अरुण चन्द्र रॉय की कवितायेँ

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प्रतिस्पर्धा
१
नहीं चाहिए
मुझे
तुम्हारे हिस्से की
धूप
हवा
पानी
नहीं है
मेरे लिए कोई
प्रतिस्पर्धा
२
नहीं चाहिए
मुझे
आकाश
चाँद
सितारे
और आकाश गंगाए
नहीं है
मेरे लिए कोई
प्रतिस्पर्धा
३
नहीं पहुचना
मुझे
क्षितिज
तक
नहीं है
मेरे लिए कोई
प्रतिस्पर्धा
४
मुझे
देनी है तुम्हे
जरुरत भर
धरती
और
इसके लिए
प्रतिस्पर्धा है
मेरी
स्वयं से
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समय के साथ
१
कम हो रहे हैं
खेत और खलिहान
बढ़ रही हैं
अट्टालिकाए
ए़क से बड़े ए़क
ए़क से ऊँचे ए़क
और सब के सब
प्रकृते के गोद में
पर्यावरण अनुकूल
हरे भरे खुले वातावरण में
होने के दावे के साथ...
२
चौड़ी हो रही हैं
सड़के
और अतिक्रमण
के शिकार हो रहे हैं
हवा
पानी और
धूप
अपने हिस्से की
जिंदगी नहीं
जी पा रहे हैं
वृक्ष
३
ख़रीदे
जा रहे हैं
खेत
बस रहे हैं
खाली शहर
बिक रहे हैं
स्वाभिमान
अस्मिता
और भविष्य
४
नए नए
समझौतो और
ज्ञापनो पर
हो रहे हैं
हस्ताक्षर
बंद कमरों में
बदले जा रहे हैं
भूगोल
और सौदा
हो रहा है
धरती के गर्भ का
विस्थापित
हो रही हैं
नदिया
जंगल
और
तथाकथित
जंगली जन
समय के साथ
कम हो रहे हैं
ख़त्म हो रहे हैं
विलुप्त हो रहे हैं
आप/हम/हमलोग
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संज्ञा की परिभाषा
बेटे ने कहा
पापा
संज्ञा
की परिभाषा है
'किसी
वस्तु या
स्थान के नाम को
कहते हैं
संज्ञा '
क्योंकि
आपके लिए
व्यक्ति भी
ए़क वस्तु ही है
और
कहते हैं आप
आज के समय में
भाव का
जीवन में
नहीं है
कोई स्थान
निरुत्तर मैं !
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9 comments:
अरुण जी ने जीवन के कुछ पहलुओ को बहुत ही सुंदर अंदाज़ में प्रस्तुत किया. जो आज की परिस्थिति में सच है.. बहुत खूब..
BETTER AS ALWAYS
किसे कहूँ श्रेष्ठ , किसे कम ... पर ये पंक्तियाँ प्रतिस्पर्धा के दर्द को व्यक्त कर रही हैं ...
मुझे
देनी है तुम्हे
जरुरत भर
धरती
और
इसके लिए
प्रतिस्पर्धा है
मेरी
स्वयं से
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बेहतरीन रचनाओं और चुनिन्दा रचनाकारों को चुन लाने और पढवाने के लिए "विश्वगाथा " को बहुत बधाई . "सरोकार" बेहतरीन कविताओं का अच्छा संकलन है. इसमें आम जीवन के विषयों के साथ साथ बहुत ही सूक्ष्म विषयों को उकेरा गया है . शुभकामना .
जीवन के पहलुओं का बहुत ही सुंदर प्रस्तुतिकरण ....भाव का "संज्ञा " से निष्कासन छू गया
सुंदर्र कविताएँ| बधाई भाई अरुण चंद्र रॉय जी|
Arun ji kaa bhaav bahut sunder hai ki unhen keval apni satya anuroop hi zameen chahiye ,laalach se door rahkar.Kheti ki zameen kam ho rahi hai aur bhavan nirman ke adhik aisi hi zameen chahiye,jo durbhagya purna hai kyon ki isse paidavaar kam hone ka khatraa hai,Vayu aur paani bhi dooshit ho rahe hain.Maanav jati kaa bhavishya kya hai yeh aik prashna soochak chinh
banta jaa rahaa hai.
aadarniya pankaj bhai saab
pranam !
arun jee namskaar !
nav varsh ki badhai ,
'' blog ka naya roop achcha laga , blog khula bhi bahut dino se hai ,
arun jee ki kavitae pasand aaye , badhai ,
aabhar
बेहद खूबसूरत रचनाओं को पढ़वाने के लिए शुक्रिया.....
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