बिस्तर नहीं लगते - भावना सक्सेना
बरसों बीत गए
चाँदनी में नहाए हुए
अब तो छत पर
बिस्तर नहीं लगते ।
रिमोट, प्लेस्टेशन...
हाथ हुए जबसे
दादा की कहानियाँ
भटक गईं रस्ते।
साँझ को मिलता नहीं
कोई चौबारों पर
आप ही आप
कट गए रस्ते।
बैठे हैं चुपचाप एयरकंडिशनर में
भूल गए गर्मी की मस्ती
और खेल में काटे
दिन हँसते हँसते।
वो गिट्टियाँ....
अक्कड़-बक्कड़
साँप-सीढ़ी, कैरम,
कँचों के मासूम से खेल।
बेकार कपड़ों से बनी गुड़ियाँ
मरी परंपराओं की तरह
बस मिलती हैं
म्यूजियम में।
दादी भी हाइटैक......
ला देती हैं बार्बी,
दादा के खिलौने
रिमोट से चलते।
हाल दिल के
दिलों में रहते हैं
औपचारिकताओं के हैं
नाते-रिश्ते।
आधी रात तक
बतियाता नहीं कोई
क्योंकि छत पर तो
अब बिस्तर नहीं लगते।
This entry was posted on 6:22 AM and is filed under अतिथि-कविता . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.
7 comments:
आधी रात तक
बतियाता नहीं कोई
क्योंकि छत पर तो
अब बिस्तर नहीं लगते। ...बहुत ही मीठी सी कविता
बरसों बीत गए
चाँदनी में नहाए हुए
अब तो छत पर
बिस्तर नहीं लगते ।
Kitna kuchh yaad dila gayeen ye pankktiyan! Bachpan kaa ghar bulane laga!Sapnon me aane laga!
बरसों बीत गए
चाँदनी में नहाए हुए
अब तो छत पर
बिस्तर नहीं लगते ।
sach hai ac me apane apne kamron me sote parivar kitane door ho gaye hai....sunder rachna..
वाह....! बहुत खूबसूरती से उकेरा हैं भावना जी, आपने भागती दुनिया की रफ़्तार में सिकुड़ती परम्पराओं के एहसास को...
सादर...
Dosto,
aap sabhi ka dhanyawad....
प्रवीणा जी, क्षमा जी, कविता जी, हबीब जी, पसंद करने के लिए हार्दिक आभार।....सादर
बहुत ही भाव विहल कर देने वाली रचना ...मन मेयादों और भावनाओं का शैलाब उमड़ आया ..सचमुच भौतिकवादी इस युग की अंधी दौड में ..कहाँ छोड आये हम उन सहज स्नेहिल क्षणों को ..अब इंसान के पास फुर्सत ही कहाँ संवेदनाओं के लिए...
भावना जी शुभ कामनाएं एवं सादर अभिनन्दन....
Post a Comment