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Pankaj Trivedi
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नज़म
देखा है....!
मौत को मैने बहुत करीबी से देखा है
जिन्दगी को बहुत रंगीनियत से जीया है
बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों को मैंने देखा है
बात न होने की फैलती है अफवाह बनकर
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है
मौजूदगी की परवाह किसे है यहाँ यारों
सूखे पत्ते को पेड़ से गिरते हुए देखा है
सहजता से आ जाये तो अच्छा हैं यारों
ग़र कविता हो या मौत हमने तो देखा है
जिन्दगी को बहुत रंगीनियत से जीया है
बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों को मैंने देखा है
बात न होने की फैलती है अफवाह बनकर
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है
मौजूदगी की परवाह किसे है यहाँ यारों
सूखे पत्ते को पेड़ से गिरते हुए देखा है
सहजता से आ जाये तो अच्छा हैं यारों
ग़र कविता हो या मौत हमने तो देखा है
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16 Comments
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16 comments:
यथार्थ उजागर करती रचना।
बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों मैंने को देखा है...
जिंदगी के यथार्थ का बहुत ही सटीक चित्रण..आभार
जीवन की सच्चाई और व्यावहारिक दृष्टि से उसकी उपादेयता पर बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति दार्शनिकता का भी दर्शन करवाती है. ! बेहद अच्छी बन पड़ी है रचना ! साधुवाद !
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है
मौजूदगी की परवाह किसे है यहाँ यारों...
अफवाह न बन रह जाएँ , बस यही चाह है
वरना हर पल ... समय को बदलते देखा है
आपका संदेश मिला तो अभी अभी देखा.... बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बात कही आपने.....सहजता से आ जाये तो अच्छा...कविता हो या मौत....जिनके पास सहजता है उनके पास आकर तो मौत भी जिंदगी बन जाती है.....और जिनके पास सहजता नहीं है उनकी जिंदगी भी मौत से कम नहीं होती.....!
अति उत्तम अभ्व्यक्तिI वर्तमान के जीवन शैली में चलती फिरती मुर्दा लाशें भी गजब ढा रही हैं I सहजता थी गांधी जी में जो सिद्ध करके एक मिशाल कायम करदी, सहजता थी विवेकानन्द में, सरदार पटेल में, लाल बहादुर शात्री में और आज? आज की आधुनिकता की चमक धमक के आवरण में दरिंदों के आगे होठ सिल जातें हैं, खून का घूँट पी कर , कलम रुक जाती है क्या लिखूं ? सहजता के नाम परI
पंकज जी बहुत अच्छी रचना है....जिंदगी की सच्चाई बयान करती हुई...साधुवाद और शुभकामनाएँ........
bahot khub ... jindgi ki sachhai hai...
बात न होने की फैलती है अफवाह बनकर
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है
भाई साब प्रणाम!
बहुत कुछ बया करदेती है ये पंक्तियाँ , मानों ''जीवन को देखा नहीं जीया है मैंने ''
सुंदर अभिव्यक्ति ,
सादर !
bahut khoob, jivan aur duniya ka sach...bahut shubhkaamnaayen.
त्रिवेदी जी .....यहाँ कैसे जिए जा रहे है लोग .........लगता है कफ़न ओढ़े कोई लाश हो ......जीवन का सत्य-स्वरुप दर्शाती रचना ........वाह!!!
//बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों को मैंने देखा है
बात न होने की फैलती है अफवाह बनकर
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है/
भाई पंकज जी ,
वन्दे !
आपके ब्लोग पर आया हूं !
उपस्थिति लगा लेना जी !
बहुत कुछ पढ़ कर भी जा रहा हूं !
साथ ले जा रहा हूं ,
अछे ब्लोग को देखने का ऐहसास
और ढेर सारा अनुभव !
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यह कवितांश भी अछा लगा-
बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों को मैंने देखा है
Bahut hi achhi patrika hai....
अरमानो को खाख होते जिसने देखा है,
उसने बीज को दरख़्त होते भी देखा है,
आशा की किरणों की बात करो यारो,
मरने के बाद की दुनिया को किसने देखा है
ब्लॉग पर काफी कुछ पड़ने को मिला ,अच्छी रचनाये है सभी ,जीवन दर्शन दर्शाती हुई आपकी यह रचना बहुत पसंद आई ....बधाई
"विश्वगाथा" के सभी दोस्तों से आभार प्रकट करता हूँ |
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