Posted by
Pankaj Trivedi
In:
अतिथि-कविताएँ
"कह-मुकरी" - योगराज प्रभाकर
आदरणीय पंकज भाई जी, एक बहुत ही पुरातन और लुप्तप्राय: काव्य विधा "कह-मुकरी" पर कलाम आजमाई की है! हज़रत अमीर खुसरो द्वारा विकसित इस विधा पर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी बहुत स्तरीय काव्य-सृजन किया है ! मगर बरसों से इस विधा पर कोई काम नहीं हुआ है ! "कह-मुकरी"
अर्थात कह कर मुकर जाना वास्तव में दो सखियों के बीच का संवाद है ! जहां एक सखी अपने प्रियतम को याद करते हुए जब कुछ कहती है तो दूसरी सखी उससे पूछती है कि क्या वाह अपने साजन की बात कर रही है तो पहली सखी बड़ी चालाकी से इनकार करके (मुकर कर) किसी ओर चीज़ की तरफ इशारा कर देती है !
(१).
इसको अपनी शान भी माना,
शाने हिन्दुस्तान भी माना,
देख हृदय हो भाव विभोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(२).
इस बिन तो वन उपवन सूना,
सच बोलूँ तो सावन सूना,
सूनी सांझ है सूनी भोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(३).
ऐसा न हो - वो न आए,
घड़ी मिलन की बीती जाए,
सोचूँ, देखूं शून्य की ओर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(४).
देख बदरिया कारी कारी,
वा की चाल हुई मतवारी,
हो न जाए ये बरजोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(५).
मादक स्वर में ज्योंही पुकारे,
सजनी भूले कारज सारे ,
उठे हिया में अजब हिलोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(६).
देख बदरिया मचला जाए,
नृत्य से सजनी को फुसलाए,
बड़ा चतुर है ये चितचोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(७).
सारा गुलशन खिल जाएगा,
कुछ भी हो पर वो आएगा,
जब आए बादल घनघोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(८)
श्याम रंग, सिर कलगी सोहे,
क्या बतलाऊँ, महिमा तोहे,
चाँद कहूँ या कहूँ चकोर
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !

(१).
इसको अपनी शान भी माना,
शाने हिन्दुस्तान भी माना,
देख हृदय हो भाव विभोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(२).
इस बिन तो वन उपवन सूना,
सच बोलूँ तो सावन सूना,
सूनी सांझ है सूनी भोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(३).
ऐसा न हो - वो न आए,
घड़ी मिलन की बीती जाए,
सोचूँ, देखूं शून्य की ओर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(४).
देख बदरिया कारी कारी,
वा की चाल हुई मतवारी,
हो न जाए ये बरजोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(५).
मादक स्वर में ज्योंही पुकारे,
सजनी भूले कारज सारे ,
उठे हिया में अजब हिलोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(६).
देख बदरिया मचला जाए,
नृत्य से सजनी को फुसलाए,
बड़ा चतुर है ये चितचोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(७).
सारा गुलशन खिल जाएगा,
कुछ भी हो पर वो आएगा,
जब आए बादल घनघोर,
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(८)
श्याम रंग, सिर कलगी सोहे,
क्या बतलाऊँ, महिमा तोहे,
चाँद कहूँ या कहूँ चकोर
ऐ सखी साजन ? न सखी मोर !
(९).
सांवली मैं वो गोरा गोरा
लगता है चंचल सा छोरा
भले वो मुझसे उम्र-दराज
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
(१०).
जी करता इस में खो जाऊँ
इसकी गोदी में सो जाऊँ
और कहूँ क्या आए लाज
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
(११).
रूह-ओ-दिल पे छा जाता है
सबके मन को भा जाता है,
सबके मन पर इसका राज़,
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
सांवली मैं वो गोरा गोरा
लगता है चंचल सा छोरा
भले वो मुझसे उम्र-दराज
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
(१०).
जी करता इस में खो जाऊँ
इसकी गोदी में सो जाऊँ
और कहूँ क्या आए लाज
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
(११).
रूह-ओ-दिल पे छा जाता है
सबके मन को भा जाता है,
सबके मन पर इसका राज़,
ऐ सखी साजन ? न सखी ताज ! *
Posted on
undefined
undefined -
26 Comments
This entry was posted on 7:12 PM and is filed under अतिथि-कविताएँ . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
26 comments:
Yograj ji ne madhya kaal ko saakar kar diya hai, Vishvgatha aur Yogiji, dono kaa abhaar.
Sanjay Mishra Habib
May 25 at 8:24pm Reply • Report
अमीर खुसरो की काव्य विधा को आज के परिवेश में पढ़ना सुखद है.
आद. योगराज जी को सादर साधुवाद.और आपको धन्यवाद इस विलुप्त हो चुकी शैली से रूबरू करवाने के लिए... सादर...
आदरणीय प्रभाकर साहिब, दिनांक १६ मई से २० मई तक ओपन बुक्स ऑनलाइन पर चली "चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता में प्रतियोगिता से अलग रहते हुए आपने यह "कह मुकरिया" प्रस्तुत की थी जिसे सभी विद्वजनों ने काफी सराहा और अकेले आपकी इस खुबसूरत रचना को करीब दो दर्जन उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ हासिल हुई थी | यक़ीनन आपने इस लुप्तप्राय विधा को प्रस्तुत कर नई पीढ़ी को सिखने का मौका उपलब्ध कराया है | बहुत ही खुबसूरत मुकरियां बन पड़ी है | उम्मीद है विश्वगाथा के सम्मानित पाठको को भी यह रचना आकर्षित करेगी | बहुत बहुत बधाई और आभार इस रचना हेतु |
गणेश जी "बागी"
संस्थापक
www.openbooksonline.com
(एक सामाजिक और साहित्यिक वेब साईट)
इस प्रशंसनीय प्रयास के लिए बधाई । दिविक रमेश
भाई योगराज जी प्रभाकर जी,
आपकी "कह-मुकरियां" पढी़ ! अच्छी लगी !
हमारा साहित्यिक वैभव इतना सघन है कि उसमें से बहुत कुछ अनायास ही दीख जाता है,जैसे कि "कह-मुकरियां"
हमारे साहित्यिक वैभव पर समय की इतनी गहन धूल भी न जमे कि वो अंतत: सायास भी दृष्टिगोचर न हो !इस हेतु वर्तमान में सृजनरत साहित्यिकों को कुछ करना भी चाहिए ! इस संदर्भ में आपका सक्रिय प्रयास सराहनीय,श्लाघनीय,रेखांकनीय एवम वंदनीय है !साधुवाद !
अमीर खुसरो ही नि:संदेह "कह-मुकरियों’ के प्रणेता हैं । भारतेन्दु हरी्शचन्द्र ने भी इस विधा को आगे बढा़या ! यहां तक सत्य भी है मगर यह भी देखें कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी भरपूर "कह-मुकरियां " लिखी गईं !विधा के नाम अन्य भारतीय भाषाओं में पृथक-पृथक रहे ! राजस्थानी भाषा में भी कह-मुकरियां लिखी गईं ! यहां इनका नाम "कह-मुकरणीं"रहा ! राजस्थानी भाषा के विश्व विख्यात प्रकृति के चितेरे कवि कुंवर चन्द्र सिंह "बिरकाळी " की सातवें दशक से पहले इस विधा में एक कृति "कह-मुकरणीं" प्रकाश में आई !इस "कह-मुकरणीं" को साहित्य जगत में बहुत सम्मान मिला । आगे के संदर्भों में इनको भी शामिल करेंगे तो आपकी दृष्टि का विस्तार ही माना जाएगा !
कवि कुंवर चन्द्र सिंह "बिरकाळी " की एक"कह-मुकरणी-
आधी रात नै बो आयो
ऊपर पड़तो घणों सुहायो
टपका-टपका भीजी देह
क्यूं सखी साजन,ना सखी मेह ॥
एक बार फ़िर आपके इस साधुकर्म के लिए नमन !
***
भाई पंकज जी ,
इस पोस्ट के लिए आपको विशेष बधाई !
बहुत ही सराहनीय काम है यह !
लगे रहें-मेरी शुभकामनाएं स्वीकारें !
आपकी सदा ही जय हो !
भाई योगराज प्रभाकर जी,
आपकी "कह-मुकरियां" पढी़ ! अच्छी लगी !
हमारा साहित्यिक वैभव इतना सघन है कि उसमें से बहुत कुछ अनायास ही दीख जाता है,जैसे कि "कह-मुकरियां"
हमारे साहित्यिक वैभव पर समय की इतनी गहन धूल भी न जमे कि वो अंतत: सायास भी दृष्टिगोचर न हो !इस हेतु वर्तमान में सृजनरत साहित्यिकों को कुछ करना भी चाहिए ! इस संदर्भ में आपका सक्रिय प्रयास सराहनीय,श्लाघनीय,रेखांकनीय एवम वंदनीय है !साधुवाद !
अमीर खुसरो ही नि:संदेह "कह-मुकरियों’ के प्रणेता हैं । भारतेन्दु हरी्शचन्द्र ने भी इस विधा को आगे बढा़या ! यहां तक सत्य भी है मगर यह भी देखें कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी भरपूर "कह-मुकरियां " लिखी गईं !विधा के नाम अन्य भारतीय भाषाओं में पृथक-पृथक रहे ! राजस्थानी भाषा में भी कह-मुकरियां लिखी गईं ! यहां इनका नाम "कह-मुकरणीं"रहा ! राजस्थानी भाषा के विश्व विख्यात प्रकृति के चितेरे कवि कुंवर चन्द्र सिंह "बिरकाळी " की सातवें दशक से पहले इस विधा में एक कृति "कह-मुकरणीं" प्रकाश में आई !इस "कह-मुकरणीं" को साहित्य जगत में बहुत सम्मान मिला । आगे के संदर्भों में इनको भी शामिल करेंगे तो आपकी दृष्टि का विस्तार ही माना जाएगा !
कवि कुंवर चन्द्र सिंह "बिरकाळी " की एक"कह-मुकरणी-
आधी रात नै बो आयो
ऊपर पड़तो घणों सुहायो
टपका-टपका भीजी देह
क्यूं सखी साजन,ना सखी मेह ॥
एक बार फ़िर आपके इस साधुकर्म के लिए नमन !
***
भाई पंकज जी ,
इस पोस्ट के लिए आपको विशेष बधाई !
बहुत ही सराहनीय काम है यह !
लगे रहें-मेरी शुभकामनाएं स्वीकारें !
आपकी सदा ही जय हो !
भाई योगराज जी इस महत्कर्म के लिए आप कोटि कोटि साधुवाद के पात्र हैं|
'कह-मुकरी' हमारे जन-जीवन का एक अभिन्न अंग है| यहाँ तक कि आज के दौर के स्कूली बच्चों में भी इस तरह की बातें मिलना तय है| बस तरीके बदल गये हैं, भाषा, प्रतिबिंब बदल गये हैं, विषय बदल गये हैं|
काव्य वही जो जन साधारण से जुड़ाव रखे| अमीर ख़ुसरो जी ने जनता जनार्दन की इस ख़ासियत को अपना स्वर दिया| कालांतर में भारतेंदु हरिशचन्द्र के अलावा और भी कई आँचलिक कवियों ने इस विधा को जीवंत बनाए रखने में अपना भरपूर योगदान दिया है|
इधर कई सालों से इस विधा के दर्शन या तो नहीं हो रहे थे - या फिर बहुत ही कम - नज़र में न आने लायक| ऐसे में आदरणीय योगराज जी के द्वारा 'कह-मुकरी' को उर्दू - खड़ी बोली और ब्रजभाषा के शब्दों के साथ प्रस्तुत करते देख हमारा मन मयूरा भी तिनक धिन करने लगा है|
योगराज जी को ढेर सारी बधाइयाँ और पंकज भाई को बहुत बहुत शुक्रिया एक शानदार विधा को अपने ब्लॉग के ज़रिए लोगों तक पहुँचाने के लिए|
bahut aanad aaya padh kar...aise hi bhooli bisri vidhaon ko sabke samne late jaiye....abhar..
फुटकर छंद बहुत बढ़िया रहे!
सर्वप्रथम तो अमीर खुसरो साहब को याद करते हुए उनकी बहुमुखी प्रतिभा को उनको नमन करता हूँ क्योंकि अमीर खुसरो खडी बोली के प्रथम कवि, बुहभाषाविद, सूफी साधक, हिंदू-मुस्लिम एकता के अग्रदूत, भारतीय संगीत के उन्नायक एवं राष्ट्रभक्त थे।
उसके बाद सम्मानीय योगराज जी को चरण स्पर्श कि उन्होंने इस पुनीत और कठिन कार्य को एक नया आयाम दिया तथा आज की युवा पीढ़ी को खुसरो साहब की लोकप्रिय विधाओं में सबसे अधिक प्रचलत मुकरियों से परिचित होने का सुअवसर प्रदान किया. ये मुकरियां पढ़कर आपमें हमने खुसरो जैसे व्यक्तित्व की छवि देखी है, जो कि हमारा और समूचे हिंदी साहित्य का सौभाग्य है.
अमीर खुसरो साहब की पहेलियों अथवा मुकरियों की सबसे बड़ी खूबी थी कि उसके पाठक न केवल साहित्य से जुड़े गंभीर सुधि लोग थे बल्कि गाँव, गली, पनघट, घर-आँगन में बड़ों और बच्चों तक में लोकप्रिय हुई.
'खालिक बारी नाम से एक पद्यबध्द शब्दकोश भी इन्होंने बनाया था। खुसरो साहब ने 'ढकोसले भी लिखे जिनके पीछे एक किंवदंती प्रचलित है कि एक बार प्यास लगने पर गाँव के कुएँ पर लडकियों से इन्होंने पानी माँगा तो उन्होंने कहा कि आप तो खुसरो हैं, जो पहेलियाँ और मुकरिया लिखते हैं। पहले हमें खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल पर कुछ सुनाइए। खुसरो ने तुरंत कहा :-
'खीर पकाई जतन से औ चरखा दिया चलाय।
आया कुत्ता ले गया, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिला!
श्री योगराज जी की समस्त मुकरियाँ इतनी अच्छी लगी कि न जाने कितनी बार पढ़ गया और जितनी बार पढ़, उतनी ही बार नई और मीठी लगी.
हम श्री योगराज जी से एक निवेदन और भी करना चाहेंगे कि खुसरो साहब की अन्य विधाओं को भी नवीन कलेवर में प्रस्तुत करें तो हम सबको इन विधाओं में काम करने का एक नया फलक मिलेगा साथ ही एक सशक्त विधा फिर से अपने चरम तक पहुँच पाएगी. हमने ये निवेदन इसलिए किया क्योंकि सिर्फ प्रभाकर जी ही इस कठिन कार्य को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा सकते हैं.
अमीर खुसरो साहब की इस परंपरा को पुनः जीवंत करने, परिचित करवाने और हम तक पहुँचाने हेतु समूचा हिंदी साहित्य सदा-सदा आपके प्रति आभारी रहेगा.
आदरणीय पंकज भाई साहब को मैं प्रणाम करता हूँ कि उन्होंने विश्वगाथा के इस पावन मंच से श्री योगराज प्रभाकर जी के इस स्तुत्य सृजन से रूबरू करवाया. नमन !
आपका बहुत बहुत शुक्रिया शम्स भाई !
संजय मिश्र "हबीब" साहिब, उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार !
बाग़ी भाई, आपकी ज़र्रा-नवाजी का शुक्रिया ! ओपनबुक्स ऑनलाइन डोट कॉम के संस्थापक से तारीफ पाना किसी इनाम से कम नहीं है !
आदरणीय दिविक रमेश जी, उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आभार !
आदरणीय ओम प्रकाश कागद जी,
कह-मुकरी पर मैंने पंजाबी भाषा में आठवें दशक के दौरान भी कलम आज़माई की थी ! लेकिन उस समय "प्रगतिशील" लेखकों का समूह हर साहित्य सभा में छाया हुआ था, और ग़ज़ल सहित अन्य पारम्परिक काव्य विधायों का घोर विरोध कर "सोनेट" और "हाइकू" जैसी विदेशी विधायों का दीवाना हुआ पड़ा था ! ग़ज़ल या दोहे का नाम सुनकर वे लेखक को देख ऐसे मुस्कुराते थे मानो कि वह कोई कॉमेडियन हो ! ज़ाहिर है कि २०-२२ साल कि उम्र में इन बातों ने मुझे बहुत हतोत्साहित किया ! लेकिन अब विद्वान दोस्तों की प्रेरणा पाकर लगभग पौने तीन दशक बाद फिर से वो बीज अंकुरित होने लगे हैं ! आपने मेरे इस अदना से प्रयास को सराहा तो लगा मेरा श्रम सार्थक हो गया ! इस उत्साहवर्धन के लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ ! आपने जो कवि कुंवर चन्द्र सिंह "बिरकाळी " जी की कह-मुकरनी के बारे में जो अनमोल जानकारी दी मैं उसके लिए भी आपका आभार व्यक्त करता हूँ ! सादर !
भाई नवीन चतुर्वेदी जी, इस विधा पर पुन: हाथ आजमाई के पीछे भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप में आपकी ही प्रेरणा काम कर रही थी ! सनातनी छंदों/विधायों की तरफ ले जाना का श्रेय भी आप ही को जाता है जिसके लिए मैं ह्रदय से सदैव आपका ऋणी रहूँगा ! खडी बोली और उर्दू के शब्दों का प्रयोग मैंने जान बूझ कर इनमे अपनापन लाने के लिए किया है ! आपको यह कह-मुकरियाँ पसंद आईं तह जान कर दिल खुश हो गया ! धन्यवाद और आभार !
डॉ मयंक साहिब - धन्यवाद !
kase kahun? jee - apka bahut bahut abhaar.
kase kahun? jee - apka bahut bahut abhaar
Bahut khoob Prabhu ji...
आदरनीय भाई नरेंद्र व्यास जी, आपके स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत आभारी हूँ ! आपने रचनाएँ पसंद कीं - मेरा श्रम सार्थक हुआ ! मेरी बात को पाठकों तक पहुँचाने के लिए पूरी "विश्वगाथा" टीम का आभार !
Thanks Dhrmender bhai
प्रिय भाईश्री योगराजजी और "विश्वगाथा" परिवार,
मै आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ कि "अमीर खुसरो साहब" के नक्शेकदम पर आपने जो रचनाएँ "विश्वगाथा" के मंच के लिए दी थी, वो तो सराहनीय थी ही | मगर ईस छोटे से मंच का बहुत बड़ा सम्मान बढाया है आपने !
आपकी रचनाओं के कारण ही बहुत ही बड़े साहित्यकार और विद्वानों ने भी "विश्वगाथा" पर अपने हस्ताक्षर दिए हैं | मैं आपके साथ उन सभी शब्द-साधकों को नमन करता हूँ | श्री नरेन्द्र व्यास, श्रीमती जया केतकी और मेरा विनम्र प्रयास आप सभी के आशीर्वाद से दो कदम आगे बढ़ रहा हैं | आप सभी से मेरा नम्र अनुरोध हैं कि आगे भी आपका प्यार-स्नेह बना रहेगा और "विश्वगाथा" के उच्च स्तर के लिए सूचन भी मिलेंगे, यही कामनाओं के साथ....
आपका,
- पंकज त्रिवेदी
समझ नही आ रहा क्या कहे हम.
आपको यहाँ पढना अपने आप मे एक सुखद अनुभव है.
बहुत सार्थक
Post a Comment