आवरण - ज्योत्सना पाण्डेय
तुम्हारा दर्प
तुम्हारे भीतर छुपा है.
उस पर मैं
परत-दर-परत
चढाती रही हूँ
प्रेम के आवरण
जिन्हें ओढकर
तुम प्रेम से भरे
सभ्य और सौम्य हो जाते हो
जब कभी भी
मेरे प्रश्न
तुम्हें निरुत्तरित कर देते हैं,
तुम्हारी खिसियाहट
कोंचती है
तुम्हारे दर्प को
और उठ बैठता है
वह फुंफकार कर
केंचुली की भांति
उतरते जाते हैं
प्रेम के आवरण
परत-दर-परत
हर बार की तरह तुम
क्षण भर में ही
उगल देते हो
ढेर सारा ज़हर
मेरे पीने के लिए
इस बार मैंने
ज़हर के बदले ज़हर को
न तो उगला है
न ही अंदर समेटा है
नीलकंठ की तरह
ओढ़ लिया है
एक आवरण
मैंने भी
देखो न!
मेरी आँखों में चमक है
और चेहरे पे मुस्कराहट...
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8 comments:
sundar kavita
Nirmal Paneri
इस बार मैंने
ज़हर के बदले ज़हर को
न तो उगला है
न ही अंदर समेटा है
नीलकंठ की तरह......बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है ज्योत्सना जी की !!!!!!!!!
Narendra Nayak
jyotsnaji ki panktiya padhi kya khub likha he lekin abb vakt aa gaya hay ke nilkanth ka kam se kam prichay to karana chahiye.
sundar chitran naari ke man ka aur us darp ka jise pine ke baad bhi wah kabhi shiv nahi ban paayi..
भीतर का चित्रण .....तथाकथित स्वतंत्रता...और फिर...यथा-स्थिति को स्वीकार कर...सम-भाव को ग्रहण कर लेने की यात्रा है जैसे ज्योत्स्ना जी की पंक्तियां.....एक अच्छी कविता पढ़ने को मिले तो रचनात्मक ऊर्जा मिलती है....धन्यवाद.
बहुत सुन्दर रचना और जवाबी कार्यवाही !
सच और सही.
इस दर्प को जितना सहेजा जाये उसका ज़हर उतना तेज होता जाता है. कीचड़ को ढंकने से बेहतर है कि जूते पहने जायें. प्रत्युत्तर सटीक है.
ओढ़ लिया है
एक आवरण
मैंने भी
देखो न!
मेरी आँखों में चमक है
और चेहरे पे मुस्कराहट...
sundar prastuti Jyotsna ji, aajkal insaan ki fitrat yahi he, chhadmm aavran hi odhe rehta he wo
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