अपर्णा भटनागर
राम से पूछना होगा
वह दीप
चाक पर चढ़ा था
बरसों से ..
किसी के खुरदरे स्पर्श से
स्पंदित
मिट्टी जी रही थी
धुरी पर घूर्णन करते हुए
सूरज को समेटे
अपनी कोख में ..
वह रौंदता रहा
घड़ी-घड़ियों तक ...
विगलित हुई
देह पसीने से
और फिर
न जाने कितने अग्नि बीज दमक उठे
अँधेरे की कोख में .
तूने जन्म दिया
उस वर्तिका को
जो उर्ध्वगामी हो काटती रही
जड़ अन्धकार के जाले
और अमावस की देहर
जगमगा उठती है
पूरी दीपावली बनकर .
मिट्टी हर साल तेरा राम
भूमिजा के गर्भ से
तेरी तप्त देह का
करता है दोहन
और रख देता है चाक पर
अग्नि परीक्षा लेता
और तू
जलती है
नेह के दीवट में
अब्दों से दीपशिखा बन .
दीप ये जलन
क्या सीता रख गयी ओठों पर ?
राम से पूछना होगा !
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5 comments:
वह रौंदता रहा
घड़ी-घड़ियों तक ...
विगलित हुई
देह पसीने से
और फिर
न जाने कितने अग्नि बीज दमक उठे
अँधेरे की कोख में . ....
बहुत ही भावपूर्ण और गहन चिंतन से पूर्ण अभिव्यक्ति..
"तूने जन्म दिया
उस वर्तिका को
जो उर्ध्वगामी हो काटती रही
जड़ अन्धकार के जाले
और अमावस की देहर
जगमगा उठती है
पूरी दीपावली बनकर"
वाह अपर्णा जी ! कविता की आत्मा सिमटी है इस पंक्तियों में ! आपकी कविता के बारे में कुछ भी कहूँ, शब्द कम ही पड़ेंगे.. यथार्थ में लिपटा भावों और शिल्प का ताना-बाना प्रभाव छोड़ता है..और बार-बार पढ़ने को प्रेरित करता है ! एक बेहतरीन और सम्पूर्ण रचना के लिए आपको बधाई और पढ़वाने के लिए श्री पंकज जी का आभार !!
bahut sundar aur mitti ki vmochan karti yah kavita ..jiske mitti roop ko deepak bana kar sita kaa ankan aur ram ka roop us swaroop ko badlta huva... vaah Aparna ji aapkee soch bahut gehri hai... bahut sundar.. adbhut
कैलाश जी , नरेंद्र जी एवं नूतन जी .. आप सभी ने कविता पर टिपण्णी लिखकर मनोबल बढ़ाया ! उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आभार !
पंकज जी के सहयोग से हम अपनी कविता आप सभी तक पहुंचा पाए .. पंकज जी आपका शुक्रिया
अपर्णा जी, आप को पढ़ना सुखद है.. कविता अच्छी है, मार्मिक. ये शब्द 'मार्मिक' बहुद दिनों से मेरे प्रयोग में नहीं था, आप की कविताओं ने याद दिलाया, 'असुविधा' पर आप को पढ़ कर यही शब्द उचित लगा था, यहाँ भी... धन्यवाद, अच्छी कविता के लिए..
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