चाय पीने का मेरा भी मन है...

दार्जिलिंग में चाय के पौधों की पत्ती को जब उबाली जाती है तो उसकी असली सुगंध हमारे मन को ताज़गी से भर देती है | क्यूंकि उसमे प्रकृती की अनूठी सुगंध होती है | दीव में वांजा जाती के लोग प्रतिदिन शाम के वक्त चाय के साथ दो केणां (छोटे, पीले, सुनहरी छीलकेवाले केले) का भोजन लेते है | उनकी चाय में दूध नहीं मगर पुदीना और नीम्बू के रस का मिश्रण होता है | दक्षिण भारत में ऊंचे कद की तांबे की कोटली (चायदानी) के चोंगे में लकड़ी का डाट दिया जाता है | जब डाट निकाला जाता है तो उसमे से निकलती भांप की महक तन-मन में फुर्ती का संचार कर देती है | तम्बाकू और कोफी के मुकाबले चाय में निकोटिन की मात्रा मामूली होती है | पित्त (वात और कफ़) प्रकृति के लोगों के लिए चाय तो मानो एसिड ही बन जाती है ! उत्तर में चाय और दक्षिण में कोफ़ी ज्यादा प्रिय होती है | कुछ समय पहले हुए संशोधन के अनुसार चाय पीने से हार्ट एटेक की मात्रा कम होती है | मगर ऐसे संशोधन के बारे में दिन-प्रतिदिन बदलाव आता है |
भारतीय समाज में बेटी जब बड़ी होती है तो सबसे पहले उन्हें चाय बनाने की तालीम डी जाती है, उसके बाद ही खाना पकाने का काम ! जब कोई अपने बेटे के लिए लड़की देखने जाते है तो वह चाय कैसी बनाती है उन पर ही ज्यादा निर्भर रहते थे | मगर आज के ज़माने में ऐसा नहीं है | गुजराती भाषा में चाय के लिए - "चा पीधी? या चा पीधो?" - बोला जाता है | मानो हम हिन्दुस्तानीओ के लिए चाय ही "सर्वधर्म समभाव" की सुगंध फैलाती है | ट्रेन में जब हम सफ़र करते है तो तड़के कांच की प्याली खनकने की आवाजें या प्लास्टिक की प्याली पर लम्बे नाख़ून से ऊंगली फेरकर कर्कश आवाज करता चायवाला "चाय बोलो भाई चाय.. " - एलार्म की घंटी का कार्य करता है |
चाय के लिए महंगे पारदर्शक कांच के टी-सेट, सिरेमिक, स्टील या सिल्वर और जर्मन मेटल के टी-सेट का उपयोग होता है | उसके अलावा प्लास्टिक, थर्मोकोल और मिट्टी की कुल्हडियों में चाय दी जाती है | चाय के लिए गुजराती में एक तुकबंदी है -
"कपटी नर कोफी पीवे, चतुर पीवे चा,
दोढ़ डाह्या दूध पीवे, मूरख पाड़े ना !"
अमदावाद में एल.डी. इंजीनियरींग कोलेज और यूनिवर्सिटी के सामने बैठकर कोलेजियाँ लडके-लड़कियां "दो कटिंग" कहते देखना अच्छा लगता है | वहां पढाई कम और मौज-मस्ती की बाते ज्यादा होती है | यही मीरजापुर-लाल दरवाजा के पास "लक्की" चाय जिसने नहीं वह भला अमदावाद के बारे में क्या जाने? लक्की की चाय और मस्काबन दिन में एक ही बार खाकर मैंने भी कई दिन गुज़ारे है, वह स्मरण आजा भी ताज़ी चाय जैसा ही है ! अमदावाद की पतंग और सूरत की टेक्षप्लाज़ा होटल में दस वर्ष पहले पचास से पचहत्त रुपये में एक कप चाय मिलती तो आश्चर्य लगता था | डायाबिटिस के मरीज़ भी चाय की मोहकता को नज़रअंदाज़ नहीं कर पातें, इसी कारण से तो सुगर-फ्री का संशोधन हुआ न ?
आधी चाय में तो लोग मुश्किल कार्य भी करवा लेते है | सचिवालय हो या कोई भी सरकारी दफ्तर, चाय के बहाने कर्मचारी को बाहर ले जाकर आप छोटा-बड़ा सौदा भी कर सकते है | कईबार तो किसी ख़ास होटल की चाय पीने के बाद फिर से वहीं जाने को मन करता है | पूछो क्यूं ? उस चाय के साथ अफ़िम की डोडी भी उबाली जाती है | थोड़ा नशा हो तो अच्छा लगता है न?
गुजरात के सुरेंद्रनगर में "राज" की चोकलेटी चाय का मजा ही कुछ अलग है | उसके मालिक स्वर्गीय सजुभा बापू काउंटर पर बैठकर बोलते है तो घडीभर लोग सुनाने खड़े रह जातें hai | आंबेडकर चौक में उनकी होटल के सामने ही रेलवे की दीवार है | शाम के वक्त वहां मजदूर इकट्ठे होते है | दातून बेचने वाले देवीपूजक भी होतें है | जज़दिक में ही कागज़ के पेकिंग मटीरियल की फेक्ट्री है | उन सब के लिए सजुभा बापू अपने वेइतर को सूचना देते सुनाई देतें है, उसी का नमूना आपके लिए; "बे भींते (दीवार), दोढ़ कागळ (कागज़ की फेक्ट्री) , आदधी दातण (दातून वाला) आदि...
हमारे मित्र डॉ. रुपेन दवे सुबह १०-बजे मरीजों पर गुस्सा हो जाए और कम्पाउन्डर घनश्याम रोज़मर्रा की तरह डॉक्टर पर गुस्सा करें तब पास में रहे केमिस्ट जिज्ञेश को भी गुर्राहट करते हुए देखने का मौक़ा कीं मरीजों को मिला है | ऐसा क्यूं होता होगा, भला ! अरे भाई, सुबह दस बजे का समय तो चाय का होता है, बेचारे सुज्ञ मरीज़ क्या जाने?
गुजरात के जानेमाने लोक-कलाकार बाबू राणपुरा चोटिला के पास केतना मेहता की फिल्म "मिर्च मसाला" में काम कर रहे थे, तब सुरेंद्रनगर की पतारावाली होटल में स्वर्गीय स्मिता पाटील, नसीरुद्दीन शाह, सुरेश ओबेरॉय और डिरेक्टर केतन मेहताने बाबू की प्रिय चाय पीने की जिद्द की थी |
गुजरात में छोटे शहरों में चाय की होटल पर ऑर्डर देने की ख़ास स्टाईल होती है | जैसे की; " एक अड़धी चा, पंखो चालु करो, आजनु छापुं लावो तो भाई ! रेडियामां भजन वगाड़ोने यार ! बहार सायकल छे, एमां तालूं नथी, ध्यान राखजे |" आधी चाय के ऑर्डर में होटल के वेइतर को खरीद लिया न हो जैसे? बारिश के मौसम में चाय का महत्त्व ज्यादा होता है | अगर कोई हमसे मिलकर खुश हो जाता है तो कहता है; "चलो, आईसक्रीम खाए | उसमें अपनी खुशी को बांटने का आनंद होता है | मगर, मन उदास हो, थकान हो, दू:ख की बात हो या मन पर बोज... ऐसे समय अगर कोई अपना मिल जाए तो सहजता से ही शब्द निकलते है; "आईऐ, चाय पीतें है |" अंत में हिन्दी कविश्री ज्ञानप्रकाश विवेक के इन शब्दों को समझने की कोशिश करें...
"शेष तो सबकुछ है, अमन है; सिर्फ कर्फ्यू की थोड़ी घुटन है
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11 comments:
bahut baDhiya likha....itni jankari is uttam paye ki...
dhanyavad
बड़े भाई ..एक प्याली चाय ...पर निबंध पढ़ा था ...पर उसमे इतनी सामग्री नहीं थी ...चाय के बहाने आपने पूरी सैर करा दी ...सुरेन्द्रे नगर से लेकर अहमदाबाद तक ....मगर एक चाय जो मैं पिता हूँ ...आप उसे लिखना भुला गए ....तुलसी के पत्तों की चाय ...हलकी खांसी भी दूर कर देती है .....चाय पिलाने के लिए ...आपका आभारी हूँ ..
वन्दे मातरम पंकज जी
बेहतरीन प्रस्तुति चाय के उपर, जानकारियों से भरपूर...
एक सुझाव है आप Hindi Unicode Fonts इस्तेमाल करें लेख की मात्राएँ बिखर रही है...
आभार...
aadrniy pnkj ji khte hen ke chay ke pyale men tufaan hota he lekin aapne to chay ke pyale men zindgi ke khas lmhe bhr diyen hen khubsurt or rchnatmk prstuti ke liyen dili mubark bad . akhtar khan akela kota rajsthan
"चाय बोलो भाई चाय.. " -
"कपटी नर कोफी पीवे, चतुर पीवे चा,
दोढ़ डाह्या दूध पीवे, मूरख पाड़े ना
itni adbhut prastuti padhne ke baad mera bhi
चाय पीने का भी मन है...
..bahut sundar prastuti ke liye aabhar
ek pyaali chay aur gahan gyaan
पंकज जी , आपने तो चाय का पूरा विकिपीडिया ही दे डाला | न जाने कितने तरह की कहाँ कहाँ की चाय का लुफ्त लेने की तमन्ना जगा दी | वास्तव में चाय
भारतीय समाज पर जिस तरह से छागई है वह आश्चर्य जनक है | एक जमाना वह भी देखा है सत्तर के दशक में जब गांवों में चाय किसी खास व्यक्ति के आने
पर ही बंटी थी , या रिटायर्ड फ़ौजी पीते थे | अन्य लोग मट्ठा पीते थे या दूध | फरीदाबाद में भी एक चायवाला है जो केवल चाय ही बेचता है और कई कुंतल दूध की
चाय बेच देता है प्रतिदिन |
maja aa gaya bina piye hi swad maloom pad gaya chai ka,
badhai ji
जानकारी भरपूर है। शुक्रिया पंकज जी।
Aajkal yehi chalta hai...a chhotu, ek cutting special! Par ye pura cup b mazedar raha :)
"विश्वगाथा" परिवार के सभी दोस्तों ने कड़क-मीठी तो कम सक्कर की चाय का मजा लेकर अपने विचार रखें, मै आप सब का आभारी हूँ |
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