास हैं ?
Posted on
-
6 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
तड़पन
ये तड़पन ख़त्म कैसे भी नहीं होती भला
तुम हो कि बीजली सी चमक जाती हो
कैसे पिरोऊँ मैं प्यार के इस मोती को भला,
पल आधी पल में ही तुम यूं चली जाती हो
Posted on
-
3 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
सुर
मंज़िल पता नहीं, तो तेरे दर पे आया
तुम ही हो वह जिसको समझने नहीं आया
हमतक एक आवाज़ निकली तेरे दिल से
सुर तो मिल गए यूहीं, क्या पता कैसे आया
Posted on
-
2 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
बेटी और माँ
ये आँखें क्यूँ भर आती है अभी से,
तुम बेटी हो ईतना ही काफ़ी नहीं |
तुम बेटी हो ईतना ही काफ़ी नहीं |
वो तो कब की छोड़कर चली गई है,
Posted on
-
3 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
मैं डूबता रहा
क्या पता था कि तुम वो चांदनी हो?
मैंने तो तुम्हें सिर्फ जाते हुए देखा था
तुम भी तरसती रही लोगों की तरह
और मैं डूबता रहा हूँ सूरज बनकर
Posted on
-
2 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
बस आपके लिए - पंकज त्रिवेदी
अपनी हसरतों को दबाकर जीते हैं
ईस गम को छुपाकर जीते हैं
क्या लूंटेगा ज़माना खुशियाँ मेरी
हम तो बस आपके लिए जीते हैं !
क्या लूंटेगा ज़माना खुशियाँ मेरी
हम तो बस आपके लिए जीते हैं !
Posted on
-
0 Comments
Posted by
Pankaj Trivedi
In:
चार लाइन
चार लाइन - पंकज त्रिवेदी
तुम्हारा यूंही रूठना हमें रास आता नहीं
हम वो नहीं जो मनाते रहें प्यार के लिए
हम वो सावन है जिसे कोइ रोक नहीं सकता,
तुम देखो तो सही, हम कितने बरसते हैं?
Posted on
-
7 Comments
Subscribe to:
Posts (Atom)








