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In:

गुजराती कवि कृष्ण दवे की कविता - फास्टफूड



नीम को आ गया बुख़ार

नीम के दादा कहे- कहकर थक गया,

जाओ अभी फास्टफूड खाओ

टी-शर्ट और जिन्सवाली बिल्ली कहे- हमें दूध नहीं चले !

पित्ज़ा और बर्गर की इस पूरी पीढ़ी को, रोटी और सब्जी कैसे ले?

वर्षों से बोतल में कैद होकर सड़ रहे, उस पेय को पीओ और पिलाओ

जाओ अभी फास्टफूड खाओ

अप-टु-डेट कागा और कागी माईक में लगी है गाने !

कुछ भी नहीं भीगे, ऐसे खड्डे में निकले है नहाने ?

कोंपलों के गीत हरियाले भुलाकर, गाओ रिमिक्स के गाने गाओ

जाओ अभी फास्टफूड खाओ

कान कोइ थूकने का कोना नहीं, कि नहीं पेट कोइ कूडादान

हमारे इस चहरे पर दूसरों के नाख़ून क्यों कर जाएं खरोंच ?

बीमार होने का नहीं पुसाता किसी को, सूना है डोकटर के भाव?

नीम को आ गया बुख़ार

नीम के दादा कहे- कहकर थक गया,

जाओ अभी फास्टफूड खाओ

લીમડાને આવી ગ્યો તાવ
લીમડાના દાદા ક્યે કહી કહી ને થાકી ગ્યો,
જાવ હજી ફાસ્ટફૂડ ખાવ.

ટી-શર્ટ ને જીન્સવાળી માંજરી બિલાડી ક્યે આપણને દૂધ નહીં ફાવે !
પીત્ઝા ને બર્ગરની આખ્ખી આ પેઢીને રોટલી ને શાક ક્યાંથી ભાવે ?
વર્ષોથી બોટલમાં કેદી થઈ સડતા એ પીણાને પીવો ને પાવ.
જાવ હજી ફાસ્ટફૂડ ખાવ.

અપ ટુ ડેટ કાગડા ને કાગડીયું માઈકમાં મંડી પડ્યા છે કાંઈ ગાવા !
કંઈ પણ ભીંજાય નહી એવા ખાબોચીયામાં નીકળી પડ્યા છો તમે ન્હાવા ?
કૂંપળના ગીત લીલા પડતા મૂકીને ગાવ રીમિક્સના ગાણાઓ ગાવ.
જાવ હજી ફાસ્ટફૂડ ખાવ.

કાન એ કંઈ થૂંકવાનો ખૂણો નથી કે નથી પેટ એ કંઈ કોઈનો ઉકરડો,
આપણા આ ચહેરા પર બીજાના નખ્ખ શેના મારીને જાય છે ઉઝરડો ?
માંદા પડવાનું પોસાય કદિ કોઈનેય સાંભળ્યા છે ડૉક્ટરના ભાવ ?

લીમડાને આવી ગ્યો તાવ
લીમડાના દાદા ક્યે કહી કહી ને થાકી ગ્યો,
જાવ હજી ફાસ્ટફૂડ ખાવ.

In:

गुजराती कविश्री सुरेश दलाल की दो कवितायेँ


संदेह

स्काटलैंड यार्ड के

कुत्तों जैसे शब्द

कवि की तलाश में निकले हैं

और सदियों से

गुनाहगार पकड़ नहीं पाएं हैं

जो पकड़ा जाता है वह

कवि होने के संदेह में

कवि नहीं....!!!


खून का स्याही में रूपांतर माने कविता

कहते हैं अब वहां सूरज नहीं उगता

यातनाएं उगती हैं........

कहते हैं अब वहाँ रात नहीं ढलती

शीतल वेदनाएं जलती हैं.........

टैंकों के हल से होती खेती की बात सुनकर

यहाँ बैठे कंपकंपा उठाते हैं

मैं...हम... आप... वे.... सभी ही

चलो इतना तो तय करें

खून का रंग लाल हैं |


In:

मणिलाल देसाई

(मूल गुजराती से...)

आप जिसकी पूजा करते हैं वह भगवान

कल रात

मंदिर की दीवार में पडी हुई दरार में से

भाग निकला

पीछे की बाद के काँटों में

उलझा हुआ पीतांबर

अभी भी फडफडा रहा है...

In:

आराम कुर्सी - जया मेहता

(मूल गुजराती से .......)

इस पुराणी आराम कुर्सी पर बैठकर

दादी माँ

थके हुए सूरज को डूबते देखती थी

आज मेरी माँ वहां बैठती है,

शरद के बादल गिनती

कल मैं भी

वहां बैठी होऊंगी

झुनझुनी चढ़े पैर थपथपाती

पृथ्वी नारंगी सी गोल हो या चोरस


In:

चंद्रकांत बख्शी


चंद्रकांत बख्शी | नाम ही काफी है | गुजराती साहित्य में परम्परा को तोड़ने वाला मिजाज | कभी किसी विशेषांक में लिखने की न तमन्ना और न किसी अवार्ड या सम्मान की मोहताजी | मुम्बई के शेरीफ रह चुके चंद्रकांत बख्शी सबसे लोकप्रिय लेखक है | साहित्यिक संस्थाओं के दिग्गज उन्हें साहित्यकार कहने-मानने से कतराते थे | हाँ, बख्शी हमारे बीच नहीं है | मगर आज भी उनकी पुराने आलेखों को छापकर गुजराती अखबार गर्व महसूस करते हैं और उन्हें अखबार भी तो चलाने हैं न? बख्शी कलम और गन चलना जानते थे, या कहो की उनका मिज़ाज था | उनकी एक कविता आपके लिएँ... सरकार

सरकार के करोड़ों मुंह होते हैं

सिर्फ एक आत्मा नहीं होती

सरकार आवाज़ की मालिक हैं

और मालिक की आवाज़ हैं

सरकार विचार कर सकती हैं

सरकार लेखक से लिखवा सकती हैं

जादूगर को रूला सकती हैं

चित्रकार से चित्र बनवा सकती हैं

गायक से गवा सकती हैं

एक हाथ से ताली बजवा सकती हैं

रविवार को सोमवार बना सकती है

नयी पीढी को पुराणी बना सकती हैं

पैसा छाप सकती है, घास उगा सकती हैं

बीजली बेच सकती है, इतिहास गाड़ सकती हैं

अर्थ को तंत्र और तंत्र को अर्थ दे सकती हैं

सरकारों की भागीदारी में यह पृथ्वी बदलती हैं

समय बदलता है, मंत्र बदलते हैं

पर एक दिन

गरीब की आँख बदलती है और

सरकार बदल जाती हैं.....

(उन्नयन : अनुवाद -भानुशंकर मेहता)

In:

मीरांबाई


प्रिय दोस्तों,

आजसे आपको मूल गुजराती साहित्यकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद पढ़ने को मिलेगा... जिसे आप "गुर्जरी" के अंतर्ग पढ़ सकते हैं |

मेरी कोशिश है कि "विश्वगाथा" सही मायने में सभी भाषाओं का मंच बनाकर रहे | जिसमे गद्य और पद्य की सभी विधाएं भी शामिल हों |

गुजरात के द्वारिका में भगवान श्री कृष्ण राजा थे और उनके प्यार में बावरी मीरां ने मेवाड़ छोड़कर द्वारिका में विराजमान राजराजेश्वर श्रीकृष्ण की मूर्ति में खुद को विलिन किया | गुजराती भाषामें आद्यकवि श्री नरसिंह मेहता से भी पहले मीरांबाई है | "गुर्जरी" के प्रथम चरण में मीरां को रखने कारण यह भी है कि वह राजस्थान से आई थी | श्री कृष्ण भी मथुरा से गुजरात में आएं थे | उनकी परम्परा को मैं भाषा-साहित्य के द्वारा प्रांत को भी जोड़ना चाहता हूँ | मेरा यह नम्र प्रयास आपको पसंद आयेगा, ऐसा मानना गलत नहीं होगा | आप सब के प्यार की आशा में...

उम्मींद है कि मेरा यह निर्णय आपको पसंद आयेगा और "गुर्जरी में आपको गुजराती भाषा के परिवेश और मिट्टी की सुगंध महसूस होगी |

------------------------------------------------------------------------------------------ बसों मेरे नैनं मैं नंदलाल

मोहनी मूरत साँवरी सूरत नैना बने विसाल |

अधर सुधारस मुरली राजति उर बैजंती माल ||

छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नूपुर सबद रसाल |

मीरा प्रभु संतन सुखदाई भगत-बछल गोपाल ||

In:

स्वर्गीय दुला भाया काग



गुजराती लोकगायक स्वर्गीय दुला भाया काग के एक दोहरे का अर्थ कुछ इस प्रकार है - "सूखे घास के पूले के गंज में अगर आग लगे तो उसे बुझाने के बदले जितने पूले को बचा सके उसे बचना चाहिए |" (मतलब कि समाज में विकृति की आग बेकाबू होती जाती है, तब हम अपने को उससे बचा सकें तो अच्छा |)