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Narendra Vyas
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आज का दिन
एक बार फिर बापू याद आए- जया केतकी

इस अवसर पर सर्वधर्म प्रार्थना सभाएँ और अन्य समरसतापूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे भाईचारे और सद्भावना का संदेश फैलाने में सहायता मिले। इस अवसर पर कुष्ठरोग निवारण पखवाडे की शुरुआत भी की जाती है। इन सब के पीछे समाज के ठेकेदारों का मुख्य उद्देश्य जो भी हो पर मृतात्मा को शान्ति पहचाना कतई नहीं होता। हमारा ध्यान कुछ ऐसे सवालों की ओर जाता है, जो आज की नई पीढी के लिए प्रासंगिक होते हुए भी अनबूझे हैं। गाँधीजी को याद करते हुए कुछ लोग कहते हैं कि आज भारत को फिर से किसी गाँधी की जरूरत है। महात्मा गाँधी ने अपने जीवन काल में, अपने समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जो कुछ किया, क्या आज की परिस्थितियों में उन्हीं सिद्धांतों और तरीकों को दोहरा कर वर्तमान समस्याओं का समाधान किया जा सकता है ?
मेरे मन में कई बार यह सवाल भी उठता है कि यदि आज गाँधीजी हमारे बीच जीवित होते तो क्या कर रहे होते ?
जैसा कि हम जानते हैं कि गाँधीजी अपने अंतिम दिनों में सांप्रदायिक हिंसा की विकराल समस्या से जूझ रहे थे और जब अथक प्रयासों के बावजूद देश के विभाजन को टाल पाने और सांप्रदायिक हिंसा की लहर को थाम पाने में वह विफल रहे तो गंभीर आत्ममंथन के दौर से गुजरने के बाद वह ब्रह्मचर्य के विशेष प्रयोग करने की तरफ उन्मुख हो गए। उनका मानना था कि उनकी उपस्थिति के बावजूद यदि भारत में हिंसा का तांडव रूक नहीं पा रहा है तो इसका अर्थ है कि स्वयं उनके भीतर अहिंसा फलीभूत नहीं हुई। इस समस्या का समाधान उन्हें ब्रह्मचर्य की सफल साधना में दिखाई दिया। उनके मन में यह पौराणिक धारणा पनप चुकी थी कि इन्द्रियों पर पूरी तरह से विजय हासिल कर चुके व्यक्तियों के समक्ष सिंह और मेमने साथ-साथ एक ही घाट पर पानी पीते हैं। इस धारणा से प्रेरित होकर अपने जीवन के अन्य प्रयोगों की शृंखला के अंत में उन्होंने ब्रह्मचर्य संबंधी कुछ गोपनीय प्रयोग किए, लेकिन इससे पहले कि उन प्रयोगों का निष्कर्ष वह स्वयं निकाल पाते और दूसरों को बता पाते, उनकी एक ऐसे शख्स ने हत्या कर दी, जो मानता था कि भारत में सारी समस्याओं की जड गाँधीजी ही थे।
फिर भी, गाँधीजी ने जिस नजरिए से अपने समय की परिस्थितियों का विश्लेषण किया और तत्कालीन जटिल समस्याओं के समाधान का मार्ग तलाशने की कोशिश की, उसका महत्व आज की विषम परिस्थितियों में भी बहुत अधिक है। २१वीं शताब्दी के इस मोड पर हम दुनिया को जिस दशा और दिशा में जाता देख रहे हैं, उसके पीछे अकेले गाँधी नामक कारक की भूमिका ऐसी है, जो शायद बीसवीं शताब्दी की किसी घटना की नहीं रही। कोई चाहे तो इस बात को इस प्रकार भी रख सकता है कि बीसवीं शताब्दी के घटनाक्रम ने मानव की चेतना पर जो गुणात्मक असर डाला, गाँधी उसकी चरम निष्पत्ति थे।
लेकिन क्या गाँधीजी की चेतना का असर अब इतना क्षीण हो चुका है कि वह काल और परिस्थितियों की सीमाओं के परे काम नहीं कर सके? क्या मानवता का भविष्य इतना निराशाजनक है कि फिर से कोई आम आदमी अपने जीवन की परिस्थितियों का ईमानदारी और दृढता से सामना करते हुए अपनी चेतना का विकास न कर सके ? सच तो यह है कि गाँधी की चेतना ने उन संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं जो मानवता का चिर प्रतीक्षित आदर्श रही हैं, जिसे आने वाली पीढयाँ वास्तव में साकार होता देख सकेंगी। मानवता के चिर-प्रतीक्षित आदर्श हैं - सत्य, प्रेम और न्याय। गाँधीजी मूलतः सत्य के शोधार्थी थे और अपनी शोधयात्रा में आगे बढते हुए उनके सामने प्रेम का आदर्श भी दिखाई दिया, जिसे वह अहिंसा के माध्यम से प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहे। भारत के इतिहास में पहली बार उनके ही नेतृत्व में ऐसा संभव हो पाया कि आम जनता ने स्वतंत्रता के मौलिक और जन्मसिद्ध अधिकारों को हासिल करने के लिए शासक वर्ग के विरुद्ध निर्भीक भाव से संगठित परंतु अहिंसक आवाज उठाई। यदि गाँधीजी आज जीवित होते, तो वह ठीक उसी प्रकार से वर्तमान शासन व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक जनांदोलन चला रहे होते, जिस प्रकार ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध चलाया था। आज हमारे देश का राजनीतिक परिवेश और सामाजिक वातावरण भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता के अंध भँवर में लगातार फँसता जा रहा है, उससे मुक्ति दिलाने के लिए कई देशवासी फिर से गाँधी जैसे किसी चरित्र की जरूरत आकुलता से महसूस कर रहे हैं।
महात्मा गाँधी के जन्मस्थल गुजरात में भी शहीद दिवस पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साबरमती आश्रम में प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाता है, जहाँ से बापू ने १९३० में दांडी मार्च की शुरुआत की थी। सभी का मुख्य उद्देश्य यही कि देश उनके बताए हुए आदर्शों का भूले नहीं।
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- जया केतकी
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gyaanwardhak aalekh
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