नरेन्द्र व्यास के दो-कविताएं
कभी ऐसा भी हो
कभी ऐसा भी हो
और ठहर जाऊं
द्यावापृथिवी के मध्य
तुम्हारे भाल क्षितिज पर
रक्तिम निशा बन
और देख पाऊं तुम्हें-
समय के उस पार
ऐसे में-
क्या संभव होगा
दिख पाना तुम्हारा
दिन और रात में ढलते हुए?
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अंधेरों की ओर
ये कैसा जीवन है
जो मैं जी रहा हूँ
दो परतों में लिपटा
जिसके एक सिरे पर मैं
और दूसरे पर तुम
बीच में रौशनी और अंधेरों के
बीच की ये अदृश्य सीमा
अंधेरों की चादर में लिपटा
पाना चाहता है तुम्हे
तुम्हारा होकर भी मैं
कहाँ हो पाया तुम्हारा !
मैंने तो
सीमाओं से मुक्त
आकाश चाहा था
जहां सिर्फ और सिर्फ
तुम हो और
तुम्ही में निहित हो मेरा वजूद
रोशनी तुम्हारे गुप्त अंधेरों से
होकर ही आती है
धीरे-धीरे धकेल रही है
मेरी साँसें अंत की ओर
मैं अग्रसर हूँ उन्ही अंधेरों की ओर
जहां से तुम्हारी अलौकिक रोशनी
मेरी गुजरी सांसों को
रोशन कर रही थी...
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5 comments:
तुम्हारे भाल क्षितिज पर
रक्तिम निशा बन
और देख पाऊं तुम्हें-
समय के उस पार
ऐसे में-
क्या संभव होगा
दिख पाना तुम्हारा
दिन और रात में ढलते हुए?वाह बहुत खूब नरेन्द्र जी आत्मा की गहराई से निकले हुए शब्द आत्मा तक उतर ही जाते हैं आपको इन दोनों रचनाओं के लिए ढेरों बधाईयाँ
अंधेरों में एक पल की जरासी रौशनी का आभास ....सकारात्मक सोच ...एक आशा भी कही खुद के जीवन के इतिहास के पन्नों में कुरेदना भी कही अभिव्यक्त कर गया ... दोनों अच्छी कविता!!!!!!!!!!!!!!!!!!Nirmal Paneri
Ramesh Khandelwal
January 23 at 4:38am Reply • Report
Aapko " Vishwagatha '' patrika ke srajan ke liye.. aur shubharambha ke shubh-awasar par.. anekanek Badhai aur saphalta ke liye subhkamnayen.....!!!
Dhanyavad..
Devendra Nath Misra
January 23 at 9:58am Reply • Report
Dono kavitaon mein roshni aur andhere ke dwandwa aur beech mein kavi kee kalpanaa.Aaj kal antariksh tathaa us par yatraa ke yug mein jo prashna uth te hain unkaa
tatparya spashta ho jaataa hai.Kalpanaa ki aisi udaan par badhaai
Neelam Sharma
January 23 at 9:05pm Report
sir, maine padh li, dono rachnaye bahut sundar hai. dil ko chhu leti hai. Narender ji ko bahut bdhai.
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