लकीरें - पंकज त्रिवेदी
प्रिय दोस्त,
तुम्हारा न होना,
तुम्हारी मौजूदगी का गवाह बनाता हैं
हर पल...
तुम चाहे कहीं भी हो, रहो... खुश रहो... !
दोस्ती का अर्थ अपेक्षा या अधिकार नहीं
यह तो जनता ही हूँ..
मगर -
दोस्ती का अर्थ यह भी हैं कि
अपने दोस्तों के कंधे
दुःख-दर्द को सहन करने के लिए
अपने सर को विश्राम दे सकता हैं
अगर कोई साथ देता भी हैं तो अलग बात हैं मगर
साथ देने के भी तरीके होते हैं...
जरूरतों पर बने रिश्तें अपनी मंज़िल से
भटकने में ही साथ देता है.....
दोस्त,
जब कोई अपना बनाकर साथ निभाता हैं तो
उनकी मर्यादाओं को नज़रंदाज़ करते हुए
साथ निभाना चाहिए..
ये दोस्ती का रिश्ता बड़ा अजीब होता हैं न ?
न छोड़ सकते हैं और न कुछ कह सकते हैं
क्योंकि-
कहें तो भी क्या कहें और किसे कहें?
दोस्ती की मिसाल पर यह दुनिया प्रेरित हैं
मगर एक पल रूककर सोचना होगा
दोस्त के फैले हुए हाथों को 'मांगना' नहीं कहते
हो सकता हैं - उन खुले हाथों की लकीरें
सिर्फ तुम्हारे लिए ही हों...!
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11 comments:
फैले हाथ - लकीरें, एक नई बात कहने का प्रयास किया है आपने| वैसे दोस्ती सोच समझ कर करना ही सही होता है| आज के दौर में ज़्यादातर लोगों के लिए दोस्ती के माने लक्ष्य सिद्धि के सिवा और कुछ नहीं| सुंदर कविता के लिए बहुत बहुत बधाई|
लकीरों के माध्यम से दिल की बात कह दी गई है .. बहुत खूब कविता पंकज भाई...
nice
Bahut khub Pankaj ji.......
dosti ko hathon ki lakeeron ke madhyam se khoob ukera hai aapne..behatren...
wah wah wah ! aisee rachana likhane ke liye samvedana aur sahbhavon kee parakashtha tak jaan padta hai. aur aapne vaheen se ye bhav-indradhanush kitnee shiddat se banaya hai. badhai sammaniy pankaj ji. aabhar, naman !!
मेरे स्वजन,
आप सभी का दिल से ऋणी हूँ |
बहुत ही सुन्दर,शानदार और उम्दा प्रस्तुती!
बहुत ही भावुक प्रस्तुति ....
मगर एक पल रूककर सोचना होगा
दोस्त के फैले हुए हाथों को 'मांगना' नहीं कहते..सादर अभिनन्दन
http://spdimri.blogspot.com/
bahut sundar likha hai Pankaj ji... sahi maayne me dosti ko paribhashit karna.. Mitr swasth rahen sukhi rahen ..chahe kahi bhi hon
दोस्त
तुम्हारे चेहरे को मैं यहाँ से पढ़ सकता हूँ
तुमको मैंने दोस्त कहा
यानि हम समान है...
उम्र और विचार से भी हम समान- दोस्त हैं
तुम्हे मेरे लिए सम्मान है तो मुझे भी
हम एकदूजे को समझते है हम
जब दोस्त बनाया तो not good, not bad
क्यूंकि- प्रत्येक इंसान चाहता है....
पूरे परिवार के बावजूद... कोई ऐसा हो,
जिसे हम सबकुछ कह सके खुले मन से
ये मानव स्वभाव है...
कोई इससे परे नहीं
अब तुम कहो, मै गलत हूँ ?
एहसासों के इस रिश्ते को मैंने भी स्वीकार किया है
जानता हूँ कि हम दोनों किसी ऐसी डगर पर आये हैं,
जहाँ पहुँचने हमारा मन भी चाहता था....
जो सबकुछ मिलकर भी अधूरा था
शायद वही सबकुछ हम एकदूजे से पा रहे हैं
हाँ शायद ऐसा ही है
इस संबंध का नाम नहीं, शरीर नहीं, मौजूदगी भी नहीं -
फिर भी यह सब है हम दोनों के साथ...
ईन सब के साथ ही हम मिलते है
और यही अहसास हमारे दिल को - मन को अच्छा लगता है...
तुम्हारे पास सबकुछ है, फिर भी मेरी जगह भी है...
अलग...
शायद तुम भी इसी तरह मेरे अंदर हो...
तुम मुझसे जुदा नहीं हो... कही भी...
शायद धड़कने लगी हो मेरे साथ.....
सच कितना अच्छा लगता है.....
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