स्वामी आनंद प्रसाद 'मानस'

धूल का कण.....
धूल का कण सरक कर परों के तले,
उसका धीरता से यूं सिमटना, सुकड़ना और नाचना।
खिल-खिल कर करना उसका यूं अट्टहास,
क्यों नहीं आता उसको अहं से उठना।
क्या नहीं जानता क्या वह अपनी ताकत?
अपने बल के प्रदर्शन को अभी।
पर शायद नहीं चाहता वो ये सब
वो कैसा खिलखिलाता सा दिखता है
वो हवा के नाजुक पंखों पर बैठ कर,
बना देता है रेत के ऊंचे -ऊंचे पहाड़।
गर्म तपती हुई धूप में,
रात की सीतलता का करता है इंतजार।।
डूबते सूरज की सपाट,
सिमटती और सरकती धूप में,
वो सोने सा गर्वित दिखता है।
बसन्त की सुकोमल शान्ति में वो,
सीने पर कांटे उगा कर हंसता है।।
अषाढ़, के मेघों की गरजना में,
गुन-गुनाता है वो मेध मल्हार
रिम-झिम टपकता बूँदों में भी।।
कैसी नन्हें बच्चे की तरह ,
सुबकियां भर-भर कर नहाता है
इतरता और इठलाता सा
और कभी डरा सहमा सा दिखता है।।
हाएं ! देखो इस मनुष्य को
न जाने क्या हो गया है,
कहां खो गई है इसकी हंसी।।
कहां छिन गया है
तेरी आंखों का उल्लास,
कहां छुट गया तेरा उन्माद।।
और बिखर गई तेरी हस्ति
नहीं दिखती तेरे कदमों
में कभी मदहोशी
तेरे जीवन में कोई उत्सव
और तू कर रहा है अपने ही
विनाश का अह्वान
खुद आपने ही हाथों से
देख ले फिर से अपने कदम को एक बार,
क्या वो तुझे चला रहे है।
या तू घिसट रहा उनके पीछे....।।
ठहर जा, ठिठक जा और देख ले।
एक पल में सब बदल जाएगा।
बस तुझे रूकना भर है,
परन्तु तू शायद रूकना भूल गया है,
बस एक कदम अब नहीं आगे रखना,
इसके बाद तो पूर्ण इति है।
नहीं देख सकेगा तू पीछे चाह कर भी कुछ,
क्या समय देखेगा है पीछे मुड़कर कभी?
एक काली छाया निगल चूकि होगी इस धरा को,
इन सुरम्य गर्वित जीवन को,
केबल बचा होगा अन्धकार,
एक काल के गर्व में
केवल अन्धकार, एक प्रलय,
विभीषिका समेटे अपने आँचल में.......।।
(2)
एक जीवित मधुशाला-
प्रियतम तेरे सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है।
होश बढ़ता इक-इक प्याला, ऐसी हाला देखी है।।
मदिरालय जाने बालों नें,
भ्रम न जाने क्यों पाला?
हम तो पहुंच गए मंजिल पे,
पीछे रह गई मधुशाला।।
शब्दों कि मधु, शब्दों की हाला,
शब्दों की बनी मधुशाला।
आँख खोल कर देख सामने,
बरस रही अब वो हाला।।
धर्म-ग्रंथ भी नहीं जले जब,
कहां जली चित की ज्वाला।
मन्दिर, मस्जिद, गिरिजो मे भी,
कहां छलक़ती अब हाला।।
चख कर मधु को बुरा कहे वो,
समझे खुद को मतवाला।
आंखें बोले, तन भी ड़ोले,
पर मुंह पे पडा रहे ताला।।
होली आए या आये दीवाली,
भेद है क्या पड़ने बाला।
अंहकार को देख लांघ जा,
फिर भभकेगी वो ज्वाला।।
प्रियतम पिला रही है हाला,
फिर भी क्यों खाली प्याला।
प्यास बूझ गी जबी सुरा से,
बनेगा तु खुद मधुशाला।।
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7 comments:
परम पूजनीय स्वामीश्री 'मानस' की दोनों ही कवियातें बहुत उच्च स्तरीय हैं . पढवाने के लिए आभार .
Vinay Rai Sundar
Kavitayen, bas eh chhota sa anurodh hai, yadi aap bura na mane to, kripaya spelling mistakes na hone dijiye, kai jagahon par hai. halanki aap vidwan aur samajhdar hain, aapki galati nikalana SURAJ KO DIYA DUKANA hai.
श्रीमान विनयजी,
आपका सूचन आवकार्य हैं, उसके लिए विशेष आभारी हूँ | आपकी बात पर जरूर ध्यान दूंगा | फॉण्ट बदलने में और समय की कमीं के कारण यह गलती रह गयी हैं | क्षमा प्रार्थी हूँ |
Seronika Seema Vyas
madhushaala bahut achchhi likhi hai.
नमन कोटि नमन पूजनीय स्वामीश्री 'मानस' जी का आपकी दोनों कवितायें अंतर्मन को स्पर्स करती उच्च कोटि की रचनाएं हैं...अहंकार से ग्रसित तथाकथित प्रगति से अपने विनाश की डाल पर बैठे प्राणी को चेतावनी /सन्देश देती उत्तम रचना...... साक्षात्कार कराने के लिए पंकज त्रिवेदी जी का भी हार्दिक अभिनन्दन....
Nand Kishore Sharma
February 1 at 10:53am Report
SHANDAR PATRIKA....BAHU BAHUT SHUBHKAMANAYEN....
Nirmal Paneri
January 31 at 10:35pm Reply • Report
वाह गज़ब की पक्तियां लिखी है कही स्वामीजी ने रेत के कण को कही रेगिस्थान की हरकतों से इन्सान को परिभाषित करता ..उसकी दशा का सही शब्दों में पटापेक्स्य किया है कही...दूसरी सुन्दर मदुशारा का रूप भी बहुत खुद लिखा है कही !!!!!!!!!!!सुन्दर जी धन्यवाद शेयर करने का पंकज जी !!!!!!!!!!!!1 .
Niranjana K Thakur
February 1 at 12:10pm Reply • Report
wah bahut achhi kavitayan likhi hain !!
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