यादों का पिटारा - कविता वर्मा
पेटी में लिपटी रखी
अम्मा की कांजीवरम साडी
जतन से खोलते उसकी तह
यूं महसूस हुआ जैसे
बिस्तर पर पड़ी
जर्जरकाया माँ को
हल्के से छुआ हो
ठन्डे पड़े हाथ की गर्माहट को
साड़ी की तह के बीच
गाल पर महसूस किया माँ
सालों से लाकर में रखे बूंदे
आज निकाल कर लाई हूँ यूं ही
न कोई उत्सव न कोई जलसा
कितने ही आधुनिक जेवरों के बीच
कितने पुरातन
पहली बिटिया की जचकी के
कितने ही पहले
बनवाकर रख लिए थे तुमने
और बिफर पड़ी थी में
क्या माँ कोई ढंग की
डिजाइन बनवाई होती
तुम्हारा धुंआ धुंआ चेहरा
रह रह कर आईने में
बूंदों की जगह झलक जाता है माँ
तरतीब से जमी
साड़ियों की अलमारी
यूँ ही खोल कर बैठी हूँ आज
तुम्हारी दी हुई साड़ियों की
अलग तह लगाते हुए
कभी सोचा ही नहीं
बाबूजी की पेंशन
भैया की सीमित आय में
कैसे ससुराल में मेरे मान को
बनाये रखने के लिए
तिल तिल जोड़ कर
इतनी साड़ियाँ दीं तुमने
कभी तुम्हे ख़ुशी नहीं जताई
कभी न माना आभार
आज साड़ियों का ढेर
अपने दंभ से बहुत बहुत
बड़ा नज़र आता है माँ
वो नानी की सिंगार पेटी
दादी के पानदान का वो सरौता
संजो कर रखे थे
जो तुमने अपने यादों के पिटारे में
साधिकार ले आयी थी जिन्हें
आज उन सब चीजों में
तुम्हारे न होने के बाद भी
तुम्हारा ममतामयी निरीह चेहरा
नज़र आता है माँ .
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10 comments:
Kavita ji kee marmsparshee kavita ke liye unhen
dheron badhaaeeyan aur shubh kamnaayen .
khoobsurat kavita
bahut sundar...
...."माँ का धुआं धुआं सा चेहरा ..." का समावेश ,दे रहा अनछुआ सा परिवेश !
बधाई हो कविता !!!
क्या बात है, बहुत सुंदर। मन के भावों को बहुत ही अच्छी तरह से आपने शब्दों में बांधा है। बधाई
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
Bahu apni sasural mein apne saath laaye gaye saamaan ko dekh kar sochti hai ki kitni kathinaai se yeh saamaan uske parivaar ne uske liye ikatthaa kiyaa hogaa aur maa ki smriti to in se judi hai.swabhaavik vichaaron kaa marmik prastutikaran
sundar abhivyakti!
dhanyavad pankaj ji...kavita shamil karne ke liye....sabhi mitro ka abhar utsah vardhan karne ke liye...
बहुत ही सुन्दर कोमल रचना..यादों के पिटारे से निकली...स्नेहिल ...कुछ हंसाती कुछ रुलाती जीवंत यादें..
.... वो नानी की सिंगार पेटी
दादी के पानदान का वो सरौता
संजो कर रखे थे
जो तुमने अपने यादों के पिटारे में
साधिकार ले आयी थी जिन्हें
आज उन सब चीजों में
तुम्हारे न होने के बाद भी
तुम्हारा ममतामयी निरीह चेहरा
नज़र आता है माँ .
कविता जी कोटि कोटि शुभकामनाएं ...
पंकज जी भावनाओं के मंत्रमुग्ध कर देने वाले संसार से परिचित करने के लिए अपार अभिन्दन...
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