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Narendra Vyas
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पितृ दिवस विशेष
फादर्स डे स्पेशल
मैंने गाँव देखा हैं, बैल गाडी देखी हैं और हरियाले खेतों में लहलहाते गेहूं के बालियाँ तोड़कर होला खाया हैं | मेरे पास अभी भी प्रकृति की पूंजी संरक्षित हैं | मेरी नौ वर्ष की छोटी-सी बेटी के बाल सँवारकर, उनमें आँगन में खिले गुलाब के फूल से शोभा बढ़ा सकता हूँ ! उसका हंसता चेहरा मुझे दादी माँ की याद दिलाता हैं | कभी-कभी बाल सँवारते समय एकाध जुल्फ सरक जाएँ तब बेटी मीठा उपालंभ करे- "क्या, आप भी पापा....! लाईये मैं खुद ही सँवार लूं....|"
तब आँखों में नमी के साथ उसे देखूं तो लगता है, मनो मेरी बेटी बड़ी हो गयी हैं | वह मुझे छोड़कर चली जाएगी, इसी डर से आँसूं के धुंधलेपन के बीच देखकर उसे कहूं- "अब तेरी जुल्फ नहीं निकलेगी बेटा, मैं ध्यान रखूँगा |" इतना कहकर उसे अपने साथ खाना खिलाकर स्कूल तक छोड़ने के लिए मैंने अभी भी अपना समय बचा रखा हैं | मेरी बेटी मेरा आ...का....श.... हैं |
(झरोखा निबंध संग्रह से)
-पंकज त्रिवेदी
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4 Comments
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4 comments:
beti ke bhole upalmbh par pita ka uske bhavishya ko door tak dekhna....bahut komal bhav....
आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी।
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पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
पितृ दिवस पर हमारी भी बधाईयां
पितृ दिवस पर आपके द्वारा की गयी इस सुंदर प्रस्तुति की चर्चा ब्लॉग4वार्ता में की गयी है !!
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