कृष्ण कुमार यादव की कविता

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कागज पर लिखे शब्द
कितने स्थिर से दिखते हैं
आड़ी-तिरछी लाइनों के बीच
सकुचाये-शर्माये से बैठे।
पर शब्द की नियति
स्थिरता में नहीं है
उसकी गति में है
और जीवंतता में है।
जीवंत होते शब्द
रचते हैं इक इतिहास
उनका भी और हमारा भी
आज का भी और कल का भी
सभ्यता व संस्कृति की परछाइयों को
अपने में समेटते शब्द
सहते हैं क्रूर नियति को भी
खाक कर दिया जाता है उन्हें
परए प्रकृति की नियत
कभी खत्म नहीं होते शब्द
खत्म होते हैं दस्तावेज
और उनकी सूखती स्याहियाँ
पर शब्द अभी-भी जीवंत खडे़ हैं ।
नदियाँ
नदियाँ मिल जाती हैं
अथाह समुद्र में
अपनी पूरी कायनात के साथ
भावनाओं व संवेदनाओं
के प्रवाह के साथ।
कभी बाँध बनाकर
तो कभी पत्थर लगाकर
रोकी जाती हैं नदियाँ
रोकते हैं उनके प्रबल आवेश को
उनकी स्वतंत्रता को।
पर नदी कभी नहीं रुकती
अपनी अल्हड़ चाल से
बढ़ती जाती है नवयौवना
ताजगी को बिखेरते
मस्ती को समेटते।
रास्ते भर झेलती है
प्रकृति के झंझावतों को
मनुष्य के अत्याचारों को
पर बहती रहती अविरल
समुद्र के आगोश में समाने को।
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5 comments:
आदरणीया भाई साब प्रणाम !
कृषण कुमार जी नमस्कार !
कविता पढ़ते समय एक चित्र सामने उभरने लगा ये पंक्तिया बेहद सुंदर लगी ''
पर नदी कभी नहीं रुकती
अपनी अल्हड़ चाल से
बढ़ती जाती है नवयौवना
ताजगी को बिखेरते
मस्ती को समेटते।
सुंदर अभिव्यक्ति सुंदर भाव के लिए साधुवाद .
सादर !
DEAR KRUSHNA KUMAR,
AISA LAGTAA HAI AAP LIKHTE WAKT JINEKA SAHI LUTF UTHAATE HO, HAI NA......?
Narendra Vyas
Shri K.K. Yaadav ji ko padhan hamesha achchha lagta hai. shukriya shri pankaj ji ka ki unhone K.K. sahab se roobaroo karwaya. sadhuwad !
20 hours ago
मेरी रचना के प्रकाशन और प्रोत्साहन के लिए आभार !!
कृष्ण कुमार यादव जी की रचनाएँ तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर अक्सर पढने को मिलती हैं. उनका रचना-संसार काफी समृद्ध है.यहाँ उनकी रचना पढना सुखद लगा..बधाई !!
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