पंकज त्रिवेदी
पूछा मैंने क्यूं देर से मिलाया हमें
पता नहीं क्यूं खुदा भी शरमाता है?
ये दिल से निकली है बात मेरे दोस्त !
कौन कहेता है कि तुम दूर हो हम से?
ये रिश्ता है दर्द का खुद ही को देख
वरना कौन हैं यहाँ जो गुमशुदा नहीं?
ये सलाखें नहीं कच्चा धागा है मेरे यार
हम वो कहाँ जो किसी के बंधने से रहें?
ठोकरें
ऐ दोस्त इतना भी प्यार न कर
लोग चले जाएँ ठोकरें मारते यहाँ
समझ ले तू भी अब इस ज़माने में
सच्चा प्यार करने वाले मिलेंगे कहाँ
ये दुनिया है शानों-शौकत के लिए
प्यार करने वाले तो फ़कीर हैं यहाँ
कोई नफ़रत का कारवाँ लेके आया हैं
मैं हूँ कि खुद को खींचे जाता हूँ यहाँ
क्या हक्क है तुम्हें प्यार करने का
दोस्त ! किसे वक्त है बेफ़िजूल यहाँ ?
देखा है....!
जिन्दगी को बहुत रंगीनियत से जीया है
बात जीने मरने की नहीं है यारो यहाँ
जीते जी मरते लोगों को मैंने देखा है
बात न होने की फैलती है अफवाह बनकर
सच को भी अफवाह में बदलते हुए देखा है
मौजूदगी की परवाह किसे है यहाँ यारों
सूखे पत्ते को पेड़ से गिरते हुए देखा है
सहजता से आ जाये तो अच्छा हैं यारों
ग़र कविता हो या मौत हमने तो देखा है
खामोशी
बड़ी खामोशी से पाला है, आशियाना हमने |
ग़म के सायों से लदे पेड़, झुके है आँगन में ||
हमारी फ़ितरत ही कहाँ, ज़माने से ख़फा होना |
अँगारे से खेलना, मुस्कुराना, अच्छा भी नहीं ||
घर तुम्हारे भी जल रहे हैं, देखो लोग सहमे हुएँ |
दिल की गहराई से दबी, टीस एक सुनाई देगी ||
हसीं आती है हमें, भरोसे की बात पर |
खंजर है तुम्हारे हाथ में, और गोली है पीठ में ||
अब गांधी नहीं रहे, जो अहिंसा की करें बात |
आज़ाद है हम कहते हैं, फिर भी है क्यूं गुलाम !!
खड़ा हूँ मैं !
दोस्त ! आज मिलाया है तुमसे मुझे
ईश्वर ने...पता नहीं क्या मकसद है?
न सोचा कभी, न मान सकता हूँ मैं
कुछ तो होगा रिश्ता ये जानता हूँ मैं
तू कौन है और क्यूं मिली हो मुझसे
बात यह नहीं, बस तुम हो और हूँ मैं
तुम्हारा रूठना और मनाना हमें क्यूं?
क्यूं जिद्द अभी भी क्यूं मंजिल हूँ मैं
बात मानने की नहीं, न समझाने की
कुछ हो रहा है बस, यूंही खड़ा हूँ मैं
नज़म - पंकज त्रिवेदी
तेरे पुनीत कदमों ने मुझे झकझोरकर रख दिया
मेरे अँधेरे सीने में तुने दिया जलाकर रख दिया
सुनो, बात अभी तो शुरू ही हुई है मेरे ऐ दोस्त !
माशूकाना आँखों में कोई, चेहरा छिपाकर रखा दिया
धड़कता है दिल आज, किसी अनजान के खुमार पर
धधकता है समंदर यहीं पर, तुमने मज़ार कहा दिया
सोचो मत, सोचना तो मना है ईस दुनिया में
तुम कहो जो कहेना है, लोगों ने भी कह दिया
बदनामी के बवंडर में फँसा हुआ है यह आदमी 
बदनाम था तो था, तुमने बदमाश कह दिया
सारे शहर में - पंकज त्रिवेदी
यार मै तुजे मयखाना पिलाती रही,
फिर तुजे ही ज़िंदगी पिलाती रही |
सारे शहर में अजनबी वो फिरता रहा,
मै अधूरी सी मुझ में खुद को ढूँढती रही |
यार बदला तो मयखाना भी बदल गया,
मगर तेरी तन्हाई में रातभर जागती रही |
तुमने बीज बोया अपने आप पल गया,
अब उसे में तेरा चेहरा ढूँढती रही |
शीशमहल सा तेरा चेहरा टूट गया,
मेरे जिश्म की हर बूँद पिघलती रही |




