किरण तिवारी
आशा निराशा के चौराहे पर, हुएँ प्रज्वल्लित दीप प्रणय के...
कुछ मदमाते कुछ मुस्काते, पलकों को बोझिल कर जाते
कभी ह्रदय को झंकृत करते, कभी सहवास में घुलमिल जाते
धूमिल होते पथ जब सरे, पंछी उड़ते पंख पसारे
भरे नयन के मदिरालय से, छलकते अधरों के प्याले
कभी प्रफुल्लित हो लहराएँ, कभी संकुचित हो बलखाएं
कभी कालिमा में प्रकाश बन, अमृतरस का पान कराएँ
सुनिए बाती भीतर जल रही ,दिया है ये शरीर तेल जब तक है भैया, हम तुम कहे कबीर | -पुश्पेंद्रप्रताप सिंह
आइए दीपोत्सव मनाएं . . . . नरेन्द्र व्यास
मनुष्य उत्सवप्रेमी है। जहाँ रहता है, वहीं उत्सव अवश्य मनाने लग जाता है। प्राकृतिक और ऐतिहासिक रूप से पर्व के दो रूप होते हैं। कुछ पर्व प्राकृतिक रूप से घटने वाली घटनाओं के कारण से मनाये जाते हैं। कुछ त्यौहारों का कारण कोई ऐतिहासिक घटना बन जाती है तथा कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जिनमें दोन घटनाओं का समावेश होता है। प्रत्येक पर्व अपना धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक और सांस्कुतिक महत्व रखता है। हमारे देश में अनेक पर्व मनाये जाते हैं। श्रावणपूर्णिमा, जन्माष्टमी, विजयादशमी, दीपोत्सव, मकरसंक्रान्ति, होलिकादहन इत्यादि। हमारे त्यौहारों में प्रमुख त्यौहार दीपावली है। भारत में इस का विशेष महत्व है। इसके अलावा ईद, कि्रसमस और गुरुनानक जयंती आदि भाईचारे की दृष्टि से मनाए जाने वाले पर्व हैं। दीपावली पर्व शरद ऋतु के आरम्भ में कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। वर्ष में एक शाम ऐसी आती है कि जब पूरा देश रोशनी में डूब जाता है। दिये अब भी रोशन होते हैं, लेकिन कम। उनका स्थान बिजली के रंगीन बल्ब ले रहे हैं। दीपावली के उत्साह और जोश में कोई फर्क नहीं। दीपोत्सव भारत के कोने-कने में अनेक कारणों से मनाया जाता है। राजा बलि का विष्णु को भूमि दान, महाकाली का भगवान शंकर के स्पर्श से क्रोधाग्नि शान्त, श्रीरामजी द्वारा रावण का वध कर अयोध्या आगमन, श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध, विष्णु द्वारा नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकशिपु का वध, २४वें जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वांण, स्वामी शंकराचार्य का जन्म, स्वामी रामतीर्थ का जन्म, महर्षि दयानन्द सरस्वती का बलिदान दिवस आदि। महाभारत के बाद दीपावली के वास्तविक स्वरूप को छोडकर अनेक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर दीपावली का त्यौहार मनाया जाने लगा। वर्षा ऋतु में वर्षा कारण घरों में पानी भर जाता है, गन्दगी भी बढ जाती है, मकानों में नमी आ जाती है, अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं। नए अन्न आ जाते हैं। सर्दी की ऋतु तथा अन्न की खुशी में और मकानों तथा सभी स्थानों की शुद्धि के लिये दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है। दीपावली वाले दिन पकवान बनाये जाते हैं। मकानों को सफाई करके सजाया जाता है। आतिशबाजियाँ, पटाखे जलाए जाते हैं। जीवन में फैले हर प्रकार के अंधकार का दमन कर प्रकाश करने प्रेरणा देने वाला दीपावली का त्यौहार आता है हमें सन्देश देने के लिए। तमसो मा ज्योतिर्गमय । हम प्रकाश की ओर बढें । यह प्राकृतिक परिवर्तन हमें प्रेरणा दे रहा है कि जीवन में कुछ दोष आ जाते हैं तो उन दोषों का अन्त कर दें। जीवन में एक नवनिर्माण की क्रान्ति लाएं। दीपावली के समय लोग घरों को साफ करते हैं। सफेदी और उज्ज्वल करते हैं, दीपक जलाते हैं। पर क्या इसी तरह संस्कारों पर, आचरण में छाई अनेक बुराइयों को उसे भी नहीं साफ करना चाहिए ? दीपक आज वास्तव में मन के अन्दर रखने की आवश्यकता है। जिससे अपनी संस्कृति, अपने संस्कार और अपने राष्ट्र को गुमराह होने से बचा सकें। यदि समय रहते हम जागृत न हुए तो दीपावली की रात को जले दीपकों के बुझते ही और भी अधिक अंधकार फैला देता है, वैसे ही हमारे चारों ओर कुसंस्कार और असभ्यता का अंधकार फैल जाएगा। आज दीपावली के दिन हमें इस क्यों का उत्तर खोजना होगा।
दीपोत्सव महोत्सव
आज के दौ
र में समाज में हमें निराशा, भय-आतंक और दगाबाज़ीने घेरा है | ऐसे मैं "विश्वगाथा" परिवार आपके लिएँ साहित्य-संस्कृति और आध्यात्मिकता से जुड़े विचारों का छोटा सा दीप लेकर खडा है | चारों तरफ भले ही अंधकार का साम्राज्य हो, मगर जहां अपने शुद्ध विचार और शुद्ध आत्मा का दीप जलता हो वहां दुःख-दर्द, निराशा या भय की कालिमा दूर हो जायेगी | मैं आप सबको आहवान करता हूँ कि इस छोटे से दीप को बुझाने न दें | आप भी हमारे साथ इसमें श्रद्धा और भक्ति से इसे बचाए रखेंगे तो छोटा सा दीप एक-न-एक दिन सूर्य बन जाएगा |आप सभी को दीपावली के इस पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ! महालक्ष्मी आप पर सदा मे
हरबान रहे | आप और आपका परिवार सुखी हो, मंगलमय हों, ऐसी श्रीगणेश जी, प्रभु श्री हरि और माँ लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं | दीपावली महोत्सव को धूमधाम से मनाने के प्रयोजनार्थ आप सभी के लिए प्रस्तुत है | हम सब मिलकर आस्था और विश्वास के दीपक जलाएँ और अपने सुखों की रंग-बिरंगी फुलझडियाँ मिलजुलकर बाँटें और दुखों को प्रेम की चिंगारी से पटाखों के धुएं में उड़ा दें...
- पंकज त्रिवेदी
"आराधना " - कुसुम ठाकुर
माँ कैसे करूँ आराधना ,कैसे मैं ध्यान लगाऊँ ।
द्वार तिहारे आकर मैया ,कैसे मैं शीश झुकाऊँ ।
मन में मेरे पाप का डेरा ,माँ कैसे उसे निकालूं ।
न मैं जानूं आरती बंधन ,माँ कैसे तुम्हें सुनाऊँ ।
बीता जीवन अंहकार में ,याद न आयी तुम माँ ।
अब तो डूब रही पतवार ,माँ कैसे पार उतारूँ ।
कर्म ही पूजा रटते रटते ,माँ बीता जीवन सारा ।
पर तन भी अब साथ न देवे ,माँ, अर्चना करूँ मैं कैसे ।
मैं तो बस इतना ही जानूँ ,माँ, तू सब की सुधि लेती ।
एक बार ध्यान जो धर ले ,माँ दौड़ी उस तक आती ।
नन्हा सा दीया हूँ ....
मैं नन्हा सा
माटी का दीया हूँ |
अंधेरों से लड़ता
निडर जलता रहता हूँ |
हृदय को घेरे
स्वार्थ,
ईर्ष्या,
द्वेष के अँधेरे कोनों को
जागृत करता रहता हूँ |
मैं नन्हा सा
माटी का दीया हूँ |
जहाँ भी जला दो
रौशनी के गीत गाता रहता हूँ |
प्रेम,
अनुराग,
स्नेह की
रौशनी लुटाता,
निस्वार्थ जलता मिटता रहता हूँ | - सुधा ओम ढींगरा
नार्थ कैरोलीना (यू . ए .ए )
दीपावली...
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दीपों की कतारों संग
खुशियों का अम्बार सजे,
जगमग रौशनी संग
दिल की ख्वाहिश आबाद रहे !
जिन ज़हीन लम्हों को भूल आये
आज उन्हें याद करें,
दीये की लौ की तरह
प्रेम का ज्योत जलाएं !
दीप प्रज्वलित कर दिल की
दुनिया गुलज़ार करें,
अमावस्या में पूर्णिमा की
बरसात करें !
आओ इस दिवाली में
प्रेम प्रतिज्ञा कर,
परिपूर्ण जीवन का
प्रारंभ करें !
- जेन्नी शबनम