डॉ. महेंद्र प्रताप पाण्डेय की दो कविताएँ
तब और अब
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ, जिसको हमने अपनाया है।
अपनी संस्कृति को त्याग त्याग, फिर गीत उन्ही का गाया है।।
चाय काफिया काफी को, छोड़ा उन लोगो ने लाकर।
हमने फिर ग्रहण किया उसको, उनका सहयोग सदा पाकर।
अमृत सम दुग्ध धरित्री से, जाने का गीत सुनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।1।।
पहले कपड़े सम्पूर्ण अंग को, भर शृंगार कर देता था।
जब अंगराग से पूरित तन, मन में उमंग भर देता था।
मृदु महक धरा से दूर हुयी, परयूम ने धूम मचाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।2।।
जनक पिता बापू कहते, सन्तोष बहुत मिल जाता था।
भैया चाचा दीदी बेटी, सुनने से दिल खिल जाता था।
पापा कहने से मिटा लिपिस्टिक जब, डैडी का चलन बढ़ाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।3।।
धोती कुर्ता रमणीय वेष, खद्दर की टोपी दूर हुयी।
डिस्को क्लब सिगरेट चषक, की भार बहुत भरपूर हुयी।
कटपीस के कटे ब्लाउज ने, भारत में आग लगाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।4।।
बच्चा पैदा होते ही अब, अंग्रेजी मे ही रोता है।
ए बी सी डी को सीख सीख, हिन्दी की गति को खोता है।
सब छोड़ संस्कृति देवों की, दानव प्रवृत्ति अपनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।5।।
थे राम कृष्ण अवतार लिये, यह बात बताया भारत में।
चैत्र मास से ऋषियों ने, नव वर्ष चलाया भारत में।
चले गये अंग्रेज मगर, अंग्रेजी नव वर्ष मनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।6।।
काल खोलकर मुँह बैठा, पर हैप्पी बर्थ मनाते है।
मन मन्दिर में जो प्रेम छिपा, आई लव यू कह कर गाते है।
सम्पूर्ण नग्नता छाने को, यह पाँप का म्यूजिक आया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।7।।
हिमालय
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।
तुम हो मेरे प्राण हृदय सब,
कभी नही थे निर्दय तुम जब,
हरित भरित है रत्नालंकृत, पूरी बसुधा सेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।1।।
शुभ्र श्वेत उत्तुंगावस्थित,
समयासम अरू विषम परिस्थिति,
शीत उष्ण वारिद से संयुक्त, नही रहा परहेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।2।।
हृदय टूटता मन गल जाता,
व्यथित जनों से तन जल जाता,
भयाकान्त हो सिसक सिसक कर, नमन करे परवेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।3।।
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2 comments:
थे राम कृष्ण अवतार लिये, यह बात बताया भारत में।
चैत्र मास से ऋषियों ने, नव वर्ष चलाया भारत में।
चले गये अंग्रेज मगर, अंग्रेजी नव वर्ष मनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।6।।
और
हृदय टूटता मन गल जाता,
व्यथित जनों से तन जल जाता,
भयाकान्त हो सिसक सिसक कर, नमन करे परवेज तुम्हारा।
हे भारत के उच्च हिमालय, महिमा मण्डित तेज तुम्हारा।।3।।
.. बहुत सरल मगर ही सारगर्भित रचना .....
तब और अब और हिमालय को लिखी रचना बेहद प्रभावशाली है.. तथा देशप्रेम की भावना प्रेरित कर बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है ...
..सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार
बासी बकवास!
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