चार लघुकथाएं - फ़ज़ल इमाम मल्लिक
(१) शोक
पूरी बस्ती आज अंधेरे में डूबी थी....ऐसा लग रहा था मानो किसी की मौत हो गई है जबकि आम दिनों में रातों को यह बस्ती गुलज़ार रहती है...तबले की थाप और घुंघरुओं की आवाज़ किसी-किसी घर से गूंज उठती है और पूरी बस्ती रोशनी में नहाई रहती है...रात जैसे-जैसे जवान होती है बस्ती की रौनक़ और बढ़ जाती है.....पाऊडर...ख़ुश्बू...लाली...लिपिस्टक और तरह-तरह के मेकअप लगा कर खड़ी लड़कियां आने-जाने वालों को लुभाने की हर मुमकिन कोशिश करती हैं...रोशनियों में अपने जीवन की कालिख को छुपातीं लड़कियां ग्राहकों को खुश करने में किसी तरह की कंजूसी नहीं करतीं.....आख़िर उनका धंधा ठहरा..। लेकिन बस्ती में आज अंधेरा है और घरों के दरवाजे बंद है....बस्ती के एक घर में एक लड़के ने जन्म लिया है।
( २) फ़रियाद
माई को जब पता चला कि नई आई लड़की मां बनने वाली है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा....
माई ने उसकी बलइयां लीं और दूसरी लड़कियों से साफ कह दिया उसका पूरा ख्याल रखा जाए...उस नई लड़की का अब पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता...उसके खाने-पीने से लेकर दूसरी छोटी-छोटी बातों का भी....आख़िर लंबे अरसे के बाद वहां कोई लड़की मां बनने जा रही है......। कुछ दिन बीते तो माई उस नई लड़की को डाक्टर के पास ले गईं......डाक्टर ने लड़की की जांच कर माई को तसल्ली दी...‘सब कुछ ठीक है’। माई के चेहरे पर सुख फैल गया....लेकिन अचानक माई को कोख में पलने वाले बच्चे की जानकारी हासिल करने का मन हुआ....उन्होंने डाक्टर से कहा ‘इस बच्चे की जानकारी दें, प्लीज....बेटा है या बेटी’। डाक्टर ने उन्हें टालना चाहा लेकिन माई अड़ गई। तब डाक्टर ने लड़की के कोख में पलने वाले बच्चे की जानकारी के लिए प्रीक्षण किया। जांच के बाद डाक्टर ने माई से कहा ‘मुबारक हो, लड़का है’। डाक्टर की बात सुन कर माई सन्न रह गई...‘क्या कहा लड़का ?’ ‘हां’ डाक्टर ने कहा। ‘डाक्टर हमें यह लड़का नहीं चाहिए’ उसने हाथ जोड़ दिए। ‘लेकिन क्यों’ डाक्टर हैरान थी.....‘यहां तो लोग लड़कियों को पैदा होने से पहले ही कोख में मार देते हैं और तुम लड़के को मारने को कह रही है’। ‘हां, डाक्टर...हमें लड़का नहीं लड़की चाहिए...’ माई ने कहा। ‘ऐसे क्यों’ ‘डाक्टर, आप नहीं समझेंगी बेटियां हमारे लिए कितनी ज़रूरी होती हैं....बेटे हमारे लिए बोझ होते हैं डाक्टर...मेरी बच्ची उस बच्चे को नहीं जनेगी डाक्टर....हम वेश्या जो ठहरे....’। माई की आंखों में प्रार्थना थी और डाक्टर की आंखों में हैरत।
( ३) मक़सद
आंटी के बुलावे पर नरगिस को अचंभा हुआ। उसने तो कब का धंधा छोड़ दिया था। जिस बीमारी से वह जूझ रही थी उसके बाद धंधा चालू रखना मुमकिन न था। लेकिन आंटी के बुलावे को नरगिस नज़रअंदाज भी नहीं कर सकती थी। बीमारी ने उसे थोड़ा कमज़ोर कर दिया था...कभी उसके नाम की तूती बोलती थी बाज़ार में....उसकी ख़ूबसूरती पर न जाने कितने मरते थे और एक रात की कोई क़ीमत भी देने के लोग तैयार हो जाते थे....आंटी ऐसे लोगों से निपटने में माहिर थीं....नरगिस तो उनके ख़जÞाने की सबसे क़ीमती हीरा थी जिसका आंटी ख़ास खयाल रखतीं....
नरगिस यही सब कुछ सोचती आंटी के पास पहुंची तो वहां कोई नहीं था.....आंटीने नरगिस को बाहों में भर लिया.....‘अच्छा हुआ तू आ गई’
‘तूने बुला भेजा था तो आना ही था.....कोई खास वजह’ नरगिस ने कहा।
‘हां तुझे फिर से धंधे पर लगाना है’ आंटी की आंखों में एक अजब तरह की चमक थी....ऐसी चमक पहली बार नरगिस ने देखी थी आंटी की आंखों में।
‘लेकिन आंटी.....’
‘हां मैं जानती हूं तेरे को ख़राब बीमारी है लेकिन तू घबरा मत... तेरे से समाज और देश की सेवा करवानी है’ आंटी ने बीच में ही नरगिस की बात काट डाली।
‘देश सेवा’ नरगिस ने हैरानी से पूछा।
‘हां देश सेवा...तेरी बीमारी को हथियार बनाना है मुझे’ आंटी ने कहा लेकिन नरगिस की समझ में कुछ नहीं आया।
‘नहीं समझी......देख हम तो ठहरे धंधे वाले....हमारी ज़िंदगी में उजाले की कोई नन्ही सी किरण भी नहीं है.....लेकिन हमारे जिस्म का इस्तेमाल नेताओं, अफ़सरों और सेठों को ख़ुश करने के लिए किया जाता है.....ये वे हैं जो देश को लूट रहे हैं....हम लोग क्या जानें काला धन...सफÞेद धन....लेकिन देख
करोड़ों लूट रहे हैं नेता-अफ़सर-ठेकेदार.....समाज और देश की चिंता किसी को नहीं है.....दूसरी तरफ़ पुलिस है जो अपराधियों को तो छोड़ देती है लेकिन मासूम और बेगुनाहों को मारने में सेकंड का भी देर नहीं लगाती.....तू तो जानती ही है कि हम लोगों को भी कम परेशान नहीं करते हैं ये पुलिस
वाले.....याद है न तुझे तेरे भाई को भी इन पुलिस वालों ने मार डाला था और उसका क़सूर बस इतना था कि उसने इस बात का विरोध किया था कि वे तुझे जबर्दस्ती उठा कर ले जा रहे थे.... सोनिया....शबनम...जूली...
( ४) पहली कमाई
मोहल्ले के आज हर घर में चराग जल रहा था.......रोसनियों से सारा मोहल्ला जगमगा रहा था..... फिल्मी धुन पर लोग थिरक रहे थे......हर चेहरे पर खुशी की लिखी इबारत साफ़ पढ़ी जा रही थी.....मोहल्ले में आज एक नई लड़की धंधे पर बैठी थी...।
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2 comments:
ek anjane upekshit samaj se uthayee gayee marmik kahaniyan..abhar
आदरणीय फ़ज़ल इमाम मल्लिक साहिब, यूँ तो आपकी सभी लघुकथाएं बहुत ही सारगर्भित हैं मगर "पहली कमाई" ने तो दिल ही जीत लिया ! दरअसल यह लघुकथा का बहुत ही सुन्दर स्वरूप है, जो शिल्प का हर तकाजा पूरा करती है ! एक भी शब्द ज़रूरत से ज्यादा नहीं, बात सादी मगर प्रभावशाली शैली में कही गई है, ओर लघुकथा का अंत भी ऐसे किया गया है जैसे की किसी फुलझड़ी की रोशनी यकायक आँखें चौंधिया दे या किसी ततैये के डंक से पढ़ने वाला एकदम चौंक जाए और सोचता रह जाए ! इस बाकमाल लघुकथा के लिए दिल से आपको बधाई देता हूँ !
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