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Pankaj Trivedi
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अतिथि-कविता
सांझ !!!!..... श्रीप्रकाश डिमरी
सांवली सूरत मोहनी मूरत
स्वर्ण रथ पर बैठी
पश्चिम पथ पर जाती
विहगों को हर्षाती
कलरव गीत गवाती
नीड़ों में लौटाती ......
दूर क्षितिज के संधि पट पर
नीलित नभ के सुकुमार मुख पर
नित नटखट अल्हड बाला सी
लाल गुलाल मल कर छिप जाती
मुस्कानों के पीत पुष्प खिलाती
वन उपवन धरा के छोर को
अपने श्यामल आँचल में छुपाती
कहो प्रिये !!!
फिर कब आओगी ???
कजरारी आँखों से...
मंद मंद मुस्काती ...
थके पथिक को लुभाती ..
आलौकिक मंगल गीत गाती ...
* * *
जोशीमठ २०१०
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12 Comments
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12 comments:
Alaukik rachana!
वाह ! अति सुंदर अभिव्यक्ति .
चर्चा मंच से आपके ब्लॉग पर आने का सौभाग्य मिला.मन प्रसन्न हो गया आपकी सुंदर रचना पढकर .मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा 'पर आपका सुस्वागत है .
बहुत सुन्दर रचना..भावों और शब्दों का बहुत सुन्दर संयोजन..
bahut badiya bhavbhivykti ...prastuti ke liye aabhar
सुंदर अभिव्यक्ति ....बहुत-बहुत बधाई !
अलौकिक सांझ ....
जीवन की संध्या या यात्रा के अंतिम पड़ाव ...पर प्रेयसी के रूप में मनमोहिनी की सुन्दर छवि की परिकल्पना ..शब्दों एवं भावों के रूप में संयोजित करने का मेरा निर्बल प्रयास.... .... पंकज त्रिवेदी जी .मेरे भावों को स्थान देने के लिए अपार आभार....सभी विद्वान स्नेही मित्रों की स्नेहमयी संबल प्रदान करने वाले आशीष हेतु कोटि कोटि अभिनन्दन...
प्रकाश जी भावनाओं को जिस कोमल अंदाज से कविता में पिरोते है वह कबीले तारीफ है ... उनकी लेखनी को मेरा सलाम ... और पंकज जी को धन्यवाद इस सुन्दर रचना को अपने मंच से शेयर करने के लिए..
'विश्वगाथा' के सभी पाठकों-सर्जकों को मेरा सलाम! ईस कविता को और पहले भी कईं रचनाओं को 'चर्चामंच' पर स्थान मिला है, मैं उनके सभी संपादकों का आभारी हूँ |
अन्य सभी सर्जकों-पाठकों को मेरा नम्र निवेदन हैं की आपकी अप्रकट और मौलिक रचना ही ईस मंच के लिए भेजें | यहाँ हमेशा अच्छी रचनाओं का स्वागत हैं, चाहे सर्जक प्रस्थापित हो या बिलकुल नया हो ! जिन्हों ने आजतक 'विश्वगाथा' सहयोग दिया है उनका हृदय से आभारी हूँ और जो नहीं आये उन्हें यहाँ ले आने का ज़िम्मा आप जरूर उठाएंगे, यह श्रद्धा भी हैं | - पंकज त्रिवेदी
waah bahut sunder rachna sri ji ...aloukik !!!! ....saadar ...
rumaniyat or saundary se sajee sundar rachna ..saadar Shri Bhai.!
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