दानी मितव्ययी : द्वारा डॉ नूतन डिमरी गैरोला
सेठ मूलचंद का अपने इलाके में में बहुत नाम था| वह बहुत ही रईस थे | कई गाँव के जमींदार| और बहुत धर्मात्मा दानी |उन्होंने कई अस्पताल बनवाये, पानी के लिए कुंवे बनवाये, अस्पताल बनवाये , मंदिर बनवाये, वस्त्र और भोजन वितरण करते- साधुसंतो और दीन दुखियों के लिए|
एक बार मिशन वाले अपने स्कूल के लिए चंदा लेने सेठ जी के पास गए | क्यूंकि निर्माण कार्य अभी शुरू हुवा ना था तो उन्हें बहुत बड़ी धनराशी की आवश्यकता थी| काफी सहमे से थे| बड़ी हिम्मत कर वो सेठ जी के पास पहुंचे| शाम का धुंधलका था| सेठ जी अपने मुनीम के साथ बैठे दिनभर का हिसाब किताब लेखा जोखा मिला रहे थे| कमरे में अँधेरा था अतः सेठ जी ने एक मोमबत्ती कमरे की मेज में जला रखी थी| और जहां वह हिसाब किताब देख रहे थे वहाँ दो मोमबत्ती जलीं थी| सेठ जी ने सम्मान के साथ आगंतुको को बैठाया और अपने कार्य में फिर तल्लीन हो गए|
सेठ जी का कार्य निबटा तो सेठ जी ने अपने कागज लेखनी संभाली फिर उन्होंने मोमबत्तीया बुझा दी| अब कमरे मे सिर्फ एक मोमबत्ती जली थी और मधिम रौशनी थी| उन्होंने आगंतुको से मुखातिब हो कर पूछा की, क्या कार्य है, जिसकी वजह से उनेह, उनके पास आना पड़ा| आये हुवे लोगों से कुछ कहते ना बना| उन्हें लगा कि इस व्यक्ति से क्या उम्मींद करे जो इतना कंजूस है | सेठ जी ने दुबारा पूछा तो उन्होंने हताशा भरे शब्दों में कहा कि वे स्कूल के लिए चंदा एकत्र करने आये थे|
ये बात सुनते ही सेठ जी के चेहरे पर चमक आ गयी और उन्होंने सहर्ष दो लाख की एक बड़ी राशी मिशन के लिए देने की इच्छा जाहिर की| जो कि आज के परिपेक्ष में करोडो में आंकी जाएगी| आगंतुको के मुंह खुले के खुले रह गए आश्चर्य से उनसे कुछ कहते ना बन रहा था| आखिरी में उन्होंनें पूछ ही लिया कि सेठ जी आपसे हमें ऐसी उम्मीद न थी जो आपने इतनी बड़ी रकम दे डाली ..और हमें तो कहीं और चंदा लेने की जरूरत भी न रही| तो सेठ जी मंद मंद मुस्कुराते हुवे बोले कि मेरे जीवन का सिद्धांत है कि जरूरत के लिए वस्तु का प्रयोग हो न कि फिजूल खर्ची के लिए ..ये तो सिर्फ एक मोमबत्ती को देखा है आपने.. मैंने जीवन में हर कदम पे जरुरत के लिए कोई कमी ना कि पर फिजूलखर्ची से बचा और जो भी मे बचा सका और कमा सका मैंने सदेव मानव सेवा के लिए उसका उपयोग किया| "क्योंकि विद्यालय बच्चों की जरुरत थी, समाज की जरूरत थी, अतः उसपर खर्चा करना मेरे लिए ज्यादा जरूरी था|"
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16 comments:
नूतन जी कहानी आज भी उतनी ही सार्थकता लिये हुये है जितना उस वक्त... काश कहानी का सारांश हम आज भी समझ पाये...बहुत खूब
प्रेरक कथा है। साझा करने के लिए आभार।
बहुत प्रेरणादायक कहानी ...
prerak katha!
प्रेरित करती कहानी.. सुन्दर..
वाह!! बहुत खूब नूतन जी ...यदि हम सभी इसी सिद्दांत पर चले तो हर जरूरतमंद की आवश्कता की पूर्ति हो सकती है . बहुत ही सार्थक और प्रेरणादायक रचना ..बधाई और आभार सांझा करने के लिए ..
achchhi prerak katha hai.
Aaj to dikhawe ka hi yug aa gaya hai ... kaash sabhi is kahani ka marm samajh payein to saare halat sudhar sakte hain .... bahut achchhi , prernadayak kahani ....... dhanyawad Nutan ....
भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।
धन्यवाद....
satguru-satykikhoj.blogspot.com
सबसे पहले मैं पंकज जी को धन्यवाद देना चाहूंगी ... जिन्होंने मेरी रचना को अपने ब्लॉग में सम्मान दिया .. आपका हार्दिक आभार
@
प्रतिबिम्ब जी
हरी जी
संगीता जी
अनुपमा जी
आपका तहे दिल शुक्रिया .. आपने मेरा उत्साह वर्धन किया ... सादर
@
अरुण जी
महेश जी
रेनू जी
अनु जी
राजीव कुमार जी
सहृदय शुक्रिया ...
पंकज जी ... आज विश्वगाथा ब्लॉग और यह पोस्ट मैंने चर्चामंच पर रखा है.. आपका आभार ...
http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_21.html
Didi ji.....good work....keep it on....and say my regards to tauji
बहुत सुन्दर और प्रेरणादायी कहानी....आज के समाज के उन अरबपतियों की आखें खोलने के लिये काफी है,जो देश मै रहते हुवे यहाँ का राशन/पानी/हवा/संपदा/सुख सुविधा का दोहन/उपभोग करते हुवे देश के धन को विदेशी बैंकों में जमा कर देश के निर्धन/सुविधा रहित जनता के लिये कुछ भी नही करते है और उल्टा उनके हक को मार रहे हैं....
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