मंजुला - ममता - रेणु की कवितायें
निर्झरी बन फूटती पाताल से
कोपलें बन नग्न रुखी डाल से
खोज लेती हैं सुधा पाषाण में
जिंदगी रूकती नहीं चट्टान में
रेत के दरिया में डूबी सरस्वती
हिम-शिखर पे भ्रमण करता वो यति
देव बन कण झूमते आसमान में
बस सिर्फ इंसां जिए गुमान में
शक्ति-प्रदर्शन करे नि:शक्त पर
मुदित है वनों के बहते रक्त पर
प्रकृति विकराल है शमशान में
तम सभी हो होम केवल ज्ञान में
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ज़िंदगी है तुजसे मेरी - ममता मजुमदार
बेताबियों की शामों-शहर से
न थी मैं वाकिफ दर्द जिगर से-1
गुज़री नहीं मैं तो कभी भी
प्यार की दिलकश राहें गुजर से-2
दिवानगी की ये इन्तेहा है
हर चहरे में चेहरा तेरा ही -3
तेरा चहेरा इक रुबाई सा है
सारी दुनिया तेरी परछाईं सी है-4
दिल-जिश्म-जाँ पर तूं छाया सा है
तेरी कशिश का जादू अजब है -5
हर वक्त मुजको तेरी तलब है
यूंही नहीं बेशुद्ध हुआ दिल इस -6
प्यास का तो कोई शबाब है
तेरे सिवा न कोइ अब अरमां -7
अब ज़िंदगी है तुजसे मेरी,
बीन तेरे हर जगह तन्हाई सी है.-8
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मुटठी भर रोशनी ... रेणु सिंह
थाली भर अँधेरे को पाटने के
लिये
काफी है मुट्ठी भर
चाइनीज झालर की।
मन की टूटन को भरने के लि ये
काफी है अपनोँ की मुस्कानेँ या
जरुरत पङेगी एक लाफिँग थेरे पी की।मूक
प्राणी की भाषा तब समझेँगे ह म
जब दर्द की भाषा समझेँगे अ पनोँ की।
दुनियाभर की चकाचौँध से मुट्ठी भर
खुशियाँ अपनोँ की भी।
इतने पटाखोँ की रोशनी
मेँ रोटियोँ की मेहरबानी अनजाने
गरीबोँ के लिये भी।
कनक सी सच्ची कोशिश काफी है
कुछ सार्थक परिवर्तन के लिये या
जरुरत पङेगी एक अदद सिफारिश की।
अँतर की बर्फ पिघलने को का

एक सुँदर सी मुस्कान इस दिवाली या जरुरत
पङेगी एक महँगे से उपहार की
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23 comments:
EK SE BADH KAR EK.........LAJWAAB RACHNAYE..
सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।
निर्झरी बन फूटती पाताल से
कोपलें बन नग्न रुखी डाल से
खोज लेती हैं सुधा पाषाण में
जिंदगी रूकती नहीं चट्टान में
मंजुला , सच जिन्दगी कहाँ रूकती है ! निर्झरी बन पाताल से फूटना ; कोंपलों सूखी डाल पर अंकुरण .. इसी अंकुरण में ज़िन्दगी समाई है . पुराने का चले जाना , नयों का स्थान लेना इस प्रवाह को बनाये रखता है . बहुत सुन्दर बन पड़ी है रचना . इसमें गीत का सहज समावेश हो गया है , जो विचारों की लय के साथ शब्दों की लय पर थिरकता है .. पाठक झूम उठता है !
@ मंजुला जी .... बहुत खूब सूरत प्रस्तुति ...
@ ममता जी ...बहुत खूबसुरती से लफ्ज़ पिरोये हैं आपने अपने नज़्म में ...
@ रेणु जी...बहुत खूब
तीनो रचनायें बहुत पसंद आयीं ... आभार
मंजुला जी कि कविता बेहद सशक्त और सुन्दर.. और हर विरोधी परिस्थितयो में भी जिंदगी का आगमन ..बहुत सुन्दर सन्देश
ममता जी - कि कविता / नज़्म प्रेम में बहुत सुन्दर,,
रेनू जी की दीपावली पर जहान भर की खुसिया और अपनों की खुशियों की दरख्वास्त भी अच्छी है ..अच्छा पैगाम
निर्झरी बन फूटती पाताल से
कोपलें बन नग्न रुखी डाल से
खोज लेती हैं सुधा पाषाण में
जिंदगी रूकती नहीं चट्टान में
बहुत प्रेरक रचना ..
निर्झरी बन फूटती पाताल से
कोपलें बन नग्न रुखी डाल से
खोज लेती हैं सुधा पाषाण में
जिंदगी रूकती नहीं चट्टान में
behad sundar, manjula ji!
prem samarpan ki baat karti sundar rachna..., mamtaji ki...
aur andhere ko paatne ki baat karti hui roshan..., renu ji ki rachna...
sundar prastuti!!!
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
bahut hi pyari si kavitaye
sabhi ko sadhubad
तीनो ही रचनाएं बेहद प्रभावशाली !
THNKS AAP SABHI KO KI AAPNE MERI KAVITA KO PASNAD KIYA AUR AAGE BHI AAP SBHI K AASHIRWAD KI UMMED M APKI RENU
आपके शब्दों की बड़ सही तरीके से पकड़ी हैं...
(कभी कभी सोचता हूँ की ४-५ भाषाओंसे, किस भाषा की पकड़ ज़्यादा समजू ?)
सभी अद्भुत ,अनुपम एक से बढ़कर एक रचनाये,
अद्भुत , अद्वित्य रचनाएँ.. बहुत ही मनमोहक , मनभावन, धन्यवाद् आप सभी मित्रो .. कविवर, रचनाकारों का , जो आपको पदने का मौका मिला..
तीनो रचनायें अनुपम हैं.
उम्दा रचनाये
सभी रचनाएँ बेहद खूबसूरत हैं.
प्रेमरस.कॉम :
दैनिक जागरण में: हिंदी से हिकारत क्यों
तीनों ही कविताये आपने आपमें पूर्ण हैं और एक सन्देश देती हैं
दिल को छूती तीनो रचनाएं. खूबसूरत और संवेदनशील प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
मुटठी भर रोशनी
It may be possible that my comment was bad.If it hurt the author(i.e.poetess),she must leave her objection instead deleting the same.
Adbhut
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