प्रार्थना - आभा अगरवाल
अब जो लेना तुम अवतरण,
मत करना नये संप्रदाय का सृजन !
करना सुखों का एक सा विवरण ,
सारे जहाँ का जोड़ कर कण-कण,
सब का एक कर देना तुम मन,
हंसी खुशी से भर देना हर प्रांगण,
ज़िंदगी मे हो खुशियाँ, ना हो कोई अड़चन,
कोई ना हो भूखा, सब का ढका हुआ हो तन,
इंसा-इंसा में भेद ना हो, सुख से बीते जीवन,
साम्राज्य की खातिर, कोई करे ना किसी पर आक्रमण,
झूठी शान को कोई ना मारे, किसी का बेटा भाई या साजन,
चाहे तुम जो भी बनकर आना,
राम, कृष्णा, बुद्ध, महावीर, जिसस, गुरुनानक या स्वामीनारायण,
अब जो लेना तुम अवतरण, मत करना नये संप्रदाय का सृजन !
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1 comments:
अब जो लेना तुम अवतरण, मत करना नये संप्रदाय का सृजन !
Kaash! Aisa ho!
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